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By : Nishpaksh Pratinidhi | Published Date : 11 Oct 2026 7:18 PM |   41 views

जयप्रकाश : एक आदमी, एक विचार और एक अधूरी क्रांति

 
कुछ लोग इतिहास में अपने किए हुए कामों के कारण याद किए जाते हैं, कुछ अपने कहे हुए शब्दों के कारण और कुछ इसलिए कि उन्होंने अपने समय के सामने ऐसे प्रश्न खड़े कर दिए, जिनसे बचकर निकलना आसान नहीं था। जयप्रकाश नारायण ऐसे ही व्यक्ति थे। उनका जीवन किसी एक राजनीतिक विचारधारा, किसी एक दल, किसी एक पद या किसी एक ऐतिहासिक घटना में समेटकर नहीं देखा जा सकता। वे भारतीय राजनीति के उन विरल चरित्रों में थे, जिनकी सबसे बड़ी उपलब्धि सत्ता प्राप्त करना नहीं, बल्कि सत्ता के सामने खड़े होकर उससे प्रश्न पूछना थी।
 
उनकी जयंती पर फूल चढ़ाना सरल है, उनकी तस्वीर पर माल्यार्पण करना भी सरल है, उनके नाम पर भाषण देना तो और भी सरल है। कठिन यह है कि हम उस बेचैनी को अपने भीतर जगह दें, जिसने एक वृद्ध, अस्वस्थ और लगभग राजनीतिक जीवन से विरत हो चुके व्यक्ति को फिर से सड़कों पर ला खड़ा किया था। कठिन यह समझना है कि आखिर ऐसा क्या था उस आदमी में कि उसके एक आह्वान पर विद्यार्थियों की आँखों में भविष्य चमकने लगा, नौजवानों के भीतर व्यवस्था बदलने की आकांक्षा जागी और दिल्ली की सत्ता को पहली बार यह अनुभव हुआ कि लोकतंत्र में जनता की चुप्पी हमेशा उसकी सहमति नहीं होती।
 
जयप्रकाश नारायण का जन्म 11 अक्टूबर 1902 को सिताबदियारा में हुआ था। गंगा और घाघरा के निकट बसे इस भूभाग का अपना एक स्वभाव है। नदियाँ यहाँ केवल जलधाराएँ नहीं हैं; वे धरती की बनावट बदलती हैं, गाँवों की सीमाएँ बदलती हैं और मनुष्य को स्थायित्व के भीतर अस्थायित्व का बोध कराती हैं। सिताबदियारा भी नदी, मिट्टी और बदलते भूगोल का प्रदेश रहा है।
 
यह कहना इतिहास की दृष्टि से उचित नहीं होगा कि किसी मनुष्य का पूरा व्यक्तित्व उसके जन्मस्थान की भौगोलिक बनावट से ही निर्मित होता है, लेकिन इतना अवश्य कहा जा सकता है कि जयप्रकाश के जीवन में परिवर्तन, अनिश्चितता और जड़ता के प्रति असहमति जैसे भावों को समझते हुए उनके आरंभिक परिवेश की स्मृति एक अर्थपूर्ण पृष्ठभूमि बनाती है।
 
उनका नाम जयप्रकाश था। नाम में ही विजय और प्रकाश, दोनों की ध्वनियाँ थीं। लेकिन उनके जीवन की वास्तविक विशेषता यह नहीं थी कि उन्होंने हमेशा विजय प्राप्त की; बल्कि यह थी कि पराजय, असहमति और असफलता के बीच भी उन्होंने अपने विश्वासों को नए सिरे से परखने का साहस बनाए रखा। जीवन में विचार बदलना और विचारों के प्रति ईमानदार बने रहना, दोनों के बीच एक महीन अंतर होता है। अवसरवादी व्यक्ति परिस्थितियों के अनुसार अपना पक्ष बदलता है; विचारशील व्यक्ति अनुभव के आधार पर अपने विचारों की परीक्षा करता है। जयप्रकाश के जीवन को इसी दूसरी कसौटी पर पढ़ना अधिक न्यायपूर्ण होगा।
 
उनकी जीवनयात्रा का आरंभ किसी तैयार राजनीतिक सिंहासन की ओर नहीं था। वे पढ़ने के लिए अमेरिका गए। वहाँ उन्होंने जीवनयापन के लिए अनेक प्रकार के काम किए और अध्ययन के साथ श्रम का संबंध निकट से जाना। किसी समाज को केवल पुस्तकों में पढ़ना और उसके भीतर अपनी आजीविका के लिए श्रम करना, दो अलग-अलग अनुभव हैं। अमेरिका में उनके सामने पूँजी, श्रम, वर्ग और सामाजिक विषमता के प्रश्न अधिक ठोस रूप में उपस्थित हुए। मार्क्सवादी चिंतन से उनका परिचय गहरा हुआ। वे भारत लौटे तो उनके पास केवल डिग्री लेकर लौटने वाले विद्यार्थी का अनुभव नहीं था; उनके भीतर समाज की संरचना को समझने और उसे बदलने की आकांक्षा भी थी।
 
भारत तब स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रहा था। राष्ट्रीय आंदोलन के भीतर अनेक धाराएँ थीं। कोई संवैधानिक सुधारों के रास्ते आगे बढ़ना चाहता था, कोई अहिंसक जनांदोलन को परिवर्तन का प्रमुख साधन मानता था, कोई समाजवादी पुनर्गठन की आवश्यकता पर बल देता था। जयप्रकाश ने स्वतंत्रता के प्रश्न को सामाजिक न्याय के प्रश्न से अलग करके नहीं देखा। राजनीतिक स्वतंत्रता आवश्यक थी, लेकिन क्या केवल विदेशी शासन के चले जाने से सामान्य मनुष्य के जीवन में बराबरी आ जाएगी? क्या स्वतंत्र देश में भी आर्थिक विषमता, सामाजिक वर्चस्व और शोषण अपने पुराने रूपों में बने नहीं रह सकते? ये ऐसे प्रश्न थे, जिनसे उनकी राजनीति का चरित्र निर्मित हुआ।
 
वे कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के गठन से जुड़े प्रमुख नेताओं में रहे। उनके लिए समाजवाद केवल किसी पुस्तक में दर्ज सिद्धांत या राजनीतिक मंच से बोला जाने वाला शब्द नहीं था। उसमें मनुष्य की गरिमा, श्रम का सम्मान और अवसरों की समानता का स्वप्न था। स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी सक्रियता ने उन्हें जेलों तक पहुँचाया। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान हजारीबाग जेल से उनका निकल भागना स्वतंत्रता संघर्ष की उल्लेखनीय घटनाओं में गिना जाता है। इस प्रसंग में रोमांच अवश्य है, लेकिन इसका गहरा अर्थ रोमांच से आगे है। औपनिवेशिक शासन की दृष्टि में वे एक बंदी थे; अपने साथियों की दृष्टि में वे संघर्ष की निरंतरता का प्रतीक बन गए। जेल की दीवारें शरीर को रोक सकती हैं, लेकिन जब विचार किसी सामूहिक आकांक्षा से जुड़ जाता है, तब उसे कैद करना कहीं अधिक कठिन हो जाता है।
 
स्वतंत्रता प्राप्त हुई। देश ने अपना संविधान बनाया, चुनाव हुए, सरकारें बनीं और लोकतंत्र ने संस्थागत आकार लेना शुरू किया। स्वाभाविक था कि स्वतंत्रता आंदोलन के नेताओं के सामने अब सत्ता, शासन और राष्ट्रनिर्माण की नई संभावनाएँ खुलतीं। जयप्रकाश के सामने भी यह रास्ता था। वे चाहते तो सत्ता की मुख्यधारा में बने रह सकते थे। उनके राजनीतिक अनुभव, स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान और संगठनात्मक क्षमता को देखते हुए सार्वजनिक जीवन में उनके लिए पर्याप्त अवसर मौजूद थे। लेकिन उन्होंने धीरे-धीरे सक्रिय दलगत राजनीति से दूरी बनाई।
 
यह दूरी पलायन नहीं थी। वह राजनीति के अर्थ को लेकर उनके भीतर चल रही एक दूसरी खोज का हिस्सा थी। क्या राजनीति का अंतिम उद्देश्य सरकार बनाना है? क्या सामाजिक परिवर्तन केवल संसद, मंत्रिमंडल और प्रशासन के माध्यम से संभव है? क्या राजनीतिक दल, जो परिवर्तन के वाहक होने चाहिए, धीरे-धीरे स्वयं सत्ता प्राप्त करने और उसे बनाए रखने के साधन नहीं बन जाते? जयप्रकाश इन प्रश्नों से जूझते रहे।
 
विनोबा भावे के भूदान आंदोलन और व्यापक सर्वोदय विचार से उनका जुड़ाव इसी खोज का हिस्सा था। भूदान का आग्रह था कि भूमि के स्वामित्व और ग्रामीण विषमता के प्रश्न को केवल कानूनी संघर्ष या सरकारी आदेश से नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना और नैतिक आग्रह से भी संबोधित किया जाए। जयप्रकाश ने ग्रामदान, सामुदायिक जीवन और विकेंद्रीकरण की संभावनाओं में रुचि ली। उनकी दृष्टि में लोकतंत्र केवल पाँच वर्ष में एक बार मतदान कर देने का नाम नहीं था। लोकतंत्र को मनुष्य के रोजमर्रा के जीवन में उतरना चाहिए; गाँव के निर्णयों में, स्थानीय संसाधनों के उपयोग में, श्रम के वितरण में और नागरिक की सक्रिय भागीदारी में।
 
यहीं जयप्रकाश नारायण की राजनीति एक विशिष्ट अर्थ ग्रहण करती है। वे राज्य की शक्ति को आवश्यक मानते हुए भी उसकी सीमाओं से परिचित थे। राज्य व्यवस्था चला सकता है, कानून बना सकता है, अधिकारों की रक्षा कर सकता है; लेकिन वह अपने आदेश से नागरिक के भीतर नैतिक विवेक पैदा नहीं कर सकता। इसी प्रकार सामाजिक सेवा मनुष्य की सहायता कर सकती है, लेकिन यदि संस्थागत अन्याय को बदलने का कोई उपाय न हो तो सेवा कभी-कभी अन्याय के बने रहने की परिस्थिति में ही सीमित रह जाती है। जयप्रकाश के जीवन में समाजवाद, सर्वोदय और लोकतांत्रिक प्रतिरोध का यह अंतर्द्वंद्व दिखाई देता है। इसे उनके विचारों की कमजोरी कहकर छोड़ देना आसान है; लेकिन इसी अंतर्द्वंद्व में उनके चिंतन की जटिलता भी छिपी है।
 
उन्होंने दलगत राजनीति से दूरी बनाई, पर समाज से नहीं। वे सत्ता से दूर हुए, लेकिन सार्वजनिक प्रश्नों से नहीं। शायद इसी कारण 1970 के दशक में जब बिहार के विद्यार्थियों के भीतर असंतोष गहराने लगा, तब वे केवल अतीत के स्वतंत्रता सेनानी बनकर नहीं रह गए। बिहार में महँगाई, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और प्रशासनिक अव्यवस्था को लेकर विद्यार्थियों का आक्रोश उभर रहा था। छात्र आंदोलन को एक व्यापक नैतिक और राजनीतिक दिशा की तलाश थी। विद्यार्थियों ने जयप्रकाश नारायण से नेतृत्व करने का आग्रह किया। उन्होंने पहले संकोच किया, लेकिन अंततः आंदोलन के साथ खड़े हुए।
 
1974 का बिहार आंदोलन केवल एक सरकार के विरुद्ध असंतोष का प्रसंग नहीं था। उसके भीतर स्वतंत्रता के बाद जन्मी पीढ़ी की निराशा भी थी। जिन लोगों ने आजादी नहीं देखी थी, उन्होंने आजाद भारत में आँखें खोली थीं। उनके लिए स्वतंत्रता कोई दूरस्थ ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि अपने वर्तमान की वास्तविकता थी। वे पूछ रहे थे कि यदि देश स्वतंत्र है, तो जीवन में स्वतंत्रता का अनुभव इतना सीमित क्यों है? यदि लोकतंत्र जनता का शासन है, तो जनता को भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और प्रशासनिक मनमानी के सामने असहाय क्यों होना पड़ता है?
 
इन प्रश्नों में युवा मन की अधीरता थी, लेकिन केवल अधीरता नहीं थी। वहाँ एक ऐसी व्यवस्था की माँग भी थी, जिसमें नागरिक की आवाज सुनी जाए और शासन अपनी जवाबदेही से बच न सके। जयप्रकाश ने इस आंदोलन को व्यापक रूप देते हुए ‘संपूर्ण क्रांति’ का आह्वान किया।
 
संपूर्ण क्रांति! दो शब्द, लेकिन उनके भीतर एक पूरा युग्मित स्वप्न था। क्रांति का अर्थ सामान्यतः सत्ता परिवर्तन समझा जाता है। एक सरकार जाती है, दूसरी आती है; एक दल पराजित होता है, दूसरा विजयी होता है; कुर्सियों पर बैठे चेहरे बदल जाते हैं और व्यवस्था अपने पुराने ढर्रे पर लौट आती है। जयप्रकाश इस सीमित परिवर्तन से संतुष्ट नहीं थे। उनके लिए परिवर्तन राजनीति तक सीमित नहीं रह सकता था। उसमें सामाजिक संबंधों, आर्थिक संरचना, शिक्षा, संस्कृति, नैतिकता और व्यक्ति के आचरण तक को शामिल होना था।
 
संपूर्ण क्रांति की धारणा में सात क्रांतियों का उल्लेख मिलता है: राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक, शैक्षिक और आध्यात्मिक या नैतिक परिवर्तन। इनका आशय किसी एक दिन में समूचे समाज को बदल देने की कल्पना नहीं था। इसका मूल आग्रह यह था कि समाज की समस्याएँ परस्पर जुड़ी होती हैं। भ्रष्टाचार केवल कुछ व्यक्तियों की बुरी आदत नहीं; वह ऐसी संस्थागत स्थितियों से भी पैदा होता है जिनमें शक्ति का केंद्रीकरण, जवाबदेही का अभाव और लाभ प्राप्त करने के असमान अवसर मौजूद रहते हैं। बेरोजगारी केवल नौकरियों की कमी नहीं; वह शिक्षा, अर्थव्यवस्था और अवसरों के वितरण से जुड़ा प्रश्न है। सामाजिक विषमता केवल व्यक्तिगत पूर्वाग्रह नहीं; वह ऐतिहासिक संबंधों और संस्थागत संरचनाओं में भी जीवित रहती है।
 
जयप्रकाश का आग्रह था कि परिवर्तन की शुरुआत नागरिक के भीतर से भी होनी चाहिए। लेकिन नागरिक की नैतिकता और व्यवस्था की जवाबदेही को एक-दूसरे का विकल्प नहीं बनाया जा सकता। ईमानदार व्यक्ति भी भ्रष्ट संस्थाओं के बीच कठिनाइयों से घिर सकता है; और अच्छी संस्थाएँ भी तब कमजोर पड़ सकती हैं जब नागरिक अपने अधिकारों तथा कर्तव्यों के प्रति उदासीन हो जाएँ। संपूर्ण क्रांति की समकालीन प्रासंगिकता इसी दोहरी जिम्मेदारी में है। केवल सरकार को दोष देना पर्याप्त नहीं, लेकिन सारी जिम्मेदारी नागरिक के चरित्र पर डाल देना भी अन्यायपूर्ण है।
 
जयप्रकाश के जीवन का एक बड़ा विरोधाभास यह है कि उन्होंने जिस नैतिक राजनीति का स्वप्न देखा, उसे मूर्त रूप देने के लिए उन्हें एक बड़े राजनीतिक आंदोलन का नेतृत्व करना पड़ा। आंदोलन में विभिन्न विचारधाराओं के लोग थे। उनकी प्राथमिकताएँ एक जैसी नहीं थीं। कुछ लोग भ्रष्टाचार के विरुद्ध थे, कुछ तत्कालीन सरकार के विरोध में, कुछ समाजवादी परिवर्तन चाहते थे और कुछ ऐसे भी थे जिनके लिए सत्ता परिवर्तन स्वयं सबसे बड़ा लक्ष्य था। एक व्यापक जनांदोलन की शक्ति भी यही होती है और उसकी सीमा भी। वह अनेक असंतोषों को एक मंच पर ला सकता है, लेकिन उन सबको एक साझा भविष्य की सहमति में बदलना कठिन होता है।
 
यहीं जयप्रकाश के विचार और आंदोलन के बीच की दूरी दिखाई देने लगती है। संपूर्ण क्रांति की कल्पना सत्ता परिवर्तन से बहुत आगे जाती थी, लेकिन आंदोलन के विभिन्न घटकों के लिए उसका अर्थ एक जैसा नहीं था। इस अंतर को समझे बिना जयप्रकाश को या तो संपूर्ण क्रांति का सर्वथा सफल नायक घोषित कर देना या उसकी सीमाओं के कारण उन्हें असफल कह देना, दोनों ही उनके साथ अन्याय होगा। इतिहास किसी महापुरुष के लिए प्रशस्ति-पत्र नहीं लिखता; वह उसके स्वप्न, साधन, उपलब्धियों और असफलताओं को एक साथ पढ़ने की माँग करता है।
 
फिर आया आपातकाल। 25 जून 1975 को देश में आपातकाल की घोषणा हुई। नागरिक स्वतंत्रताएँ सीमित की गईं, विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार किया गया, प्रेस पर सेंसरशिप लगी और राजनीतिक विरोध को कठोर दमन का सामना करना पड़ा। जयप्रकाश नारायण भी गिरफ्तार किए गए। जिस व्यक्ति ने स्वतंत्रता आंदोलन में औपनिवेशिक शासन का विरोध किया था, उसे स्वतंत्र भारत में नागरिक स्वतंत्रताओं के लिए संघर्ष करना पड़ा। इस विडंबना में भारतीय लोकतंत्र का एक गहरा प्रश्न छिपा है: क्या स्वतंत्रता प्राप्त कर लेने के बाद स्वतंत्रता की रक्षा अपने आप हो जाती है?
 
नहीं। स्वतंत्रता कोई ऐसी वस्तु नहीं जिसे एक बार प्राप्त कर लेने के बाद इतिहास की अलमारी में रख दिया जाए। लोकतंत्र भी केवल संविधान की पुस्तक में सुरक्षित शब्द नहीं है। उसकी जीवंतता इस बात पर निर्भर करती है कि संस्थाएँ कितनी स्वतंत्र हैं, सरकारें कितनी जवाबदेह हैं, नागरिक कितने सजग हैं और असहमति के लिए सार्वजनिक जीवन में कितनी जगह बची हुई है।
 
जयप्रकाश का विरोध इसी बिंदु पर ऐतिहासिक महत्व ग्रहण करता है। वे केवल इंदिरा गांधी की सरकार के विरोधी नहीं थे; उनका संघर्ष उस प्रवृत्ति के विरुद्ध था जिसमें सत्ता स्वयं को आलोचना से ऊपर समझने लगती है। लोकतंत्र में बहुमत का महत्व है, लेकिन बहुमत निरंकुशता का अधिकारपत्र नहीं है। चुनाव जीतना शासन करने का वैधानिक अवसर देता है, नागरिक स्वतंत्रताओं को मनमाने ढंग से समाप्त करने का नैतिक अधिकार नहीं। लोकतंत्र का सौंदर्य इस बात में है कि वह विरोधी आवाज को भी व्यवस्था का वैध हिस्सा मानता है।
 
1977 में आपातकाल समाप्त हुआ और आम चुनाव हुए। जनता पार्टी ने चुनाव में विजय प्राप्त की। पहली बार केंद्र में कांग्रेस के बाहर की सरकार बनी। जयप्रकाश नारायण की नैतिक प्रतिष्ठा इस परिवर्तन के पीछे एक बड़ी प्रेरक शक्ति थी। लेकिन इसके बाद जो हुआ, वह भी उतना ही महत्वपूर्ण है। जिस आंदोलन ने लोकतंत्र की पुनर्स्थापना में भूमिका निभाई, उसकी राजनीतिक परिणति आंतरिक संघर्षों और सत्ता-संघर्षों से मुक्त नहीं रही। जनता पार्टी की सरकार टिकाऊ एकता स्थापित नहीं कर सकी और अंततः टूट गई।
 
यह प्रसंग जयप्रकाश की विरासत का सबसे कठिन अध्याय है। जिस राजनीतिक संस्कृति को बदलने के लिए उन्होंने जनांदोलन खड़ा किया, उसी राजनीति में पुराने स्वार्थ, नेतृत्व की प्रतिस्पर्धाएँ और पद की आकांक्षाएँ लौट आईं। यह कहना आसान है कि जयप्रकाश का स्वप्न अधूरा रह गया। अधिक कठिन, लेकिन अधिक जरूरी प्रश्न यह है कि क्या कोई जनांदोलन अपने नेताओं की सदिच्छा के भरोसे स्थायी परिवर्तन ला सकता है? क्या नैतिक प्रतिष्ठा संस्थागत अनुशासन का स्थान ले सकती है? क्या विविध विचारधाराओं का गठबंधन केवल साझा विरोध के आधार पर दीर्घकाल तक टिक सकता है?
 
इन प्रश्नों का उत्तर केवल जयप्रकाश के जीवन में नहीं, हमारे अपने लोकतांत्रिक अनुभव में भी छिपा है। विरोध की एकता और निर्माण की एकता अलग-अलग चीजें हैं। किसी अन्याय के विरुद्ध अनेक लोग साथ आ सकते हैं, लेकिन न्यायपूर्ण व्यवस्था बनाने के लिए उन्हें अधिकार, संसाधन, संस्थाओं और भविष्य की प्राथमिकताओं पर सहमति विकसित करनी पड़ती है। जयप्रकाश का आंदोलन पहली चुनौती का बड़ा उदाहरण बना; दूसरी चुनौती उसके सामने कहीं अधिक कठिन सिद्ध हुई।
 
फिर भी किसी स्वप्न का अधूरा रह जाना उसे निरर्थक नहीं बनाता। मनुष्य के जीवन में कुछ विचार परिणामों से अधिक अपने द्वारा खोले गए रास्तों के कारण महत्वपूर्ण होते हैं। जयप्रकाश ने भारतीय राजनीति को यह याद दिलाया कि जनता केवल चुनावी आँकड़ा नहीं है। नागरिकों की संगठित चेतना सत्ता के सामने प्रश्न रख सकती है। सरकारें स्थायी नहीं होतीं, संस्थाओं को सजगता चाहिए और लोकतंत्र की रक्षा के लिए कभी-कभी उस व्यक्ति को भी खड़ा होना पड़ता है जिसने स्वयं सत्ता से दूर रहने का निर्णय लिया हो।
 
जयप्रकाश नारायण की जयंती पर उनकी पत्नी प्रभावती की स्मृति भी स्वाभाविक रूप से आती है। उनका जीवन स्वतंत्रता आंदोलन, गांधीवादी वातावरण और सार्वजनिक संघर्षों से जुड़ा रहा। जयप्रकाश और प्रभावती का संबंध केवल एक प्रसिद्ध पुरुष और उसके परिवार की कथा नहीं था। दोनों के जीवन में वैचारिक प्रतिबद्धता, व्यक्तिगत निर्णय और सार्वजनिक दायित्व के प्रश्न उपस्थित थे। प्रभावती के जीवन को केवल जयप्रकाश की पत्नी की पहचान में सीमित कर देना उनके अपने व्यक्तित्व और योगदान को छोटा करना होगा। किसी बड़े सार्वजनिक जीवन के पीछे परिवार की भूमिका को याद करना जरूरी है, लेकिन उस परिवार के प्रत्येक सदस्य को स्वतंत्र मनुष्य के रूप में देखना भी उतना ही जरूरी है।
 
इसी तरह जयप्रकाश को केवल ‘लोकनायक’ कहकर पुकारना उनके व्यक्तित्व की पूरी पहचान नहीं है। ‘लोकनायक’ एक सम्मानसूचक नाम है, लेकिन नाम के भीतर व्यक्ति को स्थिर कर देने का खतरा भी छिपा रहता है। जयप्रकाश एक समय मार्क्सवादी चिंतन से प्रभावित समाजवादी थे; बाद में सर्वोदय और विकेंद्रीकरण की ओर उन्मुख हुए; फिर लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए बड़े राजनीतिक आंदोलन के नेता बने। इन विभिन्न पड़ावों को एक ही सरल सूत्र में बाँधना कठिन है। शायद उन्हें समझने का सही तरीका यही है कि उनके जीवन को किसी एक विचारधारा की विजय-यात्रा न मानकर निरंतर आत्मपरीक्षण की यात्रा के रूप में देखा जाए।
 
उनकी सबसे बड़ी विशेषताओं में एक यह थी कि वे सत्ता के बाहर रहकर भी राजनीतिक रूप से प्रासंगिक बने रहे। सामान्यतः राजनीति की भाषा में प्रभाव का अर्थ पद, संगठन, संसाधन और निर्णय लेने की शक्ति से लगाया जाता है। जयप्रकाश ने दिखाया कि सार्वजनिक जीवन में नैतिक विश्वास भी एक शक्ति हो सकता है। वह शक्ति कानून नहीं बनाती, बजट पारित नहीं करती और प्रशासनिक आदेश जारी नहीं करती; लेकिन वह नागरिकों के भीतर यह प्रश्न जगा सकती है कि जो हो रहा है, क्या वह उचित भी है?
 
हालाँकि नैतिक प्रतिष्ठा भी आलोचना से परे नहीं होती। कोई व्यक्ति जितना बड़ा प्रतीक बनता है, उसके विचारों और निर्णयों की जाँच उतनी ही आवश्यक हो जाती है। जनांदोलनों के भीतर लोकतांत्रिक व्यवहार, विविधता के प्रति सम्मान, सामाजिक न्याय की स्पष्टता और सत्ता में पहुँचने के बाद जवाबदेही के प्रश्नों को टालकर किसी आंदोलन को केवल उसके आदर्शों के आधार पर नहीं आँका जा सकता। जयप्रकाश की विरासत के प्रति वास्तविक सम्मान यही होगा कि हम उनके विचारों की सीमाओं पर भी विचार करें और उन प्रश्नों को आगे बढ़ाएँ जिन्हें वे हमारे सामने छोड़ गए।
 
आज जब लोकतंत्र पर चर्चा होती है, तो अक्सर चुनाव, सरकार, दल, बहुमत और सत्ता परिवर्तन के शब्द सबसे आगे दिखाई देते हैं। इनकी आवश्यकता से इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन लोकतंत्र का एक दूसरा संसार भी है, जिसमें नागरिक का सम्मान, संस्थाओं की निष्पक्षता, सार्वजनिक संवाद की गुणवत्ता और असहमति की सुरक्षा शामिल हैं। यदि नागरिक केवल दर्शक बन जाएँ, यदि सार्वजनिक प्रश्नों पर विचार करने की जगह नारे ले लें और यदि विरोध को शत्रुता समझा जाने लगे, तो लोकतंत्र का बाहरी ढाँचा बचा रहकर भी उसकी आंतरिक शक्ति कमजोर पड़ सकती है।
 
जयप्रकाश की स्मृति हमें इसी आंतरिक शक्ति की याद दिलाती है। वे यह नहीं कहते कि हर सरकार गलत है या हर आंदोलन सही। उनकी ऐतिहासिक भूमिका का सार इससे अधिक गंभीर है: किसी भी व्यवस्था को अपने औचित्य की परीक्षा से गुजरना चाहिए। कोई भी नेता आलोचना से ऊपर नहीं है। कोई भी राजनीतिक दल लोकतंत्र का पर्याय नहीं है। और कोई भी पीढ़ी अपने पूर्वजों के संघर्षों को केवल समारोहों में याद करके अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं कर सकती।
 
संपूर्ण क्रांति का प्रश्न आज भी इसलिए जीवित है कि समाज की समस्याएँ किसी एक चुनाव के परिणाम से समाप्त नहीं होतीं। शिक्षा की गुणवत्ता, रोजगार के अवसर, आर्थिक विषमता, सामाजिक भेदभाव, प्रशासनिक पारदर्शिता और नागरिक स्वतंत्रता ऐसे प्रश्न हैं जिन पर निरंतर काम करना पड़ता है। इन प्रश्नों के समाधान के लिए केवल आक्रोश पर्याप्त नहीं, न ही केवल नैतिक उपदेश। संस्थागत सुधार, सार्वजनिक भागीदारी, विवेकपूर्ण आलोचना और सामाजिक उत्तरदायित्व का संयोजन आवश्यक है। जयप्रकाश के स्वप्न को आज के संदर्भ में पढ़ना हो तो उसकी यही व्यावहारिक कसौटी होनी चाहिए।
 
उनकी जयंती पर हम उनके चित्र के सामने खड़े होकर यह सोच सकते हैं कि क्या हम अपने समय की असुविधाजनक सच्चाइयों को देखने का साहस रखते हैं। क्या हम अपने प्रिय राजनीतिक पक्ष से भी प्रश्न पूछ सकते हैं? क्या हम विरोधी विचार वाले व्यक्ति के लोकतांत्रिक अधिकारों का सम्मान कर सकते हैं? क्या हम सार्वजनिक जीवन में नैतिकता की माँग करते हुए अपने छोटे-छोटे स्वार्थों की भी जाँच कर सकते हैं? क्या हम यह स्वीकार कर सकते हैं कि समाज बदलने का काम किसी एक नायक के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता?
 
इन प्रश्नों का कोई आसान उत्तर नहीं है। लेकिन शायद जयप्रकाश की स्मृति का वास्तविक अर्थ आसान उत्तर देना भी नहीं है। उनका जीवन हमें उत्तरों से अधिक प्रश्नों की जिम्मेदारी सौंपता है।
 
लोकनायक होना केवल जनता के बीच लोकप्रिय होना नहीं है। जनता की आकांक्षाओं को सुनना, उसके असंतोष को दिशा देना और अपनी ही लोकप्रियता को अंतिम सत्य न मानना भी लोकनायकत्व की कसौटियाँ हैं। जयप्रकाश के जीवन में इन कसौटियों के उल्लेखनीय उदाहरण मिलते हैं; उनकी सीमाएँ भी मिलती हैं। इसी कारण वे इतिहास के लिए उपयोगी हैं। वे किसी निर्विवाद प्रतिमा की तरह नहीं, बल्कि एक ऐसे मनुष्य की तरह हमारे सामने आते हैं जिसने अपने समय की सत्ता, राजनीति और समाज से लगातार संवाद किया।
 
उनका जन्मदिन 11 अक्टूबर है। हर वर्ष यह तारीख लौटती है, लेकिन तारीखों का लौटना इतिहास का लौटना नहीं होता। इतिहास तभी लौटता है जब उसके प्रश्न वर्तमान में अपनी जगह बना लेते हैं। जयप्रकाश नारायण को याद करना इसलिए जरूरी नहीं कि अतीत में एक महान व्यक्ति हुआ था; बल्कि इसलिए कि वर्तमान में लोकतंत्र को सजग नागरिकों, उत्तरदायी संस्थाओं और सत्ता से प्रश्न पूछने वाले विवेक की आवश्यकता बनी हुई है।
 
सिताबदियारा में जन्मा वह मनुष्य अंततः किसी एक गाँव, राज्य या राजनीतिक दल की सीमा में नहीं रहा। उसका जीवन भारतीय लोकतंत्र की स्मृति का हिस्सा बन गया। उसने सत्ता प्राप्त करने की अपेक्षा सत्ता को जवाबदेह बनाने की चिंता को अधिक महत्व दिया। उसने राजनीति को केवल शासन की कला नहीं, समाज के नैतिक स्वास्थ्य का प्रश्न भी माना। और उसने यह संभावना जीवित रखी कि एक अकेला व्यक्ति, यदि उसके पीछे जनता का विश्वास और विचार की शक्ति हो, तो इतिहास की दिशा में हस्तक्षेप कर सकता है।
 
लेकिन उसकी सबसे बड़ी स्मृति शायद किसी विजय में नहीं, उस अधूरेपन में है जो हर सच्चे सामाजिक स्वप्न के साथ चला करता है। संपूर्ण क्रांति पूरी नहीं हुई। राजनीति अपनी अनेक पुरानी कमजोरियों से मुक्त नहीं हुई। लोकतंत्र को भी बार-बार अपनी रक्षा करनी पड़ती है। फिर भी संपूर्ण क्रांति का स्वप्न एक असुविधाजनक प्रश्न बनकर हमारे सामने उपस्थित है: क्या हम केवल व्यवस्था बदलना चाहते हैं, या अपने समय के मनुष्य और समाज को भी अधिक न्यायपूर्ण बनाना चाहते हैं?
 
~ परिचय दास 
डीन, पालि एवं अन्य भाषा संकाय, नव नालंदा महाविहार सम विश्वविद्यालय, नालंदा 
 
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