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By : Nishpaksh Pratinidhi | Published Date : 21 Nov 2025 8:18 PM |   361 views

शास्त्र कभी पहले नहीं हो सकता, लोक संस्कृति सबसे पहले है-डॉ० विंध्याचल

बनारस -भोजपुरी अध्ययन केन्द्र, कला संकाय,काशी हिन्दू विश्वविद्यालय द्वारा ‘भोजपुरी लोकगीत और चित्रकला : पाठ, गायन और चित्रकला’ अंतर-विषयक सप्तदिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला के पांचवे दिन गोरखपुर से आए प्रख्यात लोक गायक डॉ. राकेश श्रीवास्तव ने कहा कि हमारी युवा पीढ़ी जाने कि हमारे संस्कार गीत कैसे होते थे? उन्होंने गर्भ से लेकर विवाह तक के संस्कार गीत की प्रस्तुति दी।
 
ससुराल में रह रही स्त्री की प्रसव पीड़ा की अभिव्यक्ति का लाचारी गीत ‘दरदो से व्याकुल जिया मोर हो, कोई दरदो न जाने।’ राम जी के जन्म का सोहर ‘मचिया बैठाले राजा दशरथ..’ मुंडन संस्कार का गीत घर में से निकले होरिलवा, दुरियवे में रोवेला हो।’ यज्ञोपवीत संस्कार के गीत में बालक रूठ कर कदंब के पेड़ पर बैठ जाता है। विवाह के पहले शिव और पार्वती को साक्षी मानकर गाए जाने वाले गीत ‘गाय के गोबरा में महादेव अंगना लिपाई..’, शगुन के मंगल गीत, माटी खोदने का गीत, चुमावन का गीत, पोखरा का गीत, इमली घोटाई का गीत, बारात आने का गीत, परछन का गीत, ताग-पात में गारी गीत, पाणि ग्रहण, सिंदूर दान और विदाई का गीत ‘सोने के पिंजड़ा में बंद चिरई’ की मार्मिक प्रस्तुति दी। संवादिनी पर साथ दिया शोधार्थी कृष्ण कुमार तिवारी ने और तबले पर संगत हिमांशु ने की।
 
इस परिचर्चा का आधार वक्तव्य देते हुए हिन्दी विभाग के सहायक आचार्य डॉ० विंध्याचल यादव ने कहा कि इस कार्यशाला का आयोजन अपने आप में बहुत विशेष है। हिन्दी में पूरा भक्तिकाल लोक साहित्य ही है। लोक के साथ शास्त्र का लेनदेन और मुठभेड़ हमेशा चलती रहती है। शास्त्र कभी पहले नहीं हो सकता, लोक संस्कृति सबसे पहले है। लोक ने शास्त्र और व्याकरण के लिए राहें निकालने का काम किया है। लोक में गर्भ से लेकर अंत्येष्टि तक के संस्कार गीत हैं। संस्कार गीत में विवाह संस्कार में लोक और शास्त्र समानांतर चलता है। स्त्रियों के श्रम की गाथा उनके सामाजिक योगदान, उनकी पीड़ा, उनकी भूमिका के साक्ष्य हैं लोक गीत। लोक की सांगीतिक भाषा के अध्ययन की आज आवश्यकता है।
 
आज की इस परिचर्चा का संचालन हिन्दी विभाग के सहायक आचार्य डॉ. विंध्याचल यादव एवं धन्यवाद डॉ. शांतिस्वरूप सिन्हा ने ज्ञापित किया। 
 
इस दौरान भोजपुरी अध्ययन केन्द्र के समन्वयक एवं इस सप्तदिवसीय कार्यशाला के संयोजक प्रो० प्रभाकर सिंह, प्रो. सुदामा सिंह, प्रो.आरती निर्मल, डॉ. राकेश श्रीवास्तव, डॉ. विंध्याचल यादव, डॉ. शांतिस्वरूप सिन्हा, डॉ. शैलेन्द्र सिंह, डॉ. उदय पाल आदि के साथ ही काफ़ी संख्या में शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों की उपस्थिति रही।
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