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By : Nishpaksh Pratinidhi | Published Date : 4 Nov 2021 11:53 AM |   683 views

दीपावली का इतिहास

दीपावली को दीपों का त्योहार कहा जाता है।  दिवाली भारत का सबसे लोकप्रिय और सबसे बड़ा त्यौहार है।यह त्योहार प्रत्येक वर्ष कार्तिक मास के चतुर्दशी तिथि को मनाया जाता है। इस अवसर पर  लोग मिट्टी के दीपक (दिआ ) जलाते हैं और अपने घरों को रंगोली से सजाते हैं।व्यापक रूप से घरों की साफ सफाई, रोगन करते हैं।
 
संस्कृत के क ,त , प , द प्राकृत में ‘ अ ‘ हो जाते हैं । इसलिए ‘ दीप ‘ हो जाता है ‘ दीअ ‘ । ‘ दीप ‘ का अर्थ है आग की शिखा अथवा किसी एक छोटे पात्र में आग जल रही है । प्रदीप का अर्थ है किसी बड़े पात्र में शिखा जल रही है । दीपक का अर्थ है, छोटा है या बड़ा , दूर से ठीक समझ में नहीं आता , लेकिन गरम लग रहा है । जैसे दीपक राग सुनकर शरीर गरम हो जाता है ।
 
हेमन्त ऋतु के प्रारम्भ में प्रचुर कीट-पतंग ‍‌‌‌‌जन्मते हैं जो फसल को क्षति पहुँचाते हैं । अब , प्रत्येक जीव का अपना संस्कार होता है । किन्तु मनुष्य में संस्कारों की प्रचुरता रहती है । एक- एक मनुष्य एक-एक तरीके से चलते हैं । मनुष्यों को एक कम्पार्टमेन्ट में डाला नहीं जा सकता। ‌यद्यपि कई स्वाभाविक धर्म प्रत्येक मनुष्य के एक ही हैं । किन्तु कीट-पतंगों या पशुओं में संस्कारों का प्राचुर्य नहीं है । घेरा अगर टूटा हो तो प्रत्येक बैल बगान में घुस जायेगा । हरी -भरी खेत मे घुस कर चरने लगेगा।उसी तरह कीट- पतंगों का एक स्वाभाविक धर्म है – आग देखते ही उसकी ओर दौड़ पड़ना । 
 
ये कीट – पतंग फसल नष्ट कर देते हैं , इसलिए प्राचीन काल में चतुर्दशी की रात को प्रदीप जला दिये जाते थे । वे उधर दौड़ पड़ते और जल मरते । इससे फसल की उनसे रक्षा होती । साधारण ढंग से कोई बात कहने पर मनुष्य उस पर ध्यान नहीं देता है। कुछ अलंकृत करके कहने पर मनुष्य उसे मान लेता है । चतुर्दशी तिथि को सबसे अधिक अन्धकार रहता है । इसमें अगर बत्ती जलाई जाय तो सभी कीड़े बत्ती के पास आकर जलकर मर जायेंगे , फसल बच जायगी । एस उद्देश्य के लिए भी दीप जलाने की प्रथा हम इतिहास के पन्नो में पाते हैं।
 
इसी  प्रकार दीपावली में दीप जलाने की मान्यता के दो और पक्ष मिलते हैं । एक पक्ष है प्राचीनकाल में तंत्र की साधना । तंत्र की साधना है अंधकार में आलोक का आह्वान । अंधकार के भीतर में प्रकाश की खोज। अन्धकार में निमज्जित मनुष्यों के बीच प्रकाश की प्रभा प्रज्वलित करना  । बाहर – भीतर दीप ज्ञान ला देना । तन्त्र में ऐसा कहा गया है ।अत: इस तिथि को प्राचीनकाल के बौद्ध, तन्त्र में तारा शक्ति की पूजा करते थे । यह तारा तन्त्र चीन से आया था , महर्षि वशिष्ठ लाये थे । इसी कारण तांत्रिकों के लिए अमानिशा के अन्धकार का महत्व है ।
 
बंगाल में इस तारादेवी का रूप होता है श्यामा ।  बौद्ध लोगों ने तन्त्र छोड़कर जब पौराणिक तन्त्र ग्रहण किया तब उन्होंने ‘ तारा शक्ति ‘ को भी ‘ काली ‘ कहना शुरू किया और ‘ श्यामा ‘ को भी ‘ काली ‘ कहना शुरू किया । कालांतर में इन्हें एक कर दिया गया । इसलिए चूँकि तन्त्र की अमानिशा में साधारणत़ः यह किया जाता था , उसकी प्राककालीन व्यवस्था के अनुसार चतुर्दशी को चौदह प्रदीप जलाये जाते थे । इसका अर्थ होता है– मैं अब दूसरे दिन अच्छे तरीके से दीप जलाऊँगा , अन्धकार में आलोक सम्पात करूँगा । 
 
फिर दीपावली के सम्बंध में हिन्दू पौराणिक कहानी है। एक बार श्रीकृष्ण द्वारिका से बाहर गये थे । उसी समय नरकासुर नाम के एक अनार्य सरदार ने द्वारिका पर आक्रमण किया था । उस समय श्रीकृष्ण की महारानी सत्यभामा ने ससैन्य उसका मुकाबला किया था । युद्ध में नरकासुर की मृत्यु हुई थी । उस दिन चतुर्दशी तिथि थी । इस ‘ नरक – चतुर्दशी ‘ तिथि को चौदह प्रदीप जलाकर उत्सव मनाया गया था और दूसरे दिन अमावस्या को सत्यभामा की पूजा की गयी थी । सत्यभामा को ‘ महालक्ष्मी ‘ देवी की संज्ञा प्रदान की गयी थी । इसीलिए पश्चिम भारत के लोग उस दिन को ‘ नरक चतुर्दशी ‘ कहते हैं । बंगाल के लोग कहते हैं ‘ भूत चतुर्दशी ‘ ।‌
 
आज का मनुष्य दीपावली के पीछे का इतिहास लगभग भूल चुका है और इस पर्व को लक्ष्मी पूजा के नाम पर सीमाबध कर दिया है ।जैसा कि हम जानते हैं कि लक्ष्मी धन की देवी है। अतः लोगों में यह आम धारणा बन गई है की दीपावली की रात लक्ष्मी की पूजा करने से व्यक्ति धनवान होता है ।लेकिन सच्चाई तो यह है कि व्यक्ति साधना, सेवा और त्याग से महान बनता है और धन की आवश्यकता मनुष्य को तो अवश्य ही है लेकिन एक सीमा तक ही।दीपावली  एक ऐसा त्योहार है जो अमावस्या  को  मनाया जाता है , तंत्र साधना  में काली रात को  विशेष स्थान प्राप्त है , दीप जला कर बाहर के  अंधेरे को दूर  कर सकते हैं, लेकिन मन के अंधेरे को दूर करने के लिए आध्यात्मिक साधना ही एक मात्र पथ  है।  नियमित रूप से निरंतर साधना का अभ्यास करते रहें।
 
 मन को परम पुरुष से  जोड़ने से  सब  अंधकार  मिट जाएगा।” 
 
– कृपा शंकर पाण्डेय , बेतिया 
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