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By : Nishpaksh Pratinidhi | Published Date : 2 Feb 2026 7:13 PM |   489 views

एक अच्छे लाइब्रेरियन की लाइब्रेरी मे भूमिका

भारत के दिल मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में स्थित मौलाना आज़ाद सेंट्रल लाइब्रेरी में इंटर्नशिप के दौरान एक दिन एक विद्यार्थी ने बड़े आश्चर्य के साथ मुझसे पूछा—इतनी सारी किताबों के बीच आपको वही किताब कैसे मिल जाती है, जिसे हम ढूँढते रहते हैं और हमें नहीं मिलती?
 
उस क्षण मुझे गहरी संतुष्टि के साथ अपने काम की ताक़त का एहसास हुआ। यह केवल किसी पुस्तक को ढूँढ लेने की बात नहीं थी, बल्कि उस ज्ञान, प्रशिक्षण और समझ की पहचान थी जो एक लाइब्रेरियन को पाठक से जोड़ती है। एक इंटर्न के रूप में यह मेरा पहला अनुभव था, जब मुझे यह समझ में आया कि लाइब्रेरी में किया जाने वाला यह शांत और अक्सर अनदेखा किया जाने वाला कार्य वास्तव में कितना महत्वपूर्ण है। यह ऐसा कार्य है जो न केवल पाठक की सहायता करता है, बल्कि समाज को ज्ञान से जोड़ने का माध्यम भी बनता है।
 
इसी अनुभव ने मुझे यह सोचने पर मजबूर किया कि एक अच्छा लाइब्रेरियन कौन होता है और लाइब्रेरी में उसकी भूमिका कितनी निर्णायक है?
 
लाइब्रेरियन केवल किताबों का रखरखाव करने वाला या उन्हें अलमारियों में सलीके से सजाने वाला व्यक्तित्व नहीं होता है। वह पुस्तकों को उनकी पहचान दिलाने वाला, उन्हें सही सन्दर्भ में पाठक तक पहुँचाने वाला और ज्ञान के उस सेतु का निर्माण करने वाला होता है, जिसके माध्यम से समाज के हर वर्ग तक विचार, प्रश्न और ऐसे मुद्दे पहुँच सकते हैं जो अक्सर सामने नहीं आ पाते। इसी संदर्भ में एक अच्छे लाइब्रेरियन के गुणों को समझना आवश्यक हो जाता है।
 
एक अच्छे लाइब्रेरियन के गुण-
1. पाठक को समझने की क्षमता-
एक अच्छा लाइब्रेरियन सबसे पहले पाठक की आवश्यकता को समझता है। हर पाठक का उद्देश्य अलग होता है—कोई परीक्षा की तैयारी के लिए आता है, कोई शोध के लिए और कोई केवल पढ़ने की आदत विकसित करने के लिए। सही पुस्तक तक सही पाठक को पहुँचाना लाइब्रेरियन की सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।
 
2. संग्रह और विषय का ज्ञान-
लाइब्रेरी में उपलब्ध पुस्तकों और संसाधनों की जानकारी ही वह आधार है, जिसके माध्यम से लाइब्रेरियन सीमित समय में भी उपयुक्त सामग्री खोज पाता है। यही गुण पाठक के मन में लाइब्रेरियन के प्रति विश्वास उत्पन्न करता है।
 
3.निरंतर सीखने की प्रवृत्ति-
ज्ञान का स्वरूप लगातार बदल रहा है। आज के समय में एक लाइब्रेरियन को प्रिंट पुस्तकों के साथ-साथ डिजिटल संसाधनों, ई-बुक्स और ऑनलाइन डेटाबेस की भी समझ होनी चाहिए, ताकि वह समय के साथ प्रासंगिक बना रह सके।
 
4. धैर्य और संवेदनशील व्यवहार-
लाइब्रेरी में आने वाला हर पाठक आत्मविश्वास से भरा हो, यह आवश्यक नहीं। कई बार पाठक अपनी आवश्यकता स्पष्ट रूप से व्यक्त नहीं कर पाता। ऐसे में लाइब्रेरियन का धैर्यपूर्ण, सहयोगी और संवेदनशील व्यवहार ही पाठक को सीखने और पढ़ने के लिए प्रेरित करता है।
 
5. मार्गदर्शक की भूमिका-
एक अच्छा लाइब्रेरियन केवल पुस्तक प्रदान करने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह पाठक को पढ़ने की सही दिशा भी दिखाता है। वह किताब और पाठक के बीच एक ऐसा संबंध स्थापित करता है, जिससे ज्ञान सार्थक बनता है।
 
रंगनाथन के सिद्धांत और उनकी प्रासंगिकता
भारतीय लाइब्रेरी विज्ञान के जनक डॉ. एस. आर. रंगनाथन द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। उनका पहला नियम— “Books are for use”—यह स्पष्ट करता है कि पुस्तकें केवल अलमारियों की शोभा बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि पाठकों के उपयोग के लिए होती हैं।
 
इसी प्रकार “Every reader his or her book” का आशय यह है कि प्रत्येक पाठक की आवश्यकता अलग होती है और लाइब्रेरियन का दायित्व है कि वह उस आवश्यकता को समझकर सही पुस्तक तक पाठक को पहुँचाए। मौलाना आज़ाद सेंट्रल लाइब्रेरी, भोपाल, मध्यप्रदेश में इंटर्नशिप के दौरान ऐसे कई क्षण देखने को मिले, जब सही मार्गदर्शन से पाठक को उसकी ज़रूरत की पुस्तक मिली और रंगनाथन जी के सिद्धांत व्यवहार में साकार होते दिखाई दिए।
 
डिजिटल युग की चुनौतियाँ और लाइब्रेरियन की भूमिका-
आज के समय में बच्चों और युवाओं का झुकाव पुस्तकों की अपेक्षा मोबाइल, टीवी और सोशल मीडिया की ओर अधिक हो गया है। छोटे-छोटे वीडियो और रील्स के इस दौर में गहन अध्ययन और पढ़ने की आदत धीरे-धीरे कम होती जा रही है।
 
ऐसे समय में यह प्रश्न और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि पुस्तकों के महत्व का बीज समाज, विशेषकर बच्चों के मन में कैसे बोया जाए। इस दिशा में लाइब्रेरियन की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। वह न केवल पुस्तक सुझाने वाला होता है, बल्कि पढ़ने की रुचि विकसित करने वाला मार्गदर्शक भी होता है। विभिन्न गतिविधियों, संवाद और पुस्तक-प्रदर्शन के माध्यम से वह पाठक और पुस्तक के बीच टूटते संबंध को फिर से जोड़ सकता है।
 
निष्कर्ष-
एक अच्छी लाइब्रेरी की आत्मा उसका लाइब्रेरियन होता है। बिना एक संवेदनशील, जागरूक और समर्पित लाइब्रेरियन के, लाइब्रेरी केवल पुस्तकों का संग्रह बनकर रह जाती है लेकिन जब वही लाइब्रेरियन अपने दायित्व को समझते हुए कार्य करता है, तब लाइब्रेरी ज्ञान का जीवंत केन्द्र बन जाती है।
 
एक इंटर्न के रूप में मिले छोटे-छोटे अनुभवों ने मुझे यह सिखाया है कि लाइब्रेरियन का कार्य भले ही शांत और पर्दे के पीछे हो, लेकिन उसका प्रभाव गहरा और दूरगामी होता है। शायद यही कारण है कि एक अच्छा लाइब्रेरियन न केवल पाठक के वर्तमान को, बल्कि समाज के भविष्य को भी दिशा देता है।
 
सुमन लता शर्मा ,इंटर्न स्कॉलर ,मौलाना आज़ाद सेंट्रल लाइब्रेरी,भोपाल
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