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By : Nishpaksh Pratinidhi | Published Date : 18 Feb 2026 7:41 PM |   184 views

राज्य संग्रहालय में 18 से 28 फरवरी तक चलेगा विशेष व्याख्यान, लखनऊ में जुटेंगे देशभर के विद्वान

लखनऊ: उत्तर प्रदेश संस्कृति विभाग द्वारा राज्य संग्रहालय लखनऊ में 18 से 28 फरवरी 2026 तक “कला अभिरुचि पाठ्यक्रम” आयोजित किया जा रहा है, जिसका शुभारम्भ आज राज्य संग्रहालय के सभागार में हुआ।
 
कार्यक्रम का उद्घाटन मुख्य अतिथि प्रो0 माण्डवी सिंह, कुलपति, भातखण्डे संस्कृति विश्वविद्यालय, मुख्य वक्ता प्रो0 के0 के0 थप्पल्याल, विशिष्ट अतिथि संजय कुमार बिसवाल और डा0 सृष्टि धवन ने किया।
 
प्रो0 माण्डवी सिंह ने कहा कि कला अभिरूचि जैसे आयोजनों के माध्यम से समाज में कला और संस्कृति की भावना जीवन्त होती है। उन्होंने इस अद्भुत कार्यशाला के आयोजन को जन सामान्य से जोड़ने का एक सशक्त माध्यम बाताया।
 
इस कार्यक्रम के मुख्य वक्ता प्रो0 के0 के0 थप्पल्याल पूर्व विभागाध्यक्ष, प्रा0भा0इ0 एवं पुरातत्व विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय ने अपने व्याख्यान में कला के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि कला मनुष्य के लिए उतनी ही आवश्यक है जितनी जीवन की अन्य विधाएं।
 
उन्होंने भर्तृहरि के कथन का उल्लेख करते हुए कहा कि साहित्य, संगीत और कला से विहीन मनुष्य की स्थिति पशु के समान है, केवल उसके पूंछ और सींग नहीं होते। उन्होंने बताया कि मानव अति प्राचीन काल से कला का सृजन करता आया है और प्रागैतिहासिक काल के अवशेष भारत में ‘भीमबेटका’ (भोपाल के निकट) में प्राप्त होते हैं, जो प्रागैतिहासिक चित्रों का सबसे बड़ा स्थल है।
 
उन्होंने कहा कि कला का रस लेने के लिए दर्शक में भी कुछ योग्यताएं होनी चाहिए, कला स्वयं में महत्वपूर्ण है, लेकिन जब उसे कोई मर्मज्ञ देखता है तो उसका महत्व और बढ़ जाता है। भारतीय कला का आदर्श योगी है और भारत में कला के प्रतीकों की बहुलता मिलती है, जो उसकी विषयवस्तु की महत्ता को दर्शाती है।
 
इस पर ’पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह’ ने बताया कि यह पाठ्यक्रम विद्यार्थियों, शोधार्थियों और कला में रुचि रखने वाले सभी लोगों के लिए बेहद उपयोगी साबित होगा। उन्होंने बताया कि इस कार्यक्रम के माध्यम से प्रतिभागियों को भारतीय कला, इतिहास और संग्रहालय से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां सरल और स्पष्ट भाषा में दी जाएंगी, ताकि वे इन विषयों को बेहतर ढंग से समझ सकें और अपनी जानकारी को और मजबूत बना सकें।
 
इस कार्यक्रम में 19 फरवरी को “प्राचीन कला का उद्भव एवं विकास-कुछ विचार” विषय पर डॉ. राकेश तिवारी (पूर्व महानिदेशक, भा.पु.स. नई दिल्ली) व्याख्यान देंगे।
 
20 फरवरी को “गुप्त कालीन कला में सांस्कृतिक चेतना” विषय पर लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रो. एस.एन. कपूर बोलेंगे।
 
21 फरवरी को “मिनिएचर मार्बल्सरू शाही संरक्षण, परंपरा, तकनीक और कलात्मक उत्कृष्टता” विषय पर डॉ. विजय माथुर, सलाहकार (संग्रहालय), संघ लोक सेवा आयोग, व्याख्यान देंगे।
 
22 फरवरी को “क्यों किसी को संग्रहालय जाना चाहिए” विषय पर , काशी हिंदू विश्वविद्यालय की प्रो. ऊषा रानी तिवारी, पूर्व विभागाध्यक्ष, संग्रहालय विज्ञान विभाग व्याख्यान देंगी।
 
साथ ही 24 फरवरी को “भारत की प्राचीन मौद्रिक यात्रा” विषय पर डॉ. अमित कुमार उपाध्याय, एसोसिएट प्रोफेसर, काशी हिंदू विश्वविद्यालय व्याख्यान देंगे।
 
25 फरवरी को “प्रागैतिहासिक भारत की संस्कृतियां” विषय पर प्रो. अनिल कुमार, विभागाध्यक्ष पुरातत्व विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय बोलेंगे।
 
26 फरवरी को “गुप्त कालीन भारतीय वास्तुकला” विषय पर डॉ. राजीव द्विवेदी, निदेशक, वृन्दावन शोध संस्थान व्याख्यान देंगे।
 
27 फरवरी को “संग्रहालय की वस्तुओं का निवारक संरक्षण” विषय पर धर्मेन्द्र मिश्रा, निदेशक, इंटैक लखनऊ अपने विचार साझा करेंगे। वहीं 28 फरवरी को प्रमाण-पत्र वितरण के साथ कार्यक्रम का समापन होगा।
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