“बहु रुपिया”
बहुरुपियों के चाल से खुद को रखिये संभाल, वरना एक दिन आएगा आप हो जाएंगे बेहाल । खुद के भीतर झांके नहीं औरों को दे
बहुरुपियों के चाल से खुद को रखिये संभाल, वरना एक दिन आएगा आप हो जाएंगे बेहाल । खुद के भीतर झांके नहीं औरों को दे
अहंकार को छोड़ो तुम खुद के भीतर झांको भूले से भी कभी नहीं कमतर किसी को आंको । चार दिनों का जीवन है
मैं कोई कवि नहीं हूँ जो शब्दों की परख कर सके या बता सके कि कौन-सा बिंब उचित होगा तुम्हारे दुःख के लिए। चिड़ियों से कोई
देखो आज आया तीज का त्योहार मन में छाई है आज खुशियां अपार । मेरे सजना की उमर लम्बी हो मेरा सजना स्वाबलम्बी हो शिव-शक्ति से यही करती हूं दुआ
आंख खोलकर देखो दरिंदों दुर्दिन तेरा आ गया , बहुत हंसे थे उस दिन, मातम,आज तेरे घर छा गया । कमजोर मान सिंदूर को मेरे तुमने
हाथ पसारे आया द्वारे विनती सुन लो मां काली, मेरे संकट हर लो माते झोली भर दो है खाली । महिमा तेरी बड़ी निराली अदभुत रूप है छवि तेरी,
जन्म हुआ था मेरा 22 माच 1912 को, तब से लेकर आज तक मैं मेहनत का आधार हूं । हां जी हां मैं बिहार हूं । मेरी पहचान है धोती
कभी कोई गुलाल-सा उड़ता हवा में घुलकर गुम हो जाता कोई अबीर-सा झरता हथेलियों पर मन की रेखाओं में भर जाता। कुछ लोग पानी के रंगों जैसे होते हैं
नारी हूं अबला नहीं मैं हूं प्यार की खान, जो सच्चा मुझसे प्रेम करे मै हूं उसपे कुर्बान । मैं ही जग की जननी हूं हूं पुरुषों का अभिमान
आज के कलियुगी मानव की हकीकत बस इतनी सी है, वो साथ में बैठ के हसेंगे भी,
आज के कलियुगी मानव की हकीकत बस इतनी सी है, वो साथ में बैठ के हसेंगे भी,