Monday 8th of June 2026 09:50:30 AM

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Category: कविता

16 Sep

हिंद में हिंदी

रो कर हिंदी कह रही,मत लो मेरा नाम कहते अपना हो मुझे, इंग्लिश में सब काम जहां राष्ट्रभाषा नहीं,गूॅगा है वह देश ना विश्व में होय कहीं,मन में है यह

8 Aug

बचपन

  क्या बात करूं मैं बचपन की तथा कहानी  अपनेपन  की  रहती थी कितनी आज़ादी   होवे  चाहे जो   बर्बादी  मुझे  बचा  लें दादा- दादी कहें हमें गुलाब उपवन की

4 Aug

कोरोना दोहे

“डॉ 0 भोला प्रसाद आग्नेय, (75) पूर्व प्रवक्ता , बलिया, निष्पक्ष प्रतिनिधि के लेखक है और इस समय कोरोना से ग्रसित है , प्रस्तुत हैं उनकी कुछ पंक्तिया covid –

12 Jun

मुक्तक

    जीवन की कड़ुवी घूंट पिए जा रहा हूं पैबन्द पर पैबन्द सिए जा रहा हूं घुट घुट कर मरता हूं हर रोज हर कदम फिर भी न जाने

8 Jun

मंगलाचरण जिन्दगी का

शुरू करते ही मंगलाचरण जिन्दगी का  किया दुशासन ने चीरहरण जिन्दगी का  खो गया था मै तो इंसानों की भीड़ में  पढा दिया पशुओं ने व्याकरण जिन्दगी का  सफेदी बाल

30 May

सावन सा जीवन

एक सावन की तलाश है, एक सावन का अभ्यास है।  एक सावन से संसार है, एक सावन के आने का इंतज़ार है। मैं खुद में एक तूफान बटोरे,एक सावन से

29 May

मैं माटी हूँ

माटी हूँ, मैं माटी हूँ अरसों से सावन की मैं प्यासी हूँ|   इस जेठ दुपहरी धूप में जैसे, पवन का झोंका चलता है। इन गरम हवाओं की सन सन

2 May

भूख और रोटियां

भूख से तड़पा है बच्चा माँगता कुछ रोटियाँ, एक निवाले के लिये  दर-दर से मांँगे रोटियाँ।   है नहीं कोई जहाँ में जिसको अपना कह सके, ढूंढती आँखें उसे अब

26 Mar

पापा घर में ही रहना

कब से बच्चे तरस रहे थे  सपने उनके बिखर रहे थे  पापा के संग कब खेलेंगे  पापा से कब गप्पे मारेंगे  पापा मम्मी को संग लेकर  पार्क में झूला झूलेंगे 

26 Mar

पापा घर में ही रहना

कब से बच्चे तरस रहे थे  सपने उनके बिखर रहे थे  पापा के संग कब खेलेंगे  पापा से कब गप्पे मारेंगे  पापा मम्मी को संग लेकर  पार्क में झूला झूलेंगे