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By : Nishpaksh Pratinidhi | Published Date : 15 Aug 2026 12:48 PM |   34 views

स्वतंत्रता

आज़ादी, कोई झंडा नहीं है
जो पंद्रह अगस्त की सुबह
हवा में कुछ देर लहराकर
शाम को तह करके रख दी जाए।
 
आज़ादी तो वह छोटी-सी रोशनी है
जो किसी गरीब के घर में
बिना बिजली के भी जलती है,
जब उसका बच्चा कहता है
“बाबू, मैं पढ़ूँगा ”
 
वह उस माँ की आँख में है
जो बेटी की विदाई के समय
आँसू पोंछकर कहती है
“जहाँ मन हो, वहीं जाना ”
 
वह किसान की हथेली में है
जिसमें मिट्टी लगी है
और वह
भविष्य की हरियाली का विश्वास है
 
वह उस उम्रदराज़ स्वतंत्रता सेनानी की
काँपती उँगलियों में है
जो तिरंगा देखते हुए
अपने साथियों को याद करता है
और धीरे से कहता है
“वे नहीं रहे,
इसलिए यह बचा है।”
 
आज़ादी उस मजदूर के पसीने में है
जो शहर बनाता है
और शाम को
अपने गाँव लौटते हुए
बच्चों के लिए
दो मुट्ठी सपने साथ ले जाता है।
 
वह उस बूढ़े पिता की आँखों में है
जो बेटे को विदा करते हुए
कहता है ,“जहाँ रहो,
सच के साथ रहना ”
 
वह उस बच्चे के हाथ में है
जो अपनी पहली किताब खोलकर
दुनिया को
पहली बार पढ़ता है।
 
वह अपनी भाषा बोलने के अधिकार में है
अपने लोकगीत को
बिना संकोच गाने में है
अपनी मिट्टी की गंध को
पिछड़ेपन की तरह नहीं
पहचान की तरह स्वीकार करने में है
 
आज़ादी यह है
कि जंगल में रहने वाला मनुष्य
अपने जंगल को
सिर्फ लकड़ी न समझे
नदी को
सिर्फ पानी न समझे
और पहाड़ को
सिर्फ पत्थर न समझे।
 
आज़ादी यह है
कि धरती साँस ले सके
और विकास की दौड़ में
पेड़ की छाया
किसी की आखिरी विरासत न बन जाए।
 
आज़ादी यह है
कि हम अपने से अलग आदमी से
नफ़रत किए बिना
उसकी बात सुन सकें।
 
कि हम प्रश्न कर सकें
बिना डर के,
असहमति रख सकें
बिना शत्रु हुए
और सच कह सकें
बिना अकेले पड़ जाने के भय से।
 
आज़ादी यह है
कि किसी की पूजा
दूसरे के अपमान का कारण न बने
किसी की भाषा
दूसरी भाषा की दुश्मन न बने
किसी की पहचान
दूसरे की पहचान को
छोटा न करे।
 
हमने अंग्रेज़ी हुकूमत की
जंजीरें तोड़ दीं
पर क्या हमने
अपने भीतर की
घृणा, अहंकार और भय की
जंजीरें भी तोड़ी हैं?
 
इतने वर्षों बाद, मैं सोचता हूँ
हमने देश को तो आज़ाद कर लिया
पर क्या
अपने भीतर के डर को
आज़ाद कर पाए?
 
क्या कहीं कोई बच्चा
अब भी भूख से चुप है?
 
क्या कहीं कोई किसान
अपनी फसल से अधिक
कर्ज़ उगाता है?
 
क्या कोई मजदूर
अपने ही बनाए शहर में
बेघर है?
 
क्या कहीं कोई मनुष्य
अपनी भाषा बोलते हुए
अब भी हीन महसूस करता है?
 
क्या कोई सच
सिर्फ इसलिए चुप है
कि उसे बोलने पर
अकेला पड़ जाने का डर है?
 
तिरंगा पूछता है—
“मेरे तीन रंग तो बच गए,
तुम्हारे भीतर
आज़ादी का कौन-सा रंग बचा?”
 
मैं देर तक ,उस प्रश्न को देखता रहता हूँ
 
तभी याद आते हैं
वे उम्रदराज़ चेहरे
जिनने जेल की सलाखों के पीछे
अपने आने वाले भारत को देखा था।
 
उनके पास न पद था, न पुरस्कार
न स्मारक
 
बस एक सपना था
कि उनके बाद जन्म लेने वाला बच्चा
गुलाम पैदा न हो।
 
मैं उस बच्चे को खोजता हूँ
जो आज,स्वतंत्र भारत में पैदा हुआ है
 
वह स्कूल की कतार में खड़ा है,
उसके हाथ में
कागज़ का छोटा-सा तिरंगा है।
 
वह नहीं जानता
स्वतंत्रता की कीमत क्या थी।
 
वह केवल इतना जानता है
कि यह उसका देश है।
 
और शायद
स्वतंत्रता का सबसे सुंदर अर्थ यही है
कि आने वाली पीढ़ी
हमारे बलिदानों की पीड़ा नहीं
उनके सपनों की रोशनी पाए।
 
फिर दूर, किसी विद्यालय से
बच्चों की आवाज़ आती है।
 
एक नन्हा हाथ
तिरंगे को सलाम करता है।
 
और मुझे लगता है,
आज़ादी अभी जीवित है।
 
वह संसद की ऊँची इमारत में ही नहीं,
किसी कच्चे घर की देहरी पर भी है।
 
वह संविधान के अक्षरों में है
किसी कवि की बेचैन पंक्ति में है
किसी किसान की उम्मीद में है
किसी माँ की प्रार्थना में है
किसी बेटी के निर्णय में है
किसी बच्चे की खुली आँख में है।
 
आज़ादी अपने रंग में जीवित है।
 
वह उस बच्चे की आँख में
कल की तरह चमक रही है।
 
लेकिन वह केवल
बचाए रखने की चीज़ नहीं है।
 
उसे हर दिन,जीना होगा
 
हर दिन ,थोड़ा-सा सच बोलकर
थोड़ा-सा अन्याय रोककर
थोड़ा-सा भय छोड़कर
थोड़ा-सा मनुष्य बनकर।
 
तभी पंद्रह अगस्त
सिर्फ एक तारीख नहीं रहेगा
 
तभी तिरंगा
सिर्फ आकाश में नहीं,
हमारे भीतर भी लहराएगा।
 
और शायद तब
उन लोगों की आत्माएँ
जो हमें आज़ाद देखकर चले गए
कहीं दूर से
मुस्कराएँगी।
 
क्योंकि आज़ादी
उन्हें मिली हुई विरासत नहीं थी।
 
वह उनका सपना था
और सपना ,तभी जीवित रहता है
जब कोई अगली पीढ़ी
उसे अपनी आँखों में
जगाए रखती है।
 
बस,उसे बचाए रखना है
अपने भीतर भी
अपने देश में भी
 
-परिचय दास 
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