सुविधा की कीमत, बराबरी का सवाल
हाल ही में व्हाट्सएप ने सब्सक्रिप्शन सर्विस शुरु की है। ‘व्हाट्सएप प्लस’। पहला महीना फ्री है। फिर 79 रुपये प्रति माह का शुल्क। व्हाट्सएप प्लस का नाम। एप आइकन, पिन चैट, थीम चेंज जैसे कुछ फ़ीचर इस सेवा में जोड़े गए हैं। दूसरी ओर एयरटेल ने भी अपने पोस्टपेड ग्राहकों को बेहतर नेटवर्क मुहैया कराने के लिए सशुल्क सेवा प्रदान की है। यानी अगर आप के पास पैसा नहीं है, तो कमजोर नेटवर्क, कॉल ड्राप जैसी समस्याओं से दो चार होंगे। याद रखिए तकनीक ने जीवन को सरल बनाया, यह उसकी बड़ी उपलब्धि है। पर जब वही तकनीक पहले आदत बनाकर फिर भुगतान का दबाव पैदा करे, तब क्या होगा? उसके बिना काम चलाना कठिन लगने लगता है। यह क्रम नया नहीं है, पर डिजिटल दुनिया ने इसे असाधारण गति दे दी है।कभी संवाद का अर्थ था दूरी को पार करने का एक सरल प्रयास। चिट्ठियाँ थीं, जिनमें समय लगता था। पर संबंधों में एक धैर्य भी बना रहता था। फिर फोन आए। बाद में संदेशों की दुनिया ने सब कुछ बदल दिया। सोशल मीडिया के उदय के साथ व्हाट्सएप जैसे माध्यमों ने बातचीत को इतना आसान बना दिया कि अब संवाद किसी विशेष अवसर की चीज़ नहीं रहा, बल्कि हर पल साथ रहने वाली प्रक्रिया बन गया। परिवार, मित्र, काम, शिक्षा, सब एक ही मंच पर सिमट आए।
इस सहजता ने धीरे-धीरे एक निर्भरता को जन्म दिया। अब स्थिति यह है कि कई काम बिना इन माध्यमों के पूरे ही नहीं हो पाते। सूचना, आमंत्रण, विचार-विनिमय, सब कुछ इन्हीं के सहारे चलता है। ऐसे में जब इसी व्यवस्था के भीतर नई परतें जोड़ी जाती हैं, तो उनका प्रभाव केवल तकनीकी नहीं रहता, वह सामाजिक भी हो जाता है।
हाल में ‘प्लस’ जैसी सेवाओं का आगमन इसी दिशा का संकेत है। अतिरिक्त शुल्क देकर कुछ नई सुविधाएँ प्राप्त की जा सकती हैं। अपनी पहचान को अलग ढंग से दिखाना, बातचीत को विशेष स्थान देना, रूप-रंग में परिवर्तन करना। देखने में ये छोटे बदलाव लगते हैं। पर, इनके भीतर एक बड़ा संकेत छिपा है। जो पहले सबके लिए एक समान था, वह अब अलग-अलग स्तरों में विभाजित होने लगता है।
यह विभाजन केवल सुविधा का नहीं है, बल्कि अनुभव का भी है। एक ही मंच पर दो प्रकार के उपयोगकर्ता मौजूद होंगे। एक वे, जो अतिरिक्त सुविधाओं के साथ हैं। और दूसरे वे, जो बिना उनके काम चला रहे हैं। धीरे-धीरे यह अंतर व्यवहार और प्राथमिकताओं में भी दिखाई देने लगता है।
इसी क्रम को दूरसंचार सेवाओं में भी देखा जा सकता है। बेहतर नेटवर्क, कम रुकावट, साफ़ आवाज़, ये सब अब एक अतिरिक्त भुगतान से जुड़े विकल्प बनते जा रहे हैं। इसका सीधा अर्थ है कि जो व्यक्ति अधिक भुगतान कर सकता है, उसे बेहतर संपर्क मिलेगा। जो नहीं कर सकता, उसे बार-बार टूटते संवाद से समझौता करना होगा।
यहाँ एक बुनियादी प्रश्न खड़ा होता है। क्या संचार जैसी आवश्यक सुविधा को इस तरह स्तरों में बाँटना उचित है? सड़क, पानी, बिजली की तरह ही अब डिजिटल संपर्क भी जीवन की मूल ज़रूरत बन चुका है। ऐसे में यदि इसकी गुणवत्ता आर्थिक क्षमता पर निर्भर होने लगे, तो यह स्थिति केवल बाज़ार की नहीं रह जाती, यह सामाजिक असमानता का एक नया रूप बन जाती है।
याद रखिए तकनीक ने हमें जोड़ने का वादा किया था। उसने दूरी कम की। अवसर बढ़ाए। संवाद को सरल बनाया। पर अब वही तकनीक यदि धीरे-धीरे चयनित सुविधा का रूप लेने लगे, तो उसके मूल उद्देश्य पर पुनर्विचार आवश्यक हो जाता है।
यह भी समझना होगा कि यह बदलाव अचानक नहीं आता। पहले एक छोटी सुविधा जोड़ दी जाती है। फिर उसके लिए मामूली शुल्क रखा जाता है। उपयोगकर्ता इसे स्वीकार कर लेते हैं, क्योंकि वह पहले से उस मंच के अभ्यस्त होते हैं। धीरे-धीरे यही प्रक्रिया आगे बढ़ती है और नई-नई सुविधाएँ उसी ढाँचे में जुड़ती जाती हैं।
इस पूरे परिदृश्य में उपयोगकर्ता की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। सुविधा के आकर्षण में हम अक्सर उसके दीर्घकालिक प्रभाव पर विचार नहीं करते। जो चीज़ आज वैकल्पिक लगती है, वह कल आवश्यक बन सकती है। इसलिए यह आवश्यक है कि हम केवल उपभोक्ता के रूप में नहीं, बल्कि सजग नागरिक के रूप में भी सोचें।
सवाल यह नहीं है कि तकनीक विकसित क्यों हो रही है? इसका विकास स्वाभाविक है। सवाल यह है कि उसका स्वरूप कैसा हो? समावेशी या विभाजित। यदि संवाद के साधन ही असमानता को बढ़ाने लगें, तो समाज के भीतर अदृश्य दूरी पैदा होती है, जिसे पाटना कठिन होता है।
इसलिए समय की मांग है कि सुविधा और समानता के बीच संतुलन बनाए रखा जाए। तकनीक तभी सार्थक होगी, जब वह अधिक से अधिक लोगों को जोड़ने का माध्यम बने, न कि उन्हें अलग-अलग दायरों में बाँटने का साधन। छोटे-छोटे बदलावों को समझते हुए, उनके दूरगामी प्रभाव पर विचार करना आज पहले से कहीं अधिक आवश्यक हो गया है।
डिजिटल युग में यह सवाल और भी अहम है। क्योंकि यहाँ दूरी भौतिक नहीं, पर असर गहरा है। एक क्लिक, एक शुल्क, एक प्रीमियम लेयर। और बराबरी की जमीन थोड़ी और संकरी हो जाती है। इसी संकुचन को पहचानना आज की सबसे ज़रूरी सजगता है।
—डॉ. देवेंद्र नाथ तिवारी
संचार अध्येता लेखक, न्यू मीडिया तकनीकी के जानकार हैं|
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