श्रद्धा सुमन हम चढ़ाएं
गेंदा, गुलाब, जूही, चंपा- चमेली परिजात, रातरानी, रजनी – सुबेली बनाकर माला महामानव को पहिनाएं, श्रद्धा सुमन हम चढ़ाएं अपमान का जहर पीके, अमृत दिया हमको जीवन में बदलाव स्वाभिमान
गेंदा, गुलाब, जूही, चंपा- चमेली परिजात, रातरानी, रजनी – सुबेली बनाकर माला महामानव को पहिनाएं, श्रद्धा सुमन हम चढ़ाएं अपमान का जहर पीके, अमृत दिया हमको जीवन में बदलाव स्वाभिमान
शरद ऋतु आपन रंग देखावे लागल गीत द्वारे द्वारे आ के गावे लागल पानी सिकुड़ल नदियन के चमक नया भइल रहल बादल उतपाती कहीं हेरा गइल गॅवे गॅवे जब डेग
यादों के समन्दर में डुबाती हैं तन्हाईयां ख्वाबों को सितारों से सजाती हैं तन्हाईयां प्रतिकूल फिज़ाओं के बादलों की बरसात से तरबतर भींगने से भी बचाती हैं तन्हाईयां शहर
शहर में मिलइ नाहीं शुद्ध हवा पानी चल करी गउआं में खेती किसानी चूना गारा काम कइले पड़ि जालें छाला दवाई होये ना पावइ घर में रहइ ठाला समझइं बगल
है दीपावली तो दीपक जलाएं झालर कभी भी कहीं ना लगाएं माटी का दीपक प्रेम की बाती हर ओर जगमग यही अपनी थाती पहचान त्रेता की सबको कराएं
सागर मंथन के लिए, दैत्य देव तैयार कार्तिक कृष्ण तेरस को, धन्वन्तरि अवतार विष्णू का ही रूप है, और हाथ हैं चार शंख चक्र अमृत औषधि, लेकर करें विचार
माटी की मूरत हूँ या ईश्वर का कोई करिश्मा कहीं सब कुछ हूँ मै और कहीं कुछ भी नही जुए के पासे पर भी लगी अग्नि परीक्षा भी हुई किसी
औधड दानी शिव की कृपा जब हम पर हो जाएगी बडी से बडी बाधाएँ पल भर में दूर हो जाएगी। करते रहोगे जब तक निशि दिन उनका ध्यान
किस्मत ने जब जैसा चाहा ढलते गए हम जिम्मेदारियों के बोझ तले दबते गए हम मनमाफिक तो मिला नहीं कुछ जमाने से महज एहसानों के दलदल में फंसते गए
सच कहता हूं देश शर्मसार होता है महक फूलों में नहीं,भ्रमर आज रोता है बापू , माली नहीं बाग जो संवार सके हर इंसान केवल फर्ज अपना ढोता है लेकर
सच कहता हूं देश शर्मसार होता है महक फूलों में नहीं,भ्रमर आज रोता है बापू , माली नहीं बाग जो संवार सके हर इंसान केवल फर्ज अपना ढोता है लेकर