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By : Nishpaksh Pratinidhi | Published Date : 22 Sep 2026 6:46 PM |   181 views

परमानंद श्रीवास्तव की आलोचना की भाषा में लालित्य और विचार में संवेदनात्मक गहराई थी-परिचय दास

हिंदी आलोचना के महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर प्रो. परमानंद श्रीवास्तव की आलोचना में साहित्यिक विवेक के साथ अपने समय और समाज को देखने की गहरी दृष्टि थी। उनकी आलोचना रचना के मूल्यांकन तक सीमित नहीं रहती थी, बल्कि उसके पीछे सक्रिय जीवनानुभव और मानवीय सरोकारों को भी सामने लाती थी। यह विचार नव नालंदा महाविहार के भाषा संकाय के डीन प्रो. रवींद्र नाथ श्रीवास्तव ‘परिचय दास’ ने व्यक्त किए।
 
राजकीय बौद्ध संग्रहालय में आयोजित ‘परमानंद श्रीवास्तव : अवदान और महत्त्व’ राष्ट्रीय संगोष्ठी के अंतिम दिन 20 सितम्बर को प्रथम तकनीकी सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्रो. परिचय दास ने कहा कि परमानंद श्रीवास्तव की आलोचना को केवल साहित्यिक सिद्धांतों और मूल्य-निर्णयों के आधार पर देखना पर्याप्त नहीं होगा। उनकी दृष्टि रचना के भीतर मौजूद मनुष्य, समय और सामाजिक अनुभवों तक जाती थी।
 
उन्होंने कहा कि परमानंद श्रीवास्तव की आलोचना की भाषा में लालित्य और विचार में संवेदनात्मक गहराई थी। वे रचना के सामने केवल निर्णायक की भूमिका में उपस्थित नहीं होते थे, बल्कि उसके अनुभव-संसार में प्रवेश कर उसके अर्थों को समझने का प्रयास करते थे। इसी प्रक्रिया में उनकी आलोचना एक रचनात्मक पाठ का रूप ग्रहण करती थी।
 
प्रो. परिचय दास ने कहा कि उनकी आलोचना में साहित्य और समाज का संबंध किसी बाहरी निष्कर्ष से निर्मित नहीं होता। रचना को समझने की प्रक्रिया में ही सामाजिक संदर्भ उपस्थित रहते हैं। इसी वजह से उनकी आलोचना न तो केवल सौंदर्य-विवेचन बनती है और न सामाजिक टिप्पणी भर रह जाती है। उसमें साहित्यिकता, जीवनानुभव और मानवीय संवेदना का स्वाभाविक मेल दिखाई देता है।
 
उन्होंने यह भी कहा कि परमानंद श्रीवास्तव का आलोचक व्यक्तित्व आज पुनर्पाठ की मांग करता है। उनके सामने साहित्य और मनुष्य से जुड़े जो प्रश्न थे, वे बदलते संदर्भों में आज भी प्रासंगिक हैं। किसी आलोचक की परंपरा तभी जीवित रहती है, जब अगली पीढ़ियां उसके विचारों और प्रश्नों से नए संदर्भों में संवाद करती रहें।
 
तकनीकी सत्र में कंचन पटेल, आकाश यादव, अखिलेश पांडेय, शिवांगी गुप्ता, नीलकमल और मृत्युंजय कुमार ने शोधपत्र प्रस्तुत किए। राकेश रंजन और किरन तिवारी विषय विशेषज्ञ के रूप में उपस्थित रहे।
 
दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी 19 और 20 सितम्बर को राजकीय बौद्ध संग्रहालय, गोरखपुर में आयोजित की गई। आयोजन में देश के विभिन्न क्षेत्रों से आए साहित्यकारों, आलोचकों और अध्येताओं ने प्रो. परमानंद श्रीवास्तव के जीवन, कविता, आलोचना तथा साहित्यिक-सामाजिक अवदान के विभिन्न पक्षों पर विचार किया।
 
संगोष्ठी का आयोजन परमानंद श्रीवास्तव स्मृति न्यास, प्रेमचंद साहित्य संस्थान और ‘साखी’ पत्रिका की ओर से किया गया। कार्यक्रम में अरुण कमल, नरेश सक्सेना, शंभु नाथ, रामदेव शुक्ल, अनंत मिश्र, कृष्ण चंद्र लाल, ज्ञानवती श्रीवास्तव ,स्वनिल श्रीवास्तव, अवधेश प्रधान, बोधिसत्व, रघुवंश मणि, सदानंद शाही, अनिल राय, राजेश मल्ल, विमलेश मिश्र, राम नरेश राम, श्रुति कुमुद, अपराजिता श्रीवास्तव, अन्विता श्रीवास्तव, श्रुति श्रीवास्तव , प्रो. श्रुति, प्रेम शंकर, निशांत, बिहाग वैभव आदि उपस्थित थे।
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