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By : Kripa Shankar | Published Date : 26 May 2021 9:48 AM |   2034 views

सिद्धार्थ गौतम से भगवान बुद्ध

श्रृष्टि भी एक बार जरूर सोचती होगी कि आखिरकार इक्ष्वाकु वंशीय क्षत्रिय शाक्य राजवंश के राजा शुद्धोधन का प्रिय राज कुमार सिद्धार्थ परिवार सुख ,राज सुख,वैभव सुख और राजपाठ का मोहमाया ,अपने नवजात शिशु राहुल और धर्मपत्नी यशोधरा का  परित्याग कर क्यों  रात में  ही वन के लिए  प्रस्थान कर दिया।
जन्म के सात दिन बाद ही माता महामाया के मृत्यु की चिंता, मौसी महाप्रजापती गौतमी का पालन पोषण में कोई  कमी और दुर्व्यवहार अथवा धर्मपत्नी यशोधरा से कुछ भेद का तो कारण  नहीं।
आज इतिहास कारों ने ऐतिहासिक घटनाओं में राजा और राजकुमार विषयक अध्ययन में केवल इसी बिंदु पर यथार्थ को आधारगत मानते हुए कि यह तो दैवीय चमत्कार होना ही था की वह  पूरी दुनिया की मानव पीड़ा  अपने आधिपत्य में  सजोकर एक दिन अवश्य आध्यात्मिक सम्राट बनेगा। विरक्तता का वास्तविक कारण प्रकाश में जो आया वह  संसार को जरा,मरण,दु:खों से मुक्ति दिलाने के मार्ग एवं सत्य दिव्य ज्ञान की खोज था।
सिद्धार्थ जो अब भगवान बुद्ध  हैं,का जन्म 563 ई.पूर्व बैसाख मास की पूर्णिमा को लुंबिनी ,शाक्य राज्य जो आज नेपाल में है राजा शुद्धोधन के घर हुआ था।उनकी मां का नाम महामाया जो कोलीय वंश से थीं,जिनका इनके जन्म के  सात दिन बाद निधन हुआ और उनका पालन पोषण महारानी की छोटी  सगी बहन महाप्रजापती
 गौतमी ने किया।  29 वर्ष की आयु में सिद्धार्थ मात्र प्रथम नवजात शिशु राहुल और धर्मपत्नी  यशोधरा को त्यागकर रात्रि में ही बन की ओर प्रस्थान कर दिए थे।
राजपाठ  से पूर्णतः निवृत्त होकर वर्षों की कठोर साधना के पश्चात बोधगया (बिहार) में बोधि वृक्ष के नीचे उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई और वे सिद्धार्थ से भगवान बुद्ध बन गए।
 इसी पूर्णिमा के दिन ही 483 ई.पूर्व 80वर्ष की आयु में कुशानारा (अभी कुशी नगर) में महापरिनिर्वाण हुआ और इसी दिन वैशाख पूर्णिमा से बुद्ध पूर्णिमा मनाया जाने लगा।  बुद्ध पूर्णिमा बौद्ध अनुयाई पूरी दुनिया में हर्षोल्लास से मनाते हैं। गौतम बुद्ध एक श्रवण थे जिनकी शिक्षाओं पर बौद्धधर्म और बौद्धदर्शन का प्रचलन हुआ।
बौद्ध धर्म ग्रंथ पिटक-
हिंदू धर्म में वेदों का जो स्थान है,बौद्ध धर्म में वहीं स्थान पिटकों का है।
भगवान बुद्ध अपने हाथ से कुछ नहीं लिखे।  शिष्यों को  सभी उपदेश कंठस्थ याद होते थे और  फिर लिखने के बाद उन्हें पेटियों में रखते थे ,इसी से नाम पड़ा पिटक।
पिटक तीन हैं-
 इन्हें त्रिपिटक भी कहा जाता है।
1. विनय पिटक – 
यह भिक्षु संघ के  भिक्षु और भिक्षुणियों को प्रतिदिन जीवन में किन किन नियमों का पालन करना है,के लिए लिखा  गया है।
2. सुत्त पिटक
सबसे महत्व पूर्ण पिटक सुत्त पिटक है,जिसमें बौद्ध धर्म  के सभी मुख्य और मूल सिद्धांतों को स्पष्टता से समझाया गया है।
3.अभिधम्म पिटक-
  अभिधम्म पिटक में धर्म और उसके क्रिया कलापों की व्याख्या पंडिताऊ ढंग से की गई है। वेदों में जिस तरह ब्राह्मण ग्रन्थ है,उसी तरह पिटको में अभिधम्म पिटक है।
धम्मपद-
 हिंदू धर्म में गीता का जो स्थान है , बौद्ध धर्म में वहीं स्थान धम्मपद का है। गीता जिस प्रकार महाभारत का अंश है , ठीक उसी तरह धम्मपद सुत्त पिटक के खुद्दक निकाय का एक अंश है।  धम्मपद में 26 वग्ग और423 श्लोक हैं।
गौतम बुद्ध के उपदेश-
1. एक पल एक दिन को बदल सकता है, एक दिन एक जीवन को बदल सकता है और एक जीवन इस दुनिया को बदल सकता है।
2. क्रोध को प्यार से,बुराई को अच्छाई से,स्वार्थी को उदारता से और झूठे व्यक्ति को सच्चाई से जीता जा सकता है।
3. इस पूरी दुनिया में इतना अंधकार नहीं है कि वह एक छोटे से दीपक के प्रकाश को मिटा सके।
4. एक जलते हुए दीपक से हजारों दीपक रोशन किए जा सकते हैं,फिर भी उस दीपक की रोशनी कम नहीं होती है।ठीक उसी तरह
खुशियां बांटने से बढ़ती हैं,कम नहीं होती हैं।
धर्म- चक्र प्रवर्तन –
आषाढ़ की पूर्णिमा को काशी के पास मृगदाव जो वर्तमान में सारनाथ है ,भगवान बुद्ध ने सर्वप्रथम धर्मोपदेश दिया और प्रथम पांच मित्रों को अपना अनुयाई बनाकर सभी को धर्म प्रचार के लिए भेज दिया।
महाप्रजापती गौतमी (बुद्ध की विमाता) को सर्व प्रथम बौद्ध संघ में प्रवेश मिला।
ईसाई और इस्लाम धर्म के बाद बौद्ध धर्म दुनियां का तीसरा सबसे बड़ा धर्म है,इसके प्रस्थापक महात्मा बुद्ध शाक्य मुनि (गौतम बुद्ध ) थे।
 बौद्ध धर्म के दो मुख्य संप्रदाय हैं : महायान और वज्रयान।
यह भारत भूमि धन्य है जो ऐसे मानवता के पुजारी , हिंसा के प्रति घृणा, माया से अमाया के अग्रदूत भगवान बुद्ध को ज्ञान दर्पण बनाकर पूरे विश्व की निगाहों को बुद्ध दर्शन की ओर मोड़ दिया।यह भी सिद्ध कर दिया की राजा के बेटे अपनी जिंदगी भोग विलास में ही नहीं बल्कि विश्व गुरु बनकर दुनियां के आध्यात्मिक और धार्मिक सम्राट भी बन सकते हैं,और बने भी सिद्धार्थ गौतम से भगवान बुद्ध।
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