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By : Nishpaksh Pratinidhi | Published Date : 25 Feb 2026 6:47 PM |   410 views

“कथक और अष्टछाप कवित्त का समन्वय

खजुराहो नृत्य महोत्सव 2026 के अंतर्गत विदुषी रजनी राव द्वारा प्रस्तुत व्याख्यान-प्रदर्शन “कथक और अष्टछाप कवित्त का समन्वय” कला-जगत के लिए एक गंभीर, शोधपरक और सौंदर्यपूर्ण अनुभव सिद्ध हुआ। मंदिरों की शिल्प-भित्तियों और सांध्य आलोक के बीच संपन्न इस प्रस्तुति ने नृत्य और साहित्य के अंतर्संबंध को न केवल व्याख्यायित किया बल्कि उसे सजीव भी कर दिया।
 
इस व्याख्यान-प्रदर्शन का मूल उद्देश्य कथक की परंपरा को उसके साहित्यिक स्रोतों से जोड़ते हुए यह स्पष्ट करना था कि भक्तिकालीन काव्य, विशेषकर अष्टछाप कवियों की रचनाएँ, किस प्रकार कथक की संरचना, लय और भाव-व्यंजना में स्वाभाविक रूप से रची-बसी हैं। रजनी राव ने शास्त्रीय आधार, ताल-रचना, पद-विन्यास और अभिव्यक्ति-शिल्प की व्याख्या करते हुए यह दिखाया कि कथक केवल नृत्य-प्रदर्शन नहीं बल्कि काव्य की देहधारी अभिव्यक्ति है।
 
कार्यक्रम में अष्टछाप परंपरा के प्रमुख कवियों के पदों को विविध नृत्य-रूपों में रूपांतरित कर प्रस्तुत किया गया।
 
 प्रथम प्रस्तुति में परमानंद दास के पद का कवित्त में रूपांतरण कर उसे धमार ताल में निबद्ध किया गया। धमार की गंभीर लय और ब्रजभाषा की काव्यात्मकता के बीच अद्भुत संतुलन स्थापित हुआ। बोल-पढ़ंत की स्पष्टता, तिहाइयों की संयोजना तथा भावाभिव्यक्ति की नियंत्रित गरिमा ने दर्शकों को लय और अर्थ की संयुक्त यात्रा पर आमंत्रित किया।
 
द्वितीय प्रस्तुति में गोविंद नाथ के पद को कवित्त रूप में ढालकर झपताल में प्रस्तुत किया गया। यहाँ ताल-रचना की जटिलता और गतिभाव की स्फूर्ति का सशक्त संयोजन दृष्टिगोचर हुआ। नृत्यांगना ने हस्त-मुद्राओं, नेत्र-संचालन और पदचालन के माध्यम से काव्य के सूक्ष्म अर्थों को उकेरा। यह प्रस्तुति तकनीकी दृढ़ता और भावात्मक ऊष्मा का संतुलित उदाहरण रही।
 
तृतीय प्रस्तुति में चतुर्भुज दास के पद को ठुमरी शैली में प्रस्तुत किया गया। यहाँ रसानुभूति, नायिका-भाव और सूक्ष्म अभिनय का विस्तार दिखाई दिया। लय की मृदुलता और भाव की आंतरिकता ने मंच पर एक आत्मीय वातावरण निर्मित किया, जिसमें शब्द, स्वर और शरीर-भाषा एकाकार हो उठे।
 
इस संपूर्ण व्याख्यान-प्रदर्शन की विशेषता उसका शिक्षणात्मक और शोधपरक स्वरूप रहा। रजनी राव ने प्रत्येक रचना को पहले अपने शिष्यों को सिखाया। शिष्यों द्वारा की गई पढ़ंत ने दर्शकों को ताल और शब्द की संरचना समझने का अवसर दिया। तत्पश्चात उन्होंने उसी संरचना के आधार पर नृत्य-प्रदर्शन प्रस्तुत किया, जिससे सिद्ध हुआ कि कथक में साहित्य की अंतर्धारा किस प्रकार गति और भाव में परिणत होती है।
 
यह प्रस्तुति इस बात का सशक्त प्रमाण रही कि कथक और साहित्य परस्पर अभिन्न कलात्मक आयाम हैं।
 
 कथावाचन की परंपरा से उद्भूत कथक में शब्द केवल उच्चारित नहीं होते, वे देह और लय में परिवर्तित होकर दृश्य-अनुभव का रूप ले लेते हैं। इस दृष्टि से यह कार्यक्रम केवल एक मंचीय प्रस्तुति नहीं, बल्कि शोध, परंपरा और सृजनात्मकता का त्रिवेणी-संगम था, जिसने खजुराहो की सांस्कृतिक गरिमा में एक और अध्याय जोड़ दिया।
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