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By : Nishpaksh Pratinidhi | Published Date : 10 Jun 2026 7:33 PM |   35 views

खेती में आने से पहले ये बातें अवश्य समझ लें

आजकल बड़ी संख्या में युवा, नौकरीपेशा लोग, व्यवसायी और शहरों में रहने वाले परिवार खेती, प्राकृतिक खेती, बागवानी, डेयरी, फार्म स्टे और कृषि आधारित उद्यमों की ओर आकर्षित हो रहे हैं। सोशल मीडिया और यूट्यूब पर दिखाई देने वाली सफलता की कहानियां इस रुचि को और बढ़ाती हैं। लेकिन खेती में प्रवेश करने से पहले कुछ मूलभूत वास्तविकताओं को समझना अत्यंत आवश्यक है।
 
पहले अपनी आर्थिक तैयारी का आकलन करें-
  • यदि आप नई शुरुआत कर रहे हैं, तो केवल जमीन खरीद लेना या पट्टे पर ले लेना पर्याप्त नहीं है। भूमि विकास, सिंचाई व्यवस्था, पौध सामग्री, मशीनरी, श्रम, बिजली, परिवहन और रखरखाव जैसे अनेक खर्च सामने आते हैं।
  • कम से कम 2 से 3 वर्षों तक बिना नियमित आय के काम चलाने की आर्थिक क्षमता होनी चाहिए। खेती में निवेश का प्रतिफल अधिकांश मामलों में समय लेकर आता है।
 
खेती को केवल आय का साधन नहीं, जीवनशैली परिवर्तन समझें-
जो लोग शहरों की सुविधाओं, निश्चित वेतन और व्यवस्थित जीवनशैली के अभ्यस्त हैं, उनके लिए खेती केवल व्यवसाय नहीं बल्कि जीवनशैली का परिवर्तन भी है। धूप, गर्मी, वर्षा, सर्दी, अनिश्चित मौसम और दैनिक समस्याओं के साथ काम करने का मानसिक साहस आवश्यक है। खेत की समस्याएं छुट्टी नहीं लेतीं। कई बार आपको स्वयं उपस्थित होकर निर्णय लेने पड़ते हैं।
 
किसी की सफलता की नकल न करें-
  • सबसे बड़ी गलती तब होती है जब लोग किसी दूसरे किसान की सफलता देखकर उसी मॉडल को अपने खेत में लागू करने लगते हैं।
  • जो व्यक्ति आज सफल दिखाई देता है, उसके पीछे कई वर्षों का अनुभव, प्रयोग, असफलताएं, सीख और संघर्ष छिपा होता है। सफलता दिखाई देती है, लेकिन उसके पीछे की मेहनत दिखाई नहीं देती।
  • इसलिए किसी फसल, बगीचे या कृषि उद्यम को अपनाने से पहले अपनी भूमि, जलवायु, बाजार और संसाधनों का विश्लेषण अवश्य करें/करवायें। बल्कि जमीन लेने से पहले किसी विशेषज्ञ से हर परिस्थिति समझ कर ही आगे बढ़े जिससे ये उद्देश्यपरक निर्णय साबित हो।
 
पहले अपनी भूमि और जलवायु को समझें-
हर भूमि हर फसल के लिए उपयुक्त नहीं होती।
  • आपकी मिट्टी पथरीली है या दोमट?
  • भारी है या हल्की?
  • ठंड कितने दिन रहती है?
  • पानी पर्याप्त है या सीमित?
  • मानसून कब आता है?
  • मानसून कितने दिन रहता है?
  • तापमान कितना बढ़ता और घटता है?
  • बाजार मे लोगों को पसन्द क्या स्वरूप या किस्म है?
  • किस वक्त भाव सबसे अच्छे रहते हैँ?
  • किस जगह भाव अच्छे रहते हैँ?
 
इन जैसे प्रश्नों के उत्तर तय करेंगे कि आपके लिए कौन सी फसल या कौन सा कृषि उद्यम उपयुक्त रहेगा।
 
रत्नागिरी का अल्फांसो आम हर जगह अल्फांसो जैसा स्वाद नहीं देता। कीवी हर जिले में सफल नहीं होती। इसी प्रकार प्रत्येक फसल की अपनी भौगोलिक और जलवायु आवश्यकताएं होती हैं। इलाहाबादी सफेदा अमरुद हरेक जगह प्रयागराज वाला स्वाद और साइज नहीं पाता। देश मे GI टैग व्यवस्था काफी हद तक इसी वजह से करी गई है ताकि लोग अपने यहाँ की वास्तविक फसलों को जोड़े रखें।
 
केवल उत्पादन नहीं, बाजार भी समझें-
  • कृषि में केवल फसल उगा लेना सफलता नहीं है।
  • यदि आपने साँवा, कोदो, कुटकी या अन्य मिलेट की खेती की है, तो यह भी समझना होगा कि उसके प्रसंस्करण, पैकेजिंग और विपणन की व्यवस्था कहां है।
  • यदि क्षेत्र में प्रोसेसिंग यूनिट ही उपलब्ध नहीं है, तो केवल उत्पादन आपको अपेक्षित लाभ नहीं देगा।
  • धान, गेहूं, फल, सब्जियां या मसाले, सभी के लिए यह समझना जरूरी है कि अंतिम उपभोक्ता क्या चाहता है और आपका उत्पाद उस आवश्यकता को किस प्रकार पूरा करेगा।
  • सूरजमुखी उगा के तेल बनाने पर पता चले कि बीज छिलने वाली मशीन न होने से निकला तेल वो सुनहरा रंग नहीं पा रहा जो उपभोक्ता को चाहिये तो आपकी खेती और उसका बाजार प्रबंधन सभी कुछ नाकाफी हो गया।
 
श्रम और मानव संसाधन की वास्तविकता समझें-
आज खेती और डेयरी की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है प्रशिक्षित और जिम्मेदार श्रमिकों की उपलब्धता। देशभर के अनेक सफल फार्म भी इसी समस्या से जूझ रहे हैं। अच्छी मजदूरी और सुविधाएं देने के बाद भी उपयुक्त व्यक्ति मिलना आसान नहीं है।
 
इसलिए खेती या डेयरी में आने से पहले यह मानकर चलें कि शुरुआती वर्षों में आपको स्वयं काफी काम संभालना पड़ सकता है। रात 2 बजे अगर पशु को डिलवरी हो रही या साँप काट लिया है तो आपको भी जगना है, अन्य अगली सुबह बेहद काली होगी। खेती आलस्य का त्याग करने पर ही सफल है।
 
डेयरी और पशुपालन को गंभीरता से समझें-
  • गौशाला या डेयरी केवल पशु खरीद लेने से नहीं चलती।
  • चारा उत्पादन, पोषण, स्वास्थ्य प्रबंधन, सफाई, प्रजनन, श्रमिक प्रबंधन और विपणन सभी समान रूप से महत्वपूर्ण हैं।
  • एक पशु का बीमार पड़ना, दुर्घटना होना या दूध उत्पादन घटना भी पूरे आर्थिक संतुलन को प्रभावित कर सकता है।
 
खेती में जोखिम हमेशा मौजूद रहेंगे-
  • कभी अधिक वर्षा हो सकती है।
  • कभी वर्षा नहीं होगी।
  • कभी रोग बढ़ जाएंगे।
  • कभी बाजार भाव गिर जाएगा।
  • कभी श्रमिक नहीं मिलेंगे।
 
इन परिस्थितियों को समाप्त नहीं किया जा सकता। लेकिन ज्ञान, योजना और अनुभव के माध्यम से इनके प्रभाव को कम अवश्य किया जा सकता है। हरेक मौसम आधारित फार्म मैंनेजमेंट, किस्मो का चयन, ग्रीनहॉउस जैसे मौसम प्रतिरोधी कारक बढ़ना, सोलर सिस्टम हो या पाउडर /अचार, मुरब्बे लड्डू जैसे प्रसंस्कृत उत्पाद खोजना और बढ़ाना ये आपकी उपज का लाभ बढ़ाने मे मदद कर सकते हैँ। अपनी फार्मिंग दिखाना सोशल मीडिया उपयोग बढ़ा के नये बाजार और ग्राहक खोजना और उनसे जुड़ना एक नया आयाम स्थापित करेगा।
 
खेती वास्तव में अनेक विज्ञानों का संगम है-
  • खेती केवल बीज बोने और फसल काटने तक सीमित नहीं है।
  • इसमें मृदा विज्ञान, पौध विज्ञान, कीट विज्ञान, रोग विज्ञान, मौसम विज्ञान, आनुवंशिकी, जैव रसायन, कृषि अभियांत्रिकी, अर्थशास्त्र, प्रबंधन और विपणन सभी की भूमिका होती है।
  • एक सफल फार्म मालिक वही है जो लगातार सीखता रहता है।
 
 धैर्य खेती की सबसे बड़ी पूंजी है-
  • फलोद्यान हो, प्राकृतिक खेती हो, डेयरी हो या कृषि प्रसंस्करण, अधिकांश सफल मॉडल समय मांगते हैं।
  • आज लगाया गया पौधा कल लाभ नहीं देगा। आज विकसित किया गया फार्म अगले महीने आत्मनिर्भर नहीं हो जाएगा।
  • खेती में परिणाम मिलते हैं, लेकिन प्रकृति की गति से मिलते हैं, हमारी इच्छाओं की गति से नहीं, हाँ आपको खर्च आज करने हैँ और फल जीवन भर खाने हैँ।
 
 
खेती में पैसा है, अवसर हैं, सम्मान है, स्वतंत्रता है और प्रकृति के साथ जीवन जीने का अद्भुत आनंद भी है, लेकिन खेती उन लोगों के लिए नहीं है जो केवल जल्दी पैसा कमाने का सपना लेकर आते हैं।खेती उन लोगों के लिए है जो सीखने को तैयार हैं, मेहनत करने को तैयार हैं, जोखिम समझते हैं, धैर्य रखते हैं और अपनी परिस्थितियों के अनुसार सही निर्णय लेते हैं।
 
यदि आप कृषि, बागवानी, प्राकृतिक खेती, डेयरी, फार्म स्टे, एग्री-टूरिज्म या किसी भी कृषि आधारित उद्यम में प्रवेश करना चाहते हैं, तो पहले जानकारी जुटाइए, विशेषज्ञों से चर्चा कीजिए, सफल और असफल दोनों उदाहरणों को समझिए और फिर योजनाबद्ध तरीके से आगे बढ़िए।
 
क्योंकि खेती में सफलता खेत से पहले सोच में उगती है।
 
डॉ. शुभम कुमार कुलश्रेष्ठ,विभागाध्यक्ष एवं सहायक प्राध्यापक – उद्यान विभाग
(कृषि संकाय),रविन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय, रायसेन, मध्य प्रदेश
 
 
 
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