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By : Nishpaksh Pratinidhi | Published Date : 28 Sep 2025 7:39 PM |   493 views

आधुनिक शिक्षा से मैकाले के प्रभाव को हटाता भारतीय शिक्षा बोर्ड

कानपुर-कानपुर स्थित बी.एन.एस.डी. शिक्षा निकेतन में आज एक ऐतिहासिक शैक्षिक सम्मेलन का आयोजन किया गया। यह सम्मेलन केंद्र सरकार द्वारा गठित “भारतीय शिक्षा बोर्ड” — एक राष्ट्रीय शिक्षा बोर्ड — द्वारा आयोजित किया गया| जिसमें कानपुर नगर के सैकड़ों विद्यालयों के प्रबंधक, प्रधानाचार्य एवं वरिष्ठ शिक्षाविदों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।
 
भारतीय शिक्षा बोर्ड की स्थापना केंद्र सरकार ने इस उद्देश्य से की है कि भारत की समृद्ध ज्ञान परंपरा को आधुनिक शिक्षा पद्धति के साथ समन्वित कर विद्यार्थियों को एक ऐसी समग्र शिक्षा प्रदान की जा सके, जो केवल नौकरी तक सीमित न रहे, बल्कि उनके संपूर्ण व्यक्तित्व का निर्माण करे। इस बोर्ड के पाठ्यक्रम निर्माण में देश के अग्रणी शिक्षाविदों, मनीषियों एवं नीति-निर्माताओं ने सहभागिता की है।
 
यह बोर्ड राष्ट्रीय स्तर पर नई शिक्षा नीति (NEP) के अनुरूप शिक्षा में भारतीय दर्शन, मूल्य एवं परंपराओं का समावेश कर एक वैचारिक क्रांति लाने के लिए संकल्पित है। केंद्र सरकार द्वारा इसके संचालन का दायित्व पतंजलि योगपीठ को प्रदान किया गया है।
 
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित कानपुर के जिलाधिकारी जे.पी. सिंह ने कहा—“शिक्षा के क्षेत्र में एक पुनर्जागरण की आवश्यकता को महसूस करते हुए सरकार ने भारतीय शिक्षा बोर्ड की स्थापना की है। इसका उद्देश्य आधुनिक शिक्षा को भारतीय ज्ञान परंपरा के फ्रेमवर्क में विद्यार्थियों तक पहुँचाना है। इस बोर्ड से मुझे उच्च स्तरीय शैक्षिक गुणवत्ता की अत्यंत आशाएं हैं। यह पहल भविष्य में भारत को ‘ज्ञान आधारित महाशक्ति’ के रूप में स्थापित करने में निर्णायक भूमिका निभाएगी।”
 
भारतीय शिक्षा बोर्ड के अध्यक्ष एवं मुख्य वक्ता डॉ. एन.पी. सिंह (IAS, सेवानिवृत्त) ने अपने उद्बोधन में कहा—“भारतीय शिक्षा पिछले 190 वर्षों से मैकाले द्वारा बनाए गए भारतीय शिक्षा अधिनियम के ब्लूप्रिंट पर ही आधारित है, जिसका उद्देश्य केवल नौकरी योग्य मानव संसाधन तैयार करना था। इस व्यवस्था ने विद्यार्थियों के व्यक्तित्व को केवल उनकी नौकरी तक सीमित कर दिया है। लेकिन इतिहास नौकरी नहीं, बल्कि नेतृत्व करने वाले ही बनाते हैं। भारतीय शिक्षा परंपरा व्यक्ति के चरित्र, मूल्य, ज्ञान एवं चेतना — चारों आयामों का समग्र विकास करती है। भारतीय शिक्षा बोर्ड इन दोनों दृष्टिकोणों का समन्वय करते हुए एक ऐसे नागरिक का निर्माण करना चाहता है, जो न केवल ‘ग्लोबल सिटिजन’ बल्कि ‘यूनिवर्सल सिटिजन’ बन सके।”
 
भारतीय शिक्षा अनुसंधान परिषद के महानिदेशक विंग कमांडर (से.नि.) पुष्कल विजय द्विवेदी ने कहा—“आज की शिक्षा व्यवस्था बच्चों को सफल व्यवसायी या पेशेवर तो बना रही है, परन्तु माता-पिता अपने बच्चों को खो भी रहे हैं क्योंकि वर्तमान प्रणाली केवल भौतिक जानकारी देती है, व्यक्तित्व का समग्र विकास नहीं कर पाती।  भारतीय शिक्षा बोर्ड विद्यार्थियों का बहुआयामी विकास कर उन्हें न केवल करियर में सफल बना रहा है, बल्कि उनके भीतर मानवीय गुणों का संचार कर एक सशक्त एवं संवेदनशील नागरिक का निर्माण कर रहा है। विशेष रूप से, इस बोर्ड में पहली बार ‘Self Defence Science’ (आत्मरक्षा विज्ञान) को एक विषय के रूप में शामिल किया गया है, जिससे भारतीयों की शस्त्र-शिक्षा की पारंपरिक माँग तथा अनिवार्य सैन्य प्रशिक्षण की आवश्यकता — दोनों की पूर्ति हो रही है।”
 
जिला विद्यालय निरीक्षक (DIOS) कानपुर, संतोष रॉय ने अपने संबोधन में कहा—“शिक्षा किसी भी देश का भविष्य निर्धारित करती है। केंद्र एवं प्रदेश सरकारें शिक्षा के सुधार और प्रसार के लिए अत्यंत गंभीर हैं और इसमें सभी नागरिकों को सहयोग करना चाहिए। विशेष रूप से, यहाँ उपस्थित सभी शिक्षाविदों, प्रधानाचार्यों एवं विद्यालय प्रबंधकों की यह नैतिक जिम्मेदारी है कि वे शिक्षा में सुधार के लिए सरकार द्वारा उठाए जा रहे प्रत्येक कदम का पूरे जोश और निष्ठा से समर्थन करें।”
 
सम्मेलन में बीएसएपी के पदाधिकारी गौरव पांडे, जया शुक्ला, कानपुर की समाजसेवी मीना द्विवेदी, शक्ति शुक्ला, कुसुम द्विवेदी, पिंकी साहू, पतंजलि योगपीठ के रजनीश सिन्हा, तथा नगर की पार्षद  नीलम शुक्ला ने भी अपनी उपस्थिति से कार्यक्रम की गरिमा बढ़ाई।
 
सभी शिक्षाविदों और अतिथियों ने भारतीय शिक्षा बोर्ड की इस पहल को भारतीय शिक्षा व्यवस्था में “पहले आधुनिक पुनर्जागरण की दिशा में मील का पत्थर” बताया और इसके माध्यम से नई पीढ़ी के सर्वांगीण विकास की दिशा में कार्य करने का संकल्प दोहराया।
 
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