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By : Kripa Shankar | Published Date : 1 Feb 2021 3:50 PM |   1146 views

पूंजीवाद का उदय

जड़ वस्तु के पाने की सीमाहीन इक्षा ही पूंजीवाद को जन्म दिया है।जमीन जायदाद, रुपया पैसा ,धातु वाली, अधातु वाली, क्रय विक्रय की सामग्रियां, ये सब जड़ जागतीक धन-संपत्तियों के संग्रह की मानसिकता ही पूंजीवाद का प्रधान कारण है।
अर्थनैतिक क्षेत्र में मनुष्य जहां भी अपरिग्रह (जीवन रक्षा हेतु प्रयोजनीय  चीजों को छोड़ अतिरिक्त जागतीक भोग्य पदार्थो का परित्याग) नीति का उल्लंघन करता है वही शोषण का सूत्रपात होता है। मनुष्य अस्तित्व रक्षा तथा प्रगति के लिए जितना प्रयोजनीय है उससे भी अधिक संचय करता है।शोषक इस मौलिक सत्य को भूल जाता है कि जगत की भौतिक संपदा अत्यंत सीमित है। मानसिक  आभोग एक अंतहीन इच्क्षा से परिचालित होता है ।सीमित जागतिक संपद से ही असीमित मानसिक भूख को मिटाना चाहता है और वही पर शोषण शुरू होता है।
परिणाम स्वरूप मुट्ठी भर मनुष्य पूंजीवादी बन जाता है और बाकी सब शोषित गरीब हो जाता है। इस अवस्था में लाख-लाख मनुष्य अन्न के अभाव में मर जाता है, घर विहीन हो जाता है, शिक्षा के अभाव में मनोविकास नहीं कर पाता है, बिना चिकित्सा के कष्ट पाता है और उपयुक्त वस्त्र के अभाव में जीवन यापन करता है। समाज स्पष्ट रूप में  दो भागों में विभक्त हो जाता है धनी और निर्धन। प्रथम है पूंजीवादी शोषक और द्वितीय है शोषित गोष्टी विक्षुब्ध शुद्र।
मनुष्य की भौतिक संपद संचय करने की वृत्ति, बेलगाम मानसिक भूख या आभोग एक स्वाभाविक प्रवणता है और निर्मम शोषण के द्वारा इसे परितृप्त करना चाहता है। इस अमानवीय शोषण का ही परिणाम है कोटि-कोटि मनुष्य आज दरिद्र जीवन व्यतीत कर रहे हैं। पूंजीवाद का ही अभिशाप समग्र मानव समाज में व्यापक अभाव और जन दरिद्र ले आता है और इस वैश्य शोषण का सूत्रपात निहित है जागतिक वस्तु संचय की तृप्तिहीन क्षुदा में। शोषण की यह  अनियंत्रित अतृप्त मानसिक भूख मनुष्य के मौलिक मानवीय मूल्य को अस्वीकार करती है और विभिन्न ध्वंसात्मक  क्रियाकलाप के माध्यम से आत्मप्रकाश पाती है। यह अतृप्त मानसिक एषणा और आभोग ही अंत में पूंजीवाद का कारण होता है।
पूंजीवाद मानवता विरोधी है। पूंजीवाद में ही व्यापक रूप से बेकारी समस्या, नैतिक पतन, सांस्कृतिक विकृति ,सामाजिक भेद, विभेद, अर्थ नैतिक अस्थिरता, राजनैतिक उच्छृंखलता, उपधर्मीय भाव जड़ता और मानवता का हनन अत्यधिक होता है। समाज को इस वैश्य शोषण से छुटकारा देने के लिए पूंजीवाद को समाप्त करना होगा। इसके लिए मानसाध्यात्मिक प्रक्रिया की सहायता से बेलगाम मानसिक एष्णा और आभोग को नियंत्रण में लाना होगा। ऐसा करने से ही यह धूल धूसरित धरती सबों के हित में स्वर्ग के रूप में दृष्टिगोचर होगी।
सर्वे   भवंतु      सुखिनः   सर्वे  संतु   निरामया ,
सर्वे भद्राणि पश्यंतु मां कश्चित् दुख भाग भवेत्।
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