बचपन
क्या बात करूं मैं बचपन की तथा कहानी अपनेपन की रहती थी कितनी आज़ादी होवे चाहे जो बर्बादी मुझे बचा लें दादा- दादी कहें हमें गुलाब उपवन की
क्या बात करूं मैं बचपन की तथा कहानी अपनेपन की रहती थी कितनी आज़ादी होवे चाहे जो बर्बादी मुझे बचा लें दादा- दादी कहें हमें गुलाब उपवन की
“डॉ 0 भोला प्रसाद आग्नेय, (75) पूर्व प्रवक्ता , बलिया, निष्पक्ष प्रतिनिधि के लेखक है और इस समय कोरोना से ग्रसित है , प्रस्तुत हैं उनकी कुछ पंक्तिया covid –
जब तक दरबारी कवियों ने , किया है खुद पर नाज बेचा है रचनाओं को , बनाकर लहसुन प्याज | तब तक देश गुलाम रहा है ,
जीवन की कड़ुवी घूंट पिए जा रहा हूं पैबन्द पर पैबन्द सिए जा रहा हूं घुट घुट कर मरता हूं हर रोज हर कदम फिर भी न जाने
शुरू करते ही मंगलाचरण जिन्दगी का किया दुशासन ने चीरहरण जिन्दगी का खो गया था मै तो इंसानों की भीड़ में पढा दिया पशुओं ने व्याकरण जिन्दगी का सफेदी बाल
एक सावन की तलाश है, एक सावन का अभ्यास है। एक सावन से संसार है, एक सावन के आने का इंतज़ार है। मैं खुद में एक तूफान बटोरे,एक सावन से
माटी हूँ, मैं माटी हूँ अरसों से सावन की मैं प्यासी हूँ| इस जेठ दुपहरी धूप में जैसे, पवन का झोंका चलता है। इन गरम हवाओं की सन सन
भूख से तड़पा है बच्चा माँगता कुछ रोटियाँ, एक निवाले के लिये दर-दर से मांँगे रोटियाँ। है नहीं कोई जहाँ में जिसको अपना कह सके, ढूंढती आँखें उसे अब
कब से बच्चे तरस रहे थे सपने उनके बिखर रहे थे पापा के संग कब खेलेंगे पापा से कब गप्पे मारेंगे पापा मम्मी को संग लेकर पार्क में झूला झूलेंगे
सच बोलने की कसम खाने से दुश्मनी हो गई सारे जमाने से मै अपनी माँ का सबक भूलूं कैसे कि लगेगा पाप सच छुपाने से रूठता कौन है अपनों से
सच बोलने की कसम खाने से दुश्मनी हो गई सारे जमाने से मै अपनी माँ का सबक भूलूं कैसे कि लगेगा पाप सच छुपाने से रूठता कौन है अपनों से