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By : Kripa Shankar | Published Date : 3 Dec 1:33 PM

समन्वित खेती

  
युग द्रष्टा, युग स्रष्टा  प्रभात रंजन सरकार जी का कथन है:
“Because food is the most essential commodity, agriculture is the most important part of the economy and should have the same status as industry including wage rate.”
इस प्रकार कृषि सभी उद्योगों में प्रधान व महत्वपूर्ण उद्योग है। वर्तमान विश्व में कृषि असंगठित एवं  अनियोजित और  अवहेलित अवस्था में पड़ी है। पूर्ण विकास के लिए कृषि की सम्यक योजना बनाकर समन्वित खेती की व्यवस्था ग्रहण करना अत्यावश्यक है।
समन्वित खेती की विशद चर्चा कर  आनंदमूर्ति जी ने समन्वित खेती की व्यवस्था को वैज्ञानिक स्वरूप प्रदान किया है। समन्वित खेती का तात्पर्य है मनुष्य की आवश्यकता की लगभग सभी चीजों के उत्पादन की व्यवस्था जिसको कृषि से जोड़ा जा सके। इसलिए कृषि फॉर्म के साथ साथ निम्नलिखित फॉर्मिंग को भी संलग्न करना उचित है।
वे हैं- कृषि,  फल उत्पादन, पुष्प उत्पादन, लाह उत्पादन, मधु पालन, दुग्ध उत्पादन ,पशुपालन, मत्स्य पालन, रेशम उत्पादन, सिंचाई, खाद्य उत्पादन एवं उसका  संतुलित उपयोग। औषधीय पौधों एवं लता गुल्मों का उत्पादन, शाक सब्जियों का सम्यक उत्पादन, जल संरक्षण, उन्नत बीज उत्पादन, इत्यादि -इत्यादि समन्वित खेती के अंतर्गत आते हैं.
इन उत्पादित उत्पाद को उपयोग में लाने के उद्देश्य से  कुटीर उद्योग(cottage industry) की स्थापना करके स्थानीय स्तर पर, उपभोक्ता की सामग्री में तब्दील करने की व्यवस्था भी समन्वित खेती के अंतर्गत ही उन्होंने परिगणित किया है।उन्होंने स्पष्ट रूप से इसके अंतर्गत मनुष्य की आवश्यकताओं की लगभग सभी वस्तुओं का उत्पादन करने की सलाह दी है- जैसे भोजन, वस्त्र, आवास, शिक्षा की सामग्री, ( कागज , स्याही,कलम इत्यादि) चिकित्सा के लिए औषधीय पौधों इत्यादि के उत्पादन को समन्वित खेती से जोड़ा है। इतना ही नहीं उन्होंने खेती का (चक्रण)  प्रकार ,औषधि निर्माण, जल संरक्षण इत्यादि की रूपरेखा की विशद चर्चा अपने प्रउत सिद्धांत में की है।
वे चाहते हैं, प्रत्येक क्षेत्र या सामाजिक-आर्थिक  इकाई आत्मनिर्भर बनें। सभी समृद्धि की तरफ द्रुत गति से बढ़ चले ।वे कहते हैं कि मनुष्य अपनी जागतिक  अथवा भौतिक आवश्यकता की पूर्ति हो जाने के पश्चात निश्चिंत होकर बौद्धिक एवं आध्यात्मिक उन्नयन के लिए चेष्टाशील हो सकेगा ।
उन्होंने उपर्युक्त बातों  की अलग-अलग रूपरेखा प्रस्तुत की है। यह सभी कार्य वे सहकारिता के माध्यम से संपन्न कराने के हिमायती हैं क्योंकि सहकारिता के द्वारा ही सबको नियोजित कर यथेष्ट क्रय शक्ति प्रदान की जा सकती है ।समन्वित खेती से समाज के अधिकांश आवश्यकताओं की आपूर्ति संभव है।
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