पत्रकारिता
धूप जब शब्दों की तरह फैलती है और छायाएँ संपादकीय रेखाओं जैसी खिंच जाती हैं—उस समय हम समझ पाते हैं कि ‘मीडिया’ कोई वस्तु नहीं, वह एक सतत स्पंदन है
धूप जब शब्दों की तरह फैलती है और छायाएँ संपादकीय रेखाओं जैसी खिंच जाती हैं—उस समय हम समझ पाते हैं कि ‘मीडिया’ कोई वस्तु नहीं, वह एक सतत स्पंदन है
भारत जैसे कृषि-प्रधान देश में यह एक विडंबना है कि कृषि की पढ़ाई करने वाले युवा खुद खेती करने से कतराते हैं। यह सवाल केवल एक प्रवृत्ति नहीं, बल्कि ग्रामीण
चैती या चइता चैत माह पर केंद्रित लोक-गीत है।यह भोजपुरी क्षेत्र का लोक गीत है। इसकी भाषा भोजपुरी है।इसे अर्ध-शास्त्रीय गीत विधाओं में भी सम्मिलित किया जाता है तथा
वसंत केवल एक ऋतु नहीं , जीवन की लालित्यपूर्ण पुनर्रचना है। इसकी आभा में सजीवता का माधुर्य और काव्यात्मकता का सहज प्रवाह है। यह कालिदास की काव्य-कल्पना में शृंगार की
भारत का गणतंत्र दिवस केवल एक तिथि नहीं है, न ही यह केवल औपचारिक झंडारोहण और परेड का अवसर है। यह भारतीय लोकतंत्र के विकास और सांस्कृतिक पुनर्निर्माण का जीवंत
दर्शन शास्त्री फ्रैंकल की लोगोंथेरेपी की अवधारणा बताती है कि,व्यक्ति कठिनाइयों को सहन कर सकता है यदि वे अपने दुख को उद्देश्यपूर्ण मानते हैं। ऐसे दृष्टिकोण लोगों को गरिमा और
खेती सिर्फ आजीविका का साधन ही नहीं है, बल्कि यह जीवन की गुणवत्ता को सुधारने और समाज को स्थिरता प्रदान करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। खेती करना न केवल
आज यथार्थ छवियों और चिह्नों में परिवर्तित होने लगा है। दीप की ज्वलनशीलता और प्रकाशधर्मिता के प्रतीक के रूप में हम स्मृति को जीते हैं, यानी स्मृति की स्वतंत्रता! रिल्के
भारत की स्वतंत्रता संघर्ष केवल ब्रिटिश हूकूमत के खिलाफ नहीं थी बल्कि एक ऐसी शक्ति के खिलाफ थी जिसका जन्म औद्योगिक क्रांति का प्रतिफल था। भारत की आजादी की
मानव सभ्यता का इतिहास इस सत्य को उजागर करता है कि मनुष्य ने अपने अतीत को सुरक्षित रखने का प्रयास किया, क्योंकि विधाता की सृष्टि में मनुष्य उसकी सर्वश्रेष्ठ रचना
मानव सभ्यता का इतिहास इस सत्य को उजागर करता है कि मनुष्य ने अपने अतीत को सुरक्षित रखने का प्रयास किया, क्योंकि विधाता की सृष्टि में मनुष्य उसकी सर्वश्रेष्ठ रचना