Wednesday 6th of May 2026 09:02:27 PM

Breaking News
  • मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस्तीफा देने से किया इनकार |
  • कोटा में पी एम ई-बस सेवा योजना 100ई बस सेवा योजना का होगा संचालन |
  • पद्मश्री फुलबासन बाई यादव की अपहरण की कोशिश दो महिलाओं सहित तीन लोग गिरफ्तार|
Facebook Comments
By : Nishpaksh Pratinidhi | Published Date : 12 Jun 2020 4:24 PM |   702 views

मुक्तक

 
 
जीवन की कड़ुवी घूंट पिए जा रहा हूं
पैबन्द पर पैबन्द सिए जा रहा हूं
घुट घुट कर मरता हूं हर रोज हर कदम
फिर भी न जाने क्यूं मैं जिए जा रहा हूं
             
गुजरे हुए लम्हों को अफसाना समझिए
दिल दर्द से खाली हो तो वीराना समझिए
पत्थर तो जमाने में चलते ही रहते हैं
ज़ख्मों का महज दिल में ठिकाना समझिए
              
अंदाजे बयां कुछ ऐसा विचित्र हो गया
दुश्मन भी लगता है कि मित्र हो गया
डूबा हुआ था जो पाप के समंदर में
फीता काटने के लिए वही पवित्र हो गया
            
ले रहा था जाम मैं तो जुनुने इश्क में
नजरों का सागर माहरू ने बढ़ा दिया
गिरा पैमाना हाथ से छूट कर ज़मीं पर
नजरों से पिला के नशा और चढ़ा दिया
 
( डाॅ0 भोला प्रसाद आग्नेय, बलिया )
Facebook Comments