नया साल, जीवन के उत्सव का प्रतीक
————-
रवींद्र नाथ श्रीवास्तव “परिचय दास”प्रोफेसर एवं पूर्व अध्यक्ष , हिंदी विभाग, नव नालंदा महाविहार सम विश्वविद्यालय ( संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार ) , नालंदा |
नया साल आते ही समय जैसे अचानक तेज़ हो जाता है। कैलेंडर का एक पन्ना पलटता है और शहरों से लेकर कस्बों तक एक साझा उत्तेजना फैल जाती है। घड़ियाँ बारह बजने की प्रतीक्षा करने लगती हैं, मोबाइल स्क्रीन उलटी गिनती दिखाने लगती हैं और मनुष्य अपने भीतर एक ऐसी प्रसन्नता खोजने लगता है जो अक्सर उसके पास होती ही नहीं। नया साल अब केवल तिथि नहीं रह गया; वह एक उपभोग–अनुष्ठान बन चुका है—जिसमें जश्न, स्थान, संगीत, शराब और जोखिम एक साथ गुँथे हुए हैं।
आज का नया साल मुख्यतः जगह-आधारित उत्सव है। होटल, रिसॉर्ट, क्लब, बार, फार्महाउस—ये सब नए साल के आधुनिक विशिष्ट स्थल बन गए हैं। यहाँ जाना केवल आनंद के लिए नहीं बल्कि यह दिखाने के लिए भी है कि व्यक्ति “कहाँ” जश्न मना रहा है। स्थान अब अनुभव से बड़ा हो गया है। किसी पाँच सितारा होटल की लॉबी में खड़े होकर खिंचाई गई तस्वीर, भीतर के आनंद से अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाती है। जश्न का मूल्य इस बात से तय होता है कि वह कितना महँगा, कितना एक्सक्लूसिव और कितना दुर्लभ दिखता है।
इन जगहों पर बजता तेज़ संगीत एक खास मनोवैज्ञानिक भूमिका निभाता है। फास्ट म्यूजिक केवल मनोरंजन नहीं बल्कि संवेदना को कुंद करने का उपकरण है। उसकी तेज़ धड़कन सोचने की गति को तोड़ देती है। व्यक्ति अपने भीतर उठते प्रश्नों, खालीपन या असंतोष को सुन न सके—इसके लिए शोर जरूरी है। इसलिए नए साल की रात शांति असहज लगती है और शोर अनिवार्य। यह संगीत शरीर को हिलाता है लेकिन मन को स्थिर नहीं होने देता। स्थिरता आज के जश्न की सबसे बड़ी दुश्मन है।
शराब इस पूरी व्यवस्था की धुरी बन चुकी है। वह केवल पेय नहीं, बल्कि सामाजिक स्वीकृति का टिकट है। नए साल की रात शराब न पीना कई बार एक अजीब–सा अपराध बन जाता है। “एक पैग तो बनता है”—यह वाक्य सिर्फ दोस्ताना आग्रह नहीं, बल्कि सामूहिक दबाव है। शराब व्यक्ति को अस्थायी साहस देती है—वह बोल देता है जो साल भर दबा रहा, वह करता है जो रोज़ नहीं कर पाता। लेकिन यह साहस उधार का होता है, और सुबह होते ही उसकी कीमत चुकानी पड़ती है—शरीर से भी और मन से भी।
नए साल का जश्न जितना चमकदार दिखाई देता है, उतना ही वह मानवीय जीवन के लिए असुरक्षा का वातावरण भी रचता है। यह असुरक्षा अचानक पैदा नहीं होती, बल्कि योजनाबद्ध शोर, नशे और भीड़ के मेल से धीरे-धीरे निर्मित होती है। जब उत्सव तेज़ संगीत, शराब और रात भर जागने की संस्कृति से जुड़ जाता है, तब विवेक सबसे पहले कमजोर होता है। विवेक के कमजोर होते ही जोखिम सामान्य लगने लगते हैं—तेज़ गाड़ी चलाना, असावधानी से सड़क पार करना, भीड़ में धक्का-मुक्की करना।
नशे की भूमिका यहाँ निर्णायक है। शराब व्यक्ति की निर्णय-क्षमता को घटाती है और प्रतिक्रिया को तेज़ करती है। इसी कारण नए साल की रात सड़क दुर्घटनाएँ, झगड़े और हिंसक घटनाएँ सामान्य दिनों की तुलना में अधिक होती हैं। यह केवल व्यक्तिगत असावधानी नहीं, बल्कि एक ऐसी सामाजिक संरचना का परिणाम है जहाँ जोखिम को रोमांच के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
भीड़ स्वयं एक और खतरा बन जाती है। क्लब, होटल और सार्वजनिक आयोजनों में क्षमता से अधिक लोगों का एकत्र होना आग, भगदड़ और दम घुटने जैसी स्थितियाँ पैदा करता है। इसके साथ ही महिलाओं और कमजोर वर्गों की सुरक्षा भी गंभीर प्रश्न बन जाती है, क्योंकि नशे और भीड़ का संयोजन अक्सर नियंत्रण को ढीला कर देता है।
नया साल, जो जीवन के उत्सव का प्रतीक होना चाहिए, कई बार जीवन के लिए ही असुरक्षा का क्षण बन जाता है—जहाँ आनंद की तलाश में सावधानी और जिम्मेदारी पीछे छूट जाती है।
उन्मुक्त वातावरण में जुए का आकर्षण भी बढ़ता है। कार्ड गेम, ऑनलाइन बेटिंग, कैसीनो–नुमा आयोजन—ये सब नए साल की रात को “रोमांचक” बनाने के नाम पर परोसे जाते हैं। जुआ यहाँ केवल पैसे का खेल नहीं, बल्कि नियंत्रण खोने का सुख है। साल भर की असफलताओं और दबावों के बाद मनुष्य एक रात के लिए भाग्य पर सब कुछ छोड़ देना चाहता है। यह मनोवृत्ति खतरनाक है, क्योंकि यह जोखिम को आनंद और नुकसान को खेल में बदल देती है।
इन सबके पीछे एक गहरा मनोविज्ञान काम करता है—नवीनता का भ्रम। नया साल मनुष्य को यह विश्वास दिलाता है कि समय बदलते ही जीवन भी बदल जाएगा। यह भ्रम इतना शक्तिशाली है कि लोग अपनी वास्तविक समस्याओं से मुठभेड़ करने के बजाय उन्हें जश्न से ढक देना बेहतर समझते हैं। होटल की चमक, शराब की गर्मी और संगीत की तेज़ी—ये सब मिलकर एक ऐसी कृत्रिम खुशी रचते हैं, जो अगले दिन फीकी पड़ जाती है।
मीडिया और विज्ञापन इस मनोविज्ञान को लगातार पोषित करते हैं। “इस नए साल को यादगार बनाइए”—यह वाक्य मानो चेतावनी हो कि यदि आपने तयशुदा तरीके से जश्न नहीं मनाया, तो आप कुछ खो देंगे। यादगार होना अब अनुभव का गुण नहीं बल्कि उपभोग का परिणाम बन गया है। जितना महँगा पैकेज, उतनी बड़ी खुशी—यह समीकरण चुपचाप हमारे मन में बैठ चुका है।
लेकिन इस जश्न का एक दूसरा पक्ष भी है, जो अक्सर अँधेरे में रह जाता है। सड़क दुर्घटनाएँ, हिंसा, घरेलू झगड़े, आर्थिक नुकसान—ये सब नए साल की रात के स्थायी साथी बन चुके हैं। उत्सव की यह संस्कृति व्यक्ति को जिम्मेदारी से मुक्त नहीं करती, बल्कि उसे और अधिक असावधान बना देती है। कानून और नैतिकता दोनों उस रात थोड़ी देर के लिए शिथिल मान ली जाती हैं—मानो कैलेंडर बदलने से दायित्व भी बदल जाएँगे।
यह प्रश्न अब जरूरी हो गया है कि क्या नया साल सचमुच उत्सव की मांग करता है, या यह केवल बाज़ार द्वारा निर्मित एक अवसर है? क्या खुशी का अनुभव शोर, नशे और जोखिम के बिना असंभव हो गया है? और यदि ऐसा है, तो यह केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं, बल्कि सामूहिक मानसिक संकट का संकेत है।
नया साल दरअसल एक मौन आत्मपरीक्षण का अवसर हो सकता था—बीते समय को देखने, गलतियों को समझने और आगे के लिए ठहराव से सोचने का लेकिन हमने उसे भागने की रात बना दिया है। भागना आसान है, ठहरना कठिन। इसलिए जश्न तेज़ है, लेकिन स्थायी नहीं।
शायद अब समय है कि हम नए साल को फिर से परिभाषित करें—होटलों की रोशनी से बाहर, तेज़ संगीत के शोर से दूर, और शराब की धुंध से परे। क्योंकि यदि हर नया साल केवल पुरानी आदतों का दोहराव बन जाए, तो तारीख बदलती रहेगी, जीवन नहीं।
नए साल के इस जश्न पर आलोचनात्मक दृष्टि रखते हुए एक और प्रश्न उठता है—क्या यह उत्सव सचमुच सामूहिक है, या यह केवल एक चयनित वर्ग का प्रदर्शन बनकर रह गया है? होटल, क्लब और रिसॉर्ट आधारित जश्न अनजाने में ही बहुसंख्यक समाज को बाहर छोड़ देता है। जिनके पास पैसे, समय और शहरी पहुँच है—जश्न उनके लिए है; बाकी लोग या तो दर्शक हैं या सेवा-प्रदाता। नया साल जिस क्षण “पैकेज” में बदलता है, उसी क्षण वह बराबरी की संभावना खो देता है।
यह ध्यान देने योग्य है कि नए साल की रात श्रम सबसे सस्ता और सबसे अदृश्य हो जाता है। होटल का स्टाफ, ड्राइवर, वेटर, सुरक्षा गार्ड, सफाईकर्मी—सब जश्न के केंद्र में होते हुए भी जश्न से बाहर रहते हैं। वे दूसरों की खुशी को संभव बनाते हैं लेकिन अपनी खुशी को स्थगित रखते हैं। यह विडंबना केवल सामाजिक नहीं, नैतिक भी है। जिस उत्सव की बुनियाद ही असमान श्रम पर टिकी हो, वह भीतर से खोखला ही होगा।
फास्ट म्यूजिक और नशे के मेल से पैदा होने वाली “उन्मुक्तता” को अक्सर स्वतंत्रता समझ लिया जाता है। लेकिन यह स्वतंत्रता नहीं, नियंत्रित विस्मृति है। क्लब की लाइट, डीजे की ध्वनि और शराब की उपलब्धता—सब मिलकर एक ऐसी स्थिति रचते हैं, जहाँ व्यक्ति अपनी सीमाएँ भूल जाए। यही भूल कई बार हिंसा, यौन उत्पीड़न और दुर्घटनाओं में बदल जाती है। अगले दिन अख़बारों में ये खबरें आती हैं, लेकिन उन्हें “दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएँ” कहकर जश्न की संस्कृति से अलग कर दिया जाता है—मानो दोनों का कोई संबंध ही न हो।
जुए का प्रसार इस रात एक और गंभीर संकेत देता है। यह केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि अनिश्चितता के साथ खेलने की मानसिकता है। नया साल भविष्य का प्रतीक माना जाता है और जुआ भविष्य को दाँव पर लगाने का खेल। दोनों का मेल मनोवैज्ञानिक रूप से खतरनाक है। यह व्यक्ति को यह विश्वास दिलाता है कि जीवन की जटिल समस्याओं का समाधान एक रात के जोखिम से निकल सकता है। यह सोच धीरे-धीरे जिम्मेदारी की भावना को खोखला करती है।
सोशल मीडिया ने इस पूरे जश्न को और अधिक आक्रामक बना दिया है। अब जश्न जीने से पहले दिखाना ज़रूरी है। लाइव स्टोरी, रील और पोस्ट—ये सब नए साल की रात के अनिवार्य अनुष्ठान बन चुके हैं। व्यक्ति अपने अनुभव से ज़्यादा अपने फ्रेम की चिंता करता है। यह स्थिति मनोविज्ञान की दृष्टि से गहरी बेचैनी को जन्म देती है—क्योंकि हर खुशी को तुरंत प्रमाणित करना पड़ता है। बिना कैमरे के बिताया गया सुख, आज मानो अधूरा है।
इस प्रदर्शन-प्रधान जश्न में अकेलापन और भी तीखा हो जाता है। जो लोग इन जगहों तक नहीं पहुँच पाते, उनके लिए नया साल उत्सव नहीं, अभाव की याद बन जाता है। अकेलेपन, अवसाद और आत्महत्या की घटनाएँ नए साल के आसपास बढ़ने का यही एक कारण है—जब समाज सामूहिक रूप से खुशी का आदेश देता है, तब दुख और भी अपराधबोध पैदा करता है।
यह भी गौर करने योग्य है कि नया साल अब सांस्कृतिक नहीं, कॉरपोरेट कैलेंडर का हिस्सा बन चुका है। डिस्काउंट, ऑफर, ईयर-एंड सेल—ये सब जश्न से पहले ही शुरू हो जाते हैं। उपभोग का यह दबाव व्यक्ति को थका देता है, लेकिन थकान स्वीकार्य नहीं है; क्योंकि थकान उत्सव-विरोधी मानी जाती है। इसलिए लोग थके हुए मन से भी जश्न मनाते हैं—और यही सबसे खतरनाक स्थिति है।
आलोचना का अर्थ उत्सव-विरोध नहीं है। प्रश्न यह है कि उत्सव किसका, किसके लिए और किस कीमत पर। यदि नया साल हमें और अधिक असंवेदनशील, असमान और असावधान बना रहा है, तो उस जश्न पर प्रश्न उठाना ज़रूरी है। शायद हमें यह स्वीकार करना होगा कि हर खुशी शोर से नहीं आती, और हर नया आरंभ शराब के गिलास से नहीं होता।
नया साल यदि सच में नया होना है, तो उसे हमें धीमेपन, जिम्मेदारी और सजगता की ओर ले जाना होगा। वरना यह उत्सव केवल एक रात का उन्माद बनकर रह जाएगा—जिसके बाद वही पुरानी थकान, वही पुरानी बेचैनी और वही पुराना खालीपन हमारा इंतज़ार कर रहा होगा।
नया साल अब समय का नहीं, मन की थकान का आयोजन बन गया है। कैलेंडर बदलने की यह तारीख उस सामूहिक बेचैनी का प्रतीक है, जिसमें लोग यह मान लेते हैं कि एक रात के शोर से पूरा साल हल्का हो जाएगा। यही वह बिंदु है जहाँ जश्न मनोविज्ञान का विषय बन जाता है—क्योंकि यहाँ खुशी स्वाभाविक नहीं, अनिवार्य कर दी जाती है।
आज का नया साल एक सामाजिक आदेश की तरह आता है—खुश रहो, बाहर निकलो, कुछ करो, कुछ खरीदो, कुछ पीयो। यह आदेश उन पर भी लागू होता है जो भीतर से थके हैं, टूटे हैं, अकेले हैं या शोक में हैं। यही से जश्न की सबसे बड़ी हिंसा शुरू होती है—वह व्यक्ति के मन की गति को नकार देता है। मनोविज्ञान कहता है कि जब भावनाओं को दबाकर विपरीत आचरण किया जाता है, तो वह आचरण आनंद नहीं, विस्थापन (displacement) पैदा करता है। नया साल उसी विस्थापन का उत्सव है।
होटल और क्लब इस विस्थापन के सबसे सुरक्षित मंच हैं। यहाँ हर चीज़ नियंत्रित है—लाइट, म्यूज़िक, शराब, भोजन, भीड़। व्यक्ति को लगता है कि वह स्वतंत्र है, जबकि वह एक पूरी तरह नियोजित अनुभव के भीतर खड़ा है। यही बाज़ार की सबसे महीन चाल है—वह नियंत्रण को आनंद की तरह प्रस्तुत करता है। तेज़ संगीत इसलिए नहीं कि लोग नाचें, बल्कि इसलिए कि वे सोच न सकें। धीमी सोच बाज़ार के लिए ख़तरनाक होती है।
फास्ट म्यूजिक यहाँ केवल ध्वनि नहीं, मनोवैज्ञानिक उपकरण है। उसकी तेज़ बीट दिल की धड़कन को तेज़ करती है, निर्णय-क्षमता को कमजोर करती है और जोखिम लेने की प्रवृत्ति बढ़ाती है। शराब इसी क्षण प्रवेश करती है—विचार को नहीं, प्रतिक्रिया को सक्रिय करने के लिए। यह संयोग नहीं है कि जुए, झगड़े, यौन हिंसा और सड़क दुर्घटनाओं की खबरें नए साल की रात के साथ आती हैं। यह सब “अपवाद” नहीं हैं; ये उसी व्यवस्था के स्वाभाविक परिणाम हैं।
जुए का नया साल से गहरा संबंध है, जिस पर कम बात होती है। जुआ केवल पैसे का खेल नहीं, भविष्य पर नियंत्रण की भ्रांति है। नया साल भविष्य का प्रतीक है और जुआ भविष्य को एक पल में बदल देने का सपना। यह सपना विशेषकर उन लोगों को आकर्षित करता है जिनका जीवन लंबे समय से ठहरा हुआ है। मनोविज्ञान इसे instant hope syndrome कहता है—जब व्यक्ति लंबी प्रक्रिया से भागकर तात्कालिक चमत्कार चाहता है। नया साल इस चमत्कार की झूठी उम्मीद को सबसे ज़्यादा बेचता है।
शराब यहाँ दु:ख को नहीं मिटाती, उसे स्थगित करती है। अगले दिन वही दुख लौटता है लेकिन अब अपराधबोध के साथ—कल इतना पैसा खर्च किया, इतना पिया, इतना किया… फिर भी कुछ बदला नहीं। यही अपराधबोध फिर अगले जश्न की ज़रूरत पैदा करता है। इस तरह नया साल एक चक्र बन जाता है| दु:ख → विस्मृति → अपराधबोध → नया दुख। यह चक्र जितना आकर्षक दिखता है, उतना ही विनाशकारी है।
एक और अनदेखा पक्ष है—नए साल की रात का अदृश्य डर। भीड़ में शामिल न हो पाने का डर, पीछे छूट जाने का डर (FOMO), कमतर दिखने का डर। सोशल मीडिया इस डर को कई गुना बढ़ा देता है। हर पोस्ट एक मौन प्रतियोगिता है—कौन ज़्यादा खुश, कौन ज़्यादा महँगे होटल में, कौन ज़्यादा “लाइव”। यह तुलना मन को भीतर से खोखला करती है। व्यक्ति अपनी ज़िंदगी नहीं, दूसरों की फ़ीड देखकर तय करने लगता है कि उसे कैसा महसूस करना चाहिए।
इस पूरी प्रक्रिया में परिवार और संबंध हाशिये पर चले जाते हैं। नया साल पहले एक घरेलू क्षण था—धीमा, आत्मीय, स्मृति-आधारित। अब वह घर से बाहर निकाल दिया गया है। घर में रहना इस रात असफलता जैसा महसूस कराया जाता है। यह सांस्कृतिक बदलाव नहीं, मूल्य-परिवर्तन है—जहाँ अंतरंगता को उबाऊ और शोर को ज़रूरी मान लिया गया है।
नए साल के जश्न में न्याय का प्रश्न भी छिपा है। यह जश्न किसके श्रम पर टिका है? होटल का कर्मचारी, टैक्सी ड्राइवर, पुलिस, नर्स, सफाईकर्मी—इनके लिए नया साल अतिरिक्त काम, अतिरिक्त थकान और अक्सर अतिरिक्त अपमान लेकर आता है। जब समाज एक रात के लिए आनंद का अधिकार खरीदता है तब कोई और अपनी नींद, समय और सुरक्षा गिरवी रखता है। यह असमानता उत्सव की सजावट में छिपा दी जाती है।
सबसे खतरनाक बात यह है कि नया साल अब आत्ममंथन से मुक्त हो गया है। पहले यह पीछे देखने और आगे सोचने का क्षण था। अब यह केवल आगे भागने की रात है। बीते साल की असफलताओं पर रुकना “नेगेटिव” कहलाता है। जबकि मनोविज्ञान कहता है कि बिना पीछे देखे आगे बढ़ना संभव नहीं। नया साल यदि केवल भूलने का उपकरण बन जाए, तो वह नया नहीं रह जाता—वह पुरानी समस्याओं का पुनरावर्तन बन जाता है।
यह सुगद्य नये साल के उत्सव का विरोध नहीं करता बल्कि उसके वर्तमान रूप पर प्रश्न उठाता है। क्या जश्न का अर्थ केवल तेज़ होना है? क्या खुशी के लिए नशा ज़रूरी है? क्या नए साल का स्वागत बिना होटल, शराब और शोर के नहीं हो सकता? ये प्रश्न इसलिए ज़रूरी हैं क्योंकि हर साल यह जश्न और तेज़, और महँगा, और असंवेदनशील होता जा रहा है।
शायद नया साल फिर से छोटा होना चाहिए—धीमा, सीमित, मानवीय। शायद उसे फिर से समय देना चाहिए, शोर नहीं। शायद उसे फिर से प्रश्न पूछने चाहिए, उत्तर नहीं खरीदने चाहिए। क्योंकि जो उत्सव हमें अगले दिन खाली छोड़ दे, वह उत्सव नहीं—एक व्यवस्थित भ्रम है।
नया साल तभी सचमुच नया होगा, जब वह हमें थोड़ा और जिम्मेदार, थोड़ा और संवेदनशील और थोड़ा और ईमानदार बनाए। वरना हर साल हम वही करेंगे—गिनती बदलेंगे, आदतें नहीं। और तब यह जश्न नहीं, केवल तारीख का बदलना भर रह जाएगा।
तो नया साल अच्छा कैसे मने ?
नया साल अच्छा मनाया नहीं जाता, नया साल जिया जाता है—यहीं से उत्तर शुरू होता है।
नया साल अच्छा तब बनेगा जब वह एक रात का उन्माद न होकर एक नैतिक और मानसिक संक्रमण बने। इसके लिए कोई बड़ा आयोजन नहीं चाहिए, बल्कि कुछ छोटे, लेकिन निर्णायक बदलाव चाहिए ऐसे बदलाव जो दिखते नहीं, लेकिन असर छोड़ते हैं।
1-नया साल धीमा होना चाहिए-
धीमापन आज सबसे बड़ा प्रतिरोध है। तेज़ संगीत, तेज़ फैसले, तेज़ नशे—ये सब मन को खाली करते हैं। नया साल यदि एक शाम को बैठकर चुप रहने, पिछली गलतियों को स्वीकारने और अगले वर्ष के लिए कोई एक जरूरी संकल्प चुनने का समय बन जाए, तो वह अच्छा होना शुरू हो जाता है। कई संकल्प नहीं—केवल एक, जिसे निभाया जा सके।
2-नया साल अकेलेपन को अपराध न बनाए-
हर व्यक्ति खुश नहीं होता, हर व्यक्ति बाहर नहीं जाना चाहता। नया साल अच्छा तब बनेगा जब समाज यह मान ले कि घर पर रहना, जल्दी सो जाना, किसी प्रिय को याद करना—ये भी वैध और सम्मानजनक तरीके हैं। जब खुशी का एक ही मॉडल नहीं होगा, तभी मन राहत पाएगा।
3-नया साल नशे पर नहीं, सजगता पर टिके-
खुशी को भूलने से नहीं, देखने से ऊर्जा मिलती है। शराब या किसी भी नशे से मिली खुशी अगले दिन उतर जाती है, लेकिन सजगता से मिली शांति टिकती है। नया साल अच्छा तब बनेगा जब हम अपने होश को बचाए रखें—क्योंकि वही हमें बेहतर इंसान बनाता है।
4-नया साल संबंधों को केंद्र में रखे-
एक सच्ची बातचीत, बिना मोबाइल के बैठना, किसी पुराने मित्र को सुनना—ये क्रियाएँ किसी भी पार्टी से ज़्यादा मूल्यवान हैं। नया साल अच्छा तब बनेगा जब हम संबंधों को दिखाने की चीज़ नहीं, निभाने की प्रक्रिया समझेंगे।
5-नया साल न्याय के प्रति थोड़ा संवेदनशील हो-
जब हम जश्न मनाएँ, तो यह भी देखें कि हमारे जश्न की कीमत कौन चुका रहा है। टैक्सी ड्राइवर से सम्मान, होटल स्टाफ से मानवीय व्यवहार, सड़क पर सावधानी—ये छोटे कर्म नए साल को नैतिक बनाते हैं। अच्छा साल वही है जो किसी और के लिए बुरा न हो।
6-नया साल कम उपभोग, अधिक अर्थ की ओर जाए-
हर नया साल हमें कुछ खरीदने के लिए उकसाता है। अच्छा नया साल वह है जिसमें हम कुछ छोड़ते हैं—एक बुरी आदत, एक अनावश्यक खर्च, एक दिखावटी अपेक्षा। जो छोड़ा जाता है, वही मन को हल्का करता है।
7-नया साल याद रखने का समय बने, भूलने का नहीं-
पिछले साल की पीड़ा को दबाने के बजाय समझना ज़रूरी है। दुख को समझे बिना खुशी स्थायी नहीं होती। नया साल अच्छा तब बनेगा जब हम यह स्वीकार करेंगे कि जीवन केवल उत्सव नहीं, संघर्ष भी है—और दोनों का सम्मान ज़रूरी है।
और अंत में—नया साल अच्छा तब नहीं बनेगा जब घड़ी बारह बजाएगी,वह अच्छा तब बनेगा जब हम अगले दिन कैसे उठते हैं, यह बदल जाए।
यदि अगली सुबह मन थोड़ा शांत हो, दृष्टि थोड़ी साफ हो और दूसरों के प्रति व्यवहार थोड़ा बेहतर हो—तो समझिए नया साल सचमुच नया हो गया।
Facebook Comments

