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By : Nishpaksh Pratinidhi | Published Date : 8 Aug 2020 4:40 PM |   938 views

बचपन

 
क्या बात करूं मैं बचपन की
तथा कहानी  अपनेपन  की
 रहती थी कितनी आज़ादी
  होवे  चाहे जो   बर्बादी
 मुझे  बचा  लें दादा- दादी
कहें हमें गुलाब उपवन की
क्या बात करूं मैं बचपन की ?
 
आज की चिंता थी ना कल की
श्याम की चिंता ना उज्ज्वल की
खुशी  चाहिए इक-इक  पल की
अदा अजब मेरे  चितवन की 
 क्या बात करूं मैं बचपन की ?
 
   खाना-पीना  मस्ती   करना
  ना किसी से कभी भी डरना
  बात- बात  में  हंसते  रहना
 ना फिक्र किसी से अनबन की
क्या बात करूं मैं बचपन की ?
 
 महज  हंसना  और   हंसाना
  तुतली  बोली  में  तुतलाना
 रोटी फेंक  कर  मिट्टी  खाना
सुधि नहीं  थी  तन -मन  की
क्या बात करूं मैं बचपन की ?
 
काश, कभी  ऐसा हो  जाता
वापस बचपन फिर से आता
बुढ़ापे  में भी रंग जमाता,
स्वर्णिम कीमत इस जीवन की
क्या बात करूं मैं बचपन की ?
 
–डाॅ0 भोला प्रसाद आग्नेय
रघुनाथपुरी, टैगोर नगर, सिविल लाइंस, बलिया
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