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By : Nishpaksh Pratinidhi | Published Date : 22 Feb 2026 8:39 PM |   139 views

प्राचीन भारत में शिक्षा हमारे लिए आजीविका का साधन नहीं अपितु एक संस्कार थी

कुशीनगर-राष्ट्रीय सेवा योजना के पांचवें दिन मुख्य अतिथि अंबुजेश ने ” शिक्षा के बदलते स्वरूप से युवाओं का सामंजस्य” विषय पर चर्चा करते हुए बताया कि वर्तमान शिक्षा का सबसे बड़ा संकट गुरु – शिष्य संबंध में गिरावट है। हमारा युग इस बात का साक्षी है कि हमारे युवा किताबों की जगह मोबाइल से इश्क कर रहे हैं। यह वर्तमान शिक्षा के पतन का एक प्रमुख कारण है। आपने युवाओं को रटने की जगह समझने का सुझाव दिया। उन्होंने  बताया कि रटे गए गए ज्ञान, समझे गए ज्ञान और उतारे गए ज्ञान में काफी अंतर होता है।भारतीय ज्ञान परंपरा में रटने की जगह समझने पर बल दिया जाता था।

प्राचीन भारत में शिक्षा का स्तर बहुत ऊंचा था ।उस समय सभी लोग साक्षर थे क्योंकि शिक्षा हमारे लिए आजीविका का साधन नहीं अपितु एक संस्कार थी।ब्रिटिश काल में प्रत्येक गांव में गुरुकुल थे । शिक्षा व्यवस्था समाज द्वारा संचालित और आत्मनिर्भर थी।आपने युवाओं से आह्वान किया कि प्रतिदिन कम से कम 2 घंटे मोबाइल से दूर रहें।

मुख्य का परिचय कार्यक्रम अधिकारी डॉ निगम मौर्य द्वारा कराया गया जबकि आभार डॉ पारस नाथ द्वारा किया गया। कार्यक्रम का संचालन स्वयंसेवक अंकित कुशवाहा ने किया। दिन शुरुआत स्वयंसेवकों द्वारा कसया नगर में स्वच्छता जागरूकता रैली निकालने के साथ की गई।

इस अवसर पर स्वयंसेवकों ने गंदगी फैलाने वाले दुकानदारों को गुलाब भेंट कर ऐसा न करने हेतु प्रेरित किया गया। स्वच्छता रैली में कसया नगर पालिका के स्वच्छता कर्मियों ने भी सहयोग किया।

आज स्वयंसेवकों द्वारा सांस्कृतिक संध्या का भी आयोजन किया गया | जिसमे ममता कुमारी, निधि सिंह, खुशी वर्मा, कृति कुशवाहा, वासु प्रसाद गोंड, दीपू चौरसिया आदि ने नृत्य ,गीत समेत अनेक विधाओं में शानदार प्रस्तुतियां दी। शिविर में कुल 150 स्वयंसेवक प्रतिभाग कर रहे हैं।
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