स्वामी विवेकानंद एवं महर्षि महेश योगी – भारतीय आध्यात्म की आधुनिक पुनर्व्याख्या
— परिचय दास
प्रोफेसर, नव नालंदा महाविहार विश्वविद्यालय, नालंदा
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जयंती किसी व्यक्ति की नहीं, एक चेतना की होती है। वह तिथि नहीं, एक आवर्तन होती है—जिसमें समय अपने भीतर झाँकता है और देखता है कि उसने किन आवाज़ों को अब तक सुना, किन्हें टाल दिया और किन्हें सुनते हुए भी अनसुना कर दिया। स्वामी विवेकानंद और महर्षि महेश योगी दोनों की जयंती इसी अर्थ में भारतीय आत्मा की दो अलग-अलग, किंतु अंतर्धारा में एक ही दिशा की घोषणाएँ हैं। दोनों न तो केवल संत हैं, न केवल विचारक; वे भारतीय चेतना के ऐसे उच्चारण हैं जो अपने-अपने समय में आधुनिकता से टकराते हुए, उसे आत्मा का रास्ता दिखाते हैं।
स्वामी विवेकानंद उस काल में प्रकट होते हैं जब भारत औपनिवेशिक हीनता से ग्रस्त था।आत्मविश्वास का क्षय केवल राजनीतिक नहीं था; वह सांस्कृतिक और आध्यात्मिक स्तर पर भी गहरा था। पश्चिम की प्रगति के सम्मुख भारतीय परंपरा को या तो जड़ कहा जा रहा था या मिथकीय।
स्वामी विवेकानंद का उदय इस मिथ्या द्वंद्व को तोड़ने के लिए हुआ। वे वेदांत को संग्रहालय की वस्तु नहीं बनाते बल्कि उसे चलती हुई, साँस लेती हुई चेतना के रूप में प्रस्तुत करते हैं। उनके लिए धर्म पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर स्थित उस शक्ति का उद् घाटन है जो उसे निर्भीक, करुणाशील और सक्रिय बनाती है। विवेकानंद का धर्म साहस का धर्म है—ऐसा साहस जो ज्ञान से उपजता है, न कि अंध-आस्था से।
स्वामी विवेकानंद की भाषा में एक अनूठा आवेग है। वह उपदेशात्मक नहीं, आह्वानात्मक है। वह भीतर छिपे हुए मनुष्य को जगाने की भाषा है। “उठो, जागो”—यह वाक्य केवल प्रेरक नारा नहीं, एक अस्तित्वगत पुकार है। विवेकानंद के यहाँ आत्मा कोई अमूर्त अवधारणा नहीं, बल्कि कर्म में उतरने वाली शक्ति है। यही कारण है कि वे संन्यास को पलायन नहीं, सेवा का उच्चतम रूप मानते हैं। उनके लिए भारत की मुक्ति केवल राजनीतिक नहीं; वह आत्मिक है। भूख, अशिक्षा और दैन्य उनके लिए आध्यात्मिक संकट हैं। इसीलिए वे कहते हैं कि जब तक भूखा व्यक्ति है, तब तक ईश्वर को खोजने का दावा खोखला है।
महर्षि महेश योगी एक भिन्न समय में आते हैं। यह वह समय है जब औपनिवेशिक सत्ता जा चुकी है, पर आधुनिक जीवन की गति, तनाव और विखंडन मनुष्य को भीतर से थका चुका है। विज्ञान और तकनीक ने सुविधा दी है पर शांति नहीं। महर्षि जी इस संकट को पहचानते हैं और उसका समाधान किसी वैचारिक बहस में नहीं, अनुभव की सरल पद्धति में खोजते हैं। उनका ध्यान—ट्रान्सेंडेंटल मेडिटेशन—किसी दर्शन का बोझ नहीं ढोता; वह सीधे अनुभव में उतरता है। यह आधुनिक मनुष्य के लिए भारतीय अध्यात्म का एक सहज प्रवेश द्वार है।महर्षि महेश योगी जी का महत्त्व इस बात में है कि वे अध्यात्म को रहस्यात्मक आवरण से बाहर निकालकर वैज्ञानिक संवाद में लाते हैं। वे कहते हैं कि चेतना का अध्ययन भी उतना ही वस्तुनिष्ठ हो सकता है जितना पदार्थ का। उनके लिए ध्यान कोई पलायन नहीं, बल्कि कार्यक्षमता की वृद्धि का साधन है। तनावमुक्त मन अधिक रचनात्मक होता है—यह बात वे प्रयोग, शोध और आँकड़ों के साथ रखते हैं। इस प्रकार वे भारतीय योग परंपरा को वैश्विक आधुनिकता के साथ संवाद में स्थापित करते हैं।
स्वामी विवेकानंद और महर्षि महेश योगी दोनों के यहाँ एक साझा सूत्र है: आत्मा की सार्वभौमिकता। विवेकानंद इसे अद्वैत के दार्शनिक रूप में कहते हैं—एक ही आत्मा सबमें। महर्षि इसे चेतना के स्तर पर अनुभव कराते हैं—सबके भीतर वही शुद्ध चेतना। अंतर केवल अभिव्यक्ति का है। विवेकानंद का स्वर गरजता हुआ है; महर्षि का स्वर शांत, लगभग मौन के निकट। एक मंच से बोलते हैं, दूसरा ध्यानकक्ष में बैठकर। पर दोनों का लक्ष्य मनुष्य को उसके भीतर के केंद्र से जोड़ना है।
स्वामी विवेकानंद का वैश्विक प्रभाव उनके शिकागो भाषण से जुड़ा है, जहाँ उन्होंने पश्चिम को पहली बार यह अनुभव कराया कि भारत केवल अतीत का देश नहीं बल्कि जीवित दार्शनिक परंपरा है। उन्होंने हिंदू धर्म को किसी संकीर्ण पहचान में नहीं बाँधा; वह उनके लिए सहिष्णुता और स्वीकार का विशाल क्षेत्र है।
महर्षि जी का वैश्विक प्रभाव भिन्न मार्ग से जाता है। वे हॉलीवुड से लेकर विश्वविद्यालयों तक, साधकों से लेकर वैज्ञानिकों तक पहुँचते हैं। वे अध्यात्म को किसी धर्म-लेबल से मुक्त रखते हैं ताकि वह हर व्यक्ति के लिए सुलभ हो सके।
स्वामी विवेकानंद का रोमांस आत्मसम्मान का पुनर्निर्माण था। महर्षि का व्यावहारिकपन उस संसार से संवाद था जो अनुभव के बिना किसी बात को स्वीकार नहीं करता। जयंती के अवसर पर इन दोनों को स्मरण करना केवल श्रद्धांजलि नहीं, आत्मपरीक्षण है। आज का भारत एक विचित्र द्वंद्व में है। एक ओर वह विश्वगुरु होने का स्वप्न देखता है, दूसरी ओर भीतर से असंतुलित है। स्वामी विवेकानंद हमें याद दिलाते हैं कि बिना चरित्र के शक्ति विनाशकारी हो जाती है।
महर्षि हमें बताते हैं कि बिना आंतरिक शांति के प्रगति थकान में बदल जाती है। दोनों मिलकर एक समग्र दृष्टि देते हैं—जहाँ कर्म और ध्यान, सेवा और शांति, समाज और आत्मा परस्पर विरोधी नहीं, पूरक हैं। इनकी जयंती किसी कैलेंडर की घटना नहीं बल्कि एक प्रश्न है क्या हमने उस चेतना को आगे बढ़ाया है जिसे उन्होंने जगाया था? क्या विवेकानंद का निर्भीक मनुष्य और महर्षि का शांत मनुष्य आज हमारे समाज में संभव है? शायद उत्तर सरल नहीं। पर इतना निश्चित है कि इन दोनों के बिना आधुनिक भारतीय आत्मा की कल्पना अधूरी है। वे दो ध्रुव हैं एक सक्रिय, दूसरा अंतर्मुखी और इनके बीच ही मनुष्य की पूर्णता का आकाश फैला है।
जयंती इसलिए महत्त्वपूर्ण नहीं कि हम पुष्प चढ़ाएँ बल्कि इसलिए कि हम अपनी भीतरी थकान और भीतरी कायरता को पहचानें। स्वामी विवेकानंद हमें खड़ा होना सिखाते हैं। महर्षि जी हमें भीतर उतरना और जब मनुष्य खड़ा होकर भीतर उतरता है तभी इतिहास में कोई नई संभावना जन्म लेती है। यही इन दोनों की संयुक्त विरासत है—एक ऐसी विरासत जो न स्मारक चाहती है, न शोर; केवल सजग मनुष्य।
स्वामी विवेकानंद और महर्षि महेश योगी दोनों के सिद्धांत भारतीय आध्यात्मिक परंपरा के भीतर जन्म लेते हैं, पर उनका स्वर, प्रयोजन और प्रस्तुति अपने-अपने ऐतिहासिक संदर्भों में भिन्न हैं।
इनका बारीक विश्लेषण तभी संभव है जब उन्हें केवल संत या योगगुरु के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय चेतना के दो अलग-अलग बौद्धिक हस्तक्षेपों के रूप में देखा जाए। एक हस्तक्षेप औपनिवेशिक अपमान और आत्मविस्मृति के दौर में खड़ा होता है, दूसरा उत्तर-औपनिवेशिक, तकनीकी और मानसिक थकान से ग्रस्त विश्व में।
स्वामी विवेकानंद का केंद्रीय सिद्धांत अद्वैत वेदांत है किंतु वह शंकराचार्य की दार्शनिक भाषा में सीमित नहीं रहता। विवेकानंद के यहाँ अद्वैत एक जीवंत, सामाजिक और नैतिक परियोजना बन जाता है। उनके लिए ब्रह्म और आत्मा की एकता केवल तात्त्विक निष्कर्ष नहीं बल्कि सामाजिक समानता का आधार है। यदि सबमें एक ही आत्मा है, तो ऊँच-नीच, छुआछूत, स्त्री-द्वेष और दरिद्रता न केवल सामाजिक बुराइयाँ हैं बल्कि आध्यात्मिक अपराध भी। विवेकानंद का सिद्धांत यहीं पर परंपरागत संन्यास से भिन्न हो जाता है। वे आत्मसाक्षात्कार को समाज से विमुखता के रूप में नहीं बल्कि समाज के प्रति उत्तरदायित्व के रूप में देखते हैं।
उनका दूसरा महत्त्वपूर्ण सिद्धांत शक्ति का है। स्वामी विवेकानंद बार-बार निर्भीकता, आत्मविश्वास और पुरुषार्थ पर ज़ोर देते हैं। यह शक्ति किसी आक्रामक राष्ट्रवाद की शक्ति नहीं बल्कि आत्मा की वह ऊर्जा है जो मनुष्य को भय, दैन्य और पराजय-बोध से मुक्त करती है। उनके अनुसार भारतीय समाज की सबसे बड़ी समस्या बाहरी शोषण से अधिक आंतरिक दुर्बलता है। इसलिए वे शिक्षा को सूचना का संचय नहीं, बल्कि चरित्र-निर्माण की प्रक्रिया मानते हैं। शिक्षा का उद्देश्य ऐसा मनुष्य गढ़ना है जो स्वयं पर विश्वास कर सके और दूसरों के दुःख को अपना समझ सके।
स्वामी विवेकानंद के सिद्धांतों में धर्म की परिभाषा अत्यंत व्यापक है। उनके लिए धर्म किसी एक संप्रदाय या पूजा-पद्धति का नाम नहीं। धर्म वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से मनुष्य अपनी अंतर्निहित दिव्यता को प्रकट करता है। इसीलिए वे सभी धर्मों की सत्यता की बात करते हैं, पर साथ ही अंधविश्वास और जड़ कर्मकांड की तीखी आलोचना भी करते हैं। उनका धर्म तर्क-विरोधी नही बल्कि तर्क से परे जाकर अनुभव में उतरने वाला धर्म है। यह अनुभव कर्म, भक्ति, ज्ञान और राजयोग—चारों मार्गों से संभव है। विवेकानंद का समन्वयवाद यहाँ स्पष्ट होता है।
महर्षि महेश योगी के सिद्धांत इसी परंपरा से निकलते हैं पर उनकी भाषा, पद्धति और लक्ष्य अधिक विशिष्ट हैं। महर्षि का केंद्रीय सिद्धांत चेतना है—शुद्ध चेतना जो विचारों, भावनाओं और संवेदनाओं के नीचे विद्यमान है। वे मानते हैं कि मनुष्य सामान्यतः चेतना के सतही स्तर पर जीता है, जहाँ तनाव, भय और असंतुलन स्वाभाविक हैं। ट्रान्सेंडेंटल मेडिटेशन का उद्देश्य मन को उसके स्रोत तक ले जाना है, जहाँ विचार अपने आप शांत हो जाते हैं और व्यक्ति उस शुद्ध चेतना का अनुभव करता है।
महर्षि का ध्यान सिद्धांत इस अर्थ में अनोखा है कि वह किसी नैतिक अनुशासन, वैचारिक तैयारी या दार्शनिक अध्ययन को पूर्वशर्त नहीं बनाता। उनके अनुसार चेतना तक पहुँचना मनुष्य का स्वाभाविक अधिकार है, न कि केवल संन्यासियों या साधकों का विशेषाधिकार। यह सिद्धांत भारतीय योग परंपरा के लोकतंत्रीकरण जैसा है। ध्यान अब वन या आश्रम तक सीमित नहीं बल्कि गृहस्थ जीवन, कार्यस्थल और आधुनिक दिनचर्या का हिस्सा बन सकता है।
महर्षि का दूसरा महत्त्वपूर्ण सिद्धांत विज्ञान और अध्यात्म के संबंध से जुड़ा है। वे यह दावा करते हैं कि चेतना के अनुभव को वैज्ञानिक विधियों से जाँचा और प्रमाणित किया जा सकता है। उनके नेतृत्व में ध्यान पर हुए शोध तनाव में कमी, रचनात्मकता में वृद्धि, मानसिक स्वास्थ्य में सुधार इसी दृष्टि के उदाहरण हैं। यहाँ अध्यात्म किसी आस्था-तंत्र की बजाय अनुभवजन्य प्रक्रिया बन जाता है। यह आधुनिक बुद्धि को संबोधित करने की रणनीति है, जो विश्वास से पहले प्रमाण चाहती है।
यदि स्वामी विवेकानंद का जोर सामाजिक और नैतिक पुनर्जागरण पर है तो महर्षि जी का जोर मानसिक और आंतरिक संतुलन पर। स्वामी विवेकानंद का मनुष्य कर्मशील है सेवा करता हुआ, संघर्ष करता हुआ। महर्षि जी का मनुष्य शांत है अपने भीतर स्थिर, तनावमुक्त पर यह अंतर विरोध का नहीं, दृष्टिकोण का है। विवेकानंद मानते हैं कि बिना आत्मिक शक्ति के कर्म खोखला है। महर्षि मानते हैं कि बिना आंतरिक शांति के कर्म बोझ बन जाता है। दोनों अपने-अपने ढंग से मनुष्य की संपूर्णता की बात करते हैं।
स्वामी विवेकानंद के सिद्धांतों में राष्ट्र और संस्कृति का प्रश्न केंद्रीय है। वे भारत को केवल भौगोलिक इकाई नहीं बल्कि आध्यात्मिक प्रयोगशाला मानते हैं। उनका विश्वास है कि भारत का योगदान दुनिया को भौतिक समृद्धि नहीं, बल्कि जीवन-दृष्टि देना है। महर्षि इस राष्ट्रीय आग्रह से अपेक्षाकृत मुक्त दिखाई देते हैं। उनका दृष्टिकोण वैश्विक है—चेतना की कोई जाति, देश या धर्म नहीं। इसीलिए उनका आंदोलन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अधिक सहजता से स्वीकार किया गया।
स्वामी विवेकानंद और महर्षि महेश योगी जी के सिद्धांत आधुनिक भारतीय और वैश्विक चेतना के लिए अत्यंत प्रासंगिक हैं। विवेकानंद हमें आत्महीनता से बाहर निकालते हैं और बताते हैं कि मनुष्य मूलतः शक्तिशाली और दिव्य है। महर्षि हमें बताते हैं कि इस शक्ति का स्रोत बाहरी संघर्ष नहीं, आंतरिक मौन है। एक मनुष्य को खड़ा करता है, दूसरा उसे भीतर स्थिर करता है।
इन दोनों के सिद्धांतों का बारीक विश्लेषण अंततः इसी निष्कर्ष तक पहुँचता है कि भारतीय आध्यात्मिक परंपरा कोई एकरेखीय विचारधारा नहीं, बल्कि बहुस्तरीय चेतना है। स्वामी विवेकानंद और महर्षि जी उस चेतना के दो उच्चारण हैं एक में गर्जना है, दूसरे में नीरवता और संभवतः आधुनिक मनुष्य को दोनों की आवश्यकता है: गर्जना भी ताकि वह अन्याय और जड़ता के विरुद्ध खड़ा हो सके; और नीरवता भी ताकि वह स्वयं से बिछुड़ न जाए।
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