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By : Nishpaksh Pratinidhi | Published Date : 30 Sep 2026 6:28 PM |   22 views

‘परिचय दास’ की दो आलोचना-पुस्तकों का लोकार्पण हुआ

नव नालंदा महाविहार (सम विश्वविद्यालय), संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार में हिंदी पखवाड़ा–2026 का समापन समारोह बुधवार को आचार्य नागार्जुन भवन स्थित सप्तपर्णी सभागार में आयोजित किया गया। समारोह की अध्यक्षता महाविहार के कुलपति प्रो. सिद्धार्थ सिंह ने की।
 
वरिष्ठ रचनाकार एवं आलोचक प्रो. अवधेश प्रधान तथा वरिष्ठ अनुवादविद् एवं भाषा-विचारक डॉ. राजेंद्र प्रसाद मिश्र सम्मान्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। समारोह में प्रो. रवींद्र नाथ श्रीवास्तव ‘परिचय दास’ की दो आलोचना-पुस्तकों का लोकार्पण भी हुआ।
 
कार्यक्रम की प्रस्तावना और स्वागत-वक्तव्य में प्रो. रवींद्र नाथ श्रीवास्तव ‘परिचय दास’, प्रोफेसर, हिंदी विभाग एवं संकायाध्यक्ष, पालि एवं अन्य भाषा संकाय ने कहा कि हिंदी का प्रश्न केवल उसके विस्तार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ज्ञान की लोकतांत्रिक उपलब्धता और भारतीय समाज की बौद्धिक स्वायत्तता से भी जुड़ा हुआ है। उन्होंने कहा कि किसी भाषा की प्रतिष्ठा उसके माध्यम से विकसित होने वाले ज्ञान, चिंतन और रचनात्मकता से निर्मित होती है। हिंदी की समृद्धि अन्य भारतीय भाषाओं के साथ निरंतर संवाद और उनके अनुभवों के आत्मसात से संभव है। उन्होंने राजभाषा हिंदी के प्रयोग को प्रशासनिक औपचारिकता से आगे ले जाकर ज्ञान-विज्ञान, शोध और शिक्षण की भाषा के रूप में विकसित करने की आवश्यकता पर बल दिया।
 
समारोह में प्रो. परिचय दास की दो पुस्तकों ‘एवम् अथवा’ (आदिकाल और मध्यकालीन कविता की रचनात्मक आलोचना) तथा ‘समीचीन’ (भारतीय साहित्य की सृजनात्मक आलोचना) का लोकार्पण किया गया। दोनों कृतियाँ हिंदी साहित्य की आलोचनात्मक परंपरा, कविता के रचनात्मक पाठ तथा भारतीय साहित्य की सृजनात्मक आलोचना से संबद्ध हैं।
 
प्रो. अवधेश प्रधान ने हिंदी साहित्य की सामाजिक चेतना और आलोचनात्मक परंपरा के महत्त्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि साहित्य भाषा को मनुष्य के अनुभव, संवेदना और विचार की गहराई से जोड़ता है। गंभीर आलोचना का कार्य किसी रचना को अंतिम रूप से परिभाषित करना नहीं, बल्कि उसके अर्थ-संसार को अधिक व्यापक और गहन ढंग से समझने की संभावनाएँ खोलना है। उन्होंने साहित्य-अध्ययन में संवेदनशीलता, वैचारिक स्पष्टता और ऐतिहासिक दृष्टि के समन्वय को आवश्यक बताया।
 
सम्मान्य अतिथि डॉ. राजेंद्र प्रसाद मिश्र ने अनुवाद, भाषा और राजभाषा के संबंधों पर विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि अनुवाद विभिन्न भाषाओं के बीच ज्ञान, अनुभव और संवेदना के आदान-प्रदान का महत्त्वपूर्ण माध्यम है। प्रभावी अनुवाद के लिए भाषाओं की प्रकृति, उनकी अभिव्यक्ति-क्षमता और सांस्कृतिक संदर्भों की समझ आवश्यक है। उन्होंने राजभाषा हिंदी के प्रभावी प्रयोग के लिए सरल, स्पष्ट और स्वाभाविक भाषा को महत्त्वपूर्ण बताया।
 
अध्यक्षीय वक्तव्य में कुलपति प्रो. सिद्धार्थ सिंह ने उच्च शिक्षा में हिंदी के अध्ययन, अध्यापन और शोध की भूमिका को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि हिंदी को उच्च शिक्षा तथा ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्रों में अधिक प्रभावी बनाने की आवश्यकता है। विद्यार्थियों और शोधार्थियों को अपनी भाषा में विचार करने, प्रश्न उठाने और ज्ञान के निर्माण में सक्रिय भागीदारी के अवसर मिलने चाहिए। उन्होंने भारतीय भाषाओं के बीच संवाद को उच्च शिक्षण संस्थानों की महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी बताया।
 
धन्यवाद-ज्ञापन करते हुए हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रो. हरे कृष्ण तिवारी ने हिंदी पखवाड़ा के आयोजन को सामूहिक सहभागिता और भाषायी प्रतिबद्धता का परिणाम बताया। उन्होंने अतिथियों, आचार्यों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों और गैर-शैक्षणिक स्टाफ के प्रति आभार व्यक्त किया।
 
समारोह के आरंभ में डॉ. धम्म ज्योति ने पालि में मंगलपाठ तथा डॉ. नरेंद्र दत्त तिवारी ने संस्कृत में स्वस्तिवाचन किया। कार्यक्रम का संचालन अतिथि प्राध्यापक शिवानी जायसवाल ने किया।
 
नव नालंदा महाविहार में 14 से 30 सितंबर तक आयोजित हिंदी पखवाड़ा के दौरान कविता-पाठ, भाषण, निबंध-लेखन, अनुवाद और टंकण प्रतियोगिताओं सहित विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए गए। इनमें आचार्यों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों तथा गैर-शैक्षणिक स्टाफ ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की।
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