गज़ल
सच बोलने की कसम खाने से दुश्मनी हो गई सारे जमाने से मै अपनी माँ का सबक भूलूं कैसे कि लगेगा पाप सच छुपाने से रूठता कौन है अपनों से
सच बोलने की कसम खाने से दुश्मनी हो गई सारे जमाने से मै अपनी माँ का सबक भूलूं कैसे कि लगेगा पाप सच छुपाने से रूठता कौन है अपनों से
लाल रंग सूरज से ,हरा रंग सावन से लिए बसंती रंग ,उमंग मनभावन से आज सुनहरे रंगों की डोली आई रे आज दीवानों की रंगीली होली आई रे लाल गुलाल
उनकी एक झलक क्या दिखी बस देखता ही रहा आँखों मे तस्वीर क्या बसी बस सोचता ही रहा नज़रे चुराना ,मुस्कुराना यूँही मिल जाना सनम मिलन की आस मे हरदम