सामाजिक उन्नयन में मातृभाषा का योगदान
मनुष्य एक यौथ जीवी है। अपने को सुरक्षित रखने के लिए तथा अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए एक दूसरे की तलाश किया। अपने साथी की खोज किया क्योंकि वह समय समूह में रहना चाहता है, एक दूसरे के साथ मिलजुल कर रहना उसका स्वभाव है, अकेला नहीं रह सकता है।मनुष्य लाखों वर्ष पहले इस धरती पर अकेले आया ।उसका कोई नहीं था। वह कितना असुरक्षित महसूस करता होगा। अपनी संवेदनाओं दुख -दर्द पीड़ा को किससे कहता। इस विषम परिस्थिति में अपने अस्तित्व की रक्षा करना कितना कठिन था, कल्पना कीजिए, अपने साथी के तलाश में इधर-उधर भटकता रहा।
कालांतर में जब वह किसी दूसरे मनुष्य से मिला होगा तो उसको कितनी प्रसन्नता हुई होगी? दोनों एक दूसरे से अपरिचित, एक दूसरे से भय, सहयोग की आशा के साथ दोनों एक दूसरे को देखते हुए नजदीक आए। संघर्षमय जीवन में तमाम चुनौतियों को झेलते हुए एक दूसरे को समझने बूझने अपने दुख- दर्द को सुनने और सुनाने का सुनहरा अवसर मिला। अनभिज्ञता मे भिज्ञता का अनुभव कितना कितना सकून दिया होगा?
सत्य तो यह है कि अपने भाव का आदान-प्रदान संकेत में किया होगा, क्योंकि दोनों एक दूसरे की भाषा से अपरिचित थे बाद में वे मुखर हुए और समय ने भाषा के माध्यम से उनको निकटता के सूत्र में बांध दिया | आपस में मिलजुल कर रहने लगे कितना अच्छा लगता होगा ? जरा कल्पना कीजिए। इस निकटता का सूत्र तो उसकी भाषा ही है चाहे बोली के रूप में या संकेतों के रूप में। यही उसकी मातृभाषा होगी। मातृभाषा केवल आपसी संवाद का माध्यम नहीं है बल्कि सामाजिक संरचना का आधार भूत तत्व है। भाषा एक दूसरे के सुख-दुख को समझने, भौतिक मानसिक और आत्मिक विकास के अवसर को तलाशने के लिए अवदान के रूप मे परमात्मा ने मनुष्य को दिया है।
भाषा समाज की संस्कृतिक, बौद्धिक और भावात्मक पहचान का आधार है। भाषा वह तत्व है जो मनुष्य को मनुष्य से जोड़कर सभ्यता के उषाकाल से ही रखा है और आज भी इस प्रकार मातृभाषा सामाजिक एकता और साँस्कृतिक धरोहर का प्रतीक है। भाषा व्यक्ति को अपनी जड़ों से जोड़ती है और सामाजिक एकता को बढ़ावा देती है, मातृभाषा मानव संस्कृति का एक अनमोल रत्न है।शिक्षा और संस्कृति के संरक्षण का आधार है। मातृभाषा की अपेक्षा मनुष्य के सर्वांगीण विकास को अवरोध कर देगी सामाजिक संरचना चूर्ण विचूर्ण हो जायगी।
मातृभाषा मानव के भीतर से ही अभीव्यक्ति प्रकाशित हुई है, यह सहज और स्वाभाविक होती है, आपसी संबंधों को बनाए रखने का महत्वपूर्ण तत्व भाषा ही है। मानव विकास का इतिहास गढ़ने का सशक्त माध्यम और तत्व भाषा ही है।
मनुष्य ने अपने समक्ष मिलने वाली वस्तुओ के स्वभाव और गुण के अनुसार अपनी भाषा में ही नामकरण किया है। मनुष्य नहीं होता तो विश्व की सृष्टि जन्य वस्तुओं का नामकरण कौन करता।
भाषा के माध्यम से सभी विषय अभि प्रकाशित होते हैं। ज्ञान जिस भाषा में प्रकाशित है उस भाषा का ज्ञान नहीं रहने से मनुष्य उस ज्ञान से वंचित रह जाता है। सामाजिक संबंधों को बनाने में मातृभाषा का महत्वपूर्ण योगदान है। मातृभाषा लोगों के आपसी संबंधों में प्रगाढता लाती है साथ ही साथ आनंदमय महौल बनाने में मुख्य भूमिका निभाती है।
सभी विषयों को सभी मातृभाषा राष्ट्रभाषा और वैश्विक जन संपर्क की भाषा में प्रकाशित रहने के फलस्वरूप सभी मनुष्य ज्ञानवान होंगे। सभी भाषा को सरकारी स्तर पर स्वीकृति मिलनी चाहिए।
ऐसा नहीं होने पर सबका विकास संभव नहीं है भाषा वह तत्व है जिसके द्वारा मनुष्य का विवेक विकसित होता है, विशालशीलता की शक्ति बढ़ती है,युक्ति के सामर्थ्य का विकास होता है और मनुष्य बौद्धिकता का अधिकारी होता है। किसी भी समाज के सर्वांगीण विकास के लिए यह आवश्यक है कि उस समाज के लोगों में सामाजिक आर्थिक सांस्कृतिक जागरूकता हो। इसके लिए मातृभाषा ही एक व्यवहारिक तत्व है।
भाषा के साथ सामाजिक आर्थिक एवं सांस्कृतिक विकास का घनिष्ठ संबंध है। भाषा जिस तरह से मनुष्य के अपने अंतर निहित भाव एवं विचारों को व्यक्त करने का माध्यम है उसी प्रकार वह मनुष्य के प्राण धर्म के साथ-साथ और अपृथक रूप से जुड़ी हुई है। कोई भी व्यक्ति अपनी मातृभाषा में जिस तरह से स्वतंत्र और सहज रूप से अपने भावों को व्यक्त कर सकता है दूसरी किसी भी भाषा में अपने भावों को उस रूप में व्यक्त नहीं कर सकता है।
आपसे उसे बातचीत करने में कठिनाई होती है वह और असहज होने लगता है उसकी प्राण शक्ति धीरे-धीरे कमजोर होती जाती है। इस परिस्थिति में उस व्यक्ति और समाज के अंदर एक प्रकार का मनोवैज्ञानिक संकट उत्पन्न हो जाएगा।उसके अंदर हीन भाव पैदा होगा जो लोगों के मानसिक दुर्लभता दुर्बलता का अन्यतम कारण है। नैतिक साहस कम उत्साह संघर्ष करने की क्षमता नष्ट हो जाएगी पराजित मानसिकता उत्पन्न हो जाएगी लोग सर उठकर खड़े नहीं हो पाएंगे और दूसरे के लिए शोषण का मार्ग खुल जाएगा।
सभी भाषाओं को विकसित होने का समान अवसर प्रदान करना होगा। भाषाओं के प्रति देसी विदेशी राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय किसी प्रकार का विभेद नहीं होना चाहिए ।यह लोगों के शुभ बुद्धि और शुभेच्छा पर निर्भर करता है। समाज का अर्थ ही है सभी लोगों का मिलितभाव से एक साथ चलना और उसमें मातृभाषा का अहम भूमिका है। समाज में भाईचारा आपसी सहयोग त्याग सेवा जैसे सामाजिक मूल्यों की स्थापना का एकमात्र सूत्र मातृभाषा ही है।
इसलिए सभी भाषाओं को संवैधानिक मान्यता निश्चित रूप से देना होगा। साथ ही साथ यह देखना होगा कि कोई भी भाषा किसी अन्य भाषा को नुकसान न कर सके भारत जैसे बहुभाषी देश में एक ऐसी सर्वजन स्वीकृत भाषा को जनसंपर्क की भाषा के रूप में व्यवहार करना उचित है,जिस पर देश कि सभी भाषाएं आधारित हो समय के प्रवाह में विभिन्न भाषाओं के विकास के क्रम में एक राष्ट्रीय भाषा विकसित हो जाएगी जिसको लोग सफलतापूर्वक स्वीकार करेंगे।
मानव समाज के निर्माण और उसके सर्वांगीण विकास के साथ-साथ मनुष्य में भौतिक मानसिक आत्मिक प्रगति का आधार भाषा ही है। अतः मातृभाषा मानव विकास का आधारशिला है।
सामाजिक उन्नयन का एक महत्वपूर्ण घटक है शिक्षा। जिसके संबंध में विश्व के सभी शिक्षाविदों ने एक स्वर से स्वीकार किया है कि मातृभाषा में शिक्षा से बच्चों में अधिगम क्षमता अधिक होती है शिक्षा और भौतिक विकास में मातृभाषा में शिक्षा एक प्रभावकारी माध्यम है।
यूनेस्को ने कहा है कि शिक्षार्थियों को उनकी मातृभाषा में शिक्षा दिया जाना चाहिए। शिक्षा में मातृभाषा की प्राथमिकता दिया जाए जिससे बच्चे अपनी संस्कृति और पर्यावरण के प्रति संवेदनशील बने। भाषा विभाजन का साधन नहीं बल्कि एकता का सेतु है। मातृभाषा का सम्मान और दूसरी भाषाओं का भी आधार होना चाहिए।
धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि मातृभाषा ज्ञान प्राप्ति अभिव्यक्ति और विचारों के विनिमय का सबसे उचित माध्यम है। इस प्रकार स्पष्ट है कि सामाजिक उन्नयन में सबसे अधिक योगदान मातृभाषा का ही है मातृभाषा मानव समाज के विकास की आधारशिला है।
मातृभाषा मानवता के धरोहर है। इसका दमन आत्म सम्मान, स्वाभाविक प्रगति और आर्थिक विकास को नष्ट कर देता है। इतिहास में चेतावनी देता है कि मातृभाषा की संकीर्ण व्याख्या या दूसरी भाषा को थोपना सामाजिक विघटन का कारण बन सकता है।
अतः मातृभाषा का सम्मान करें इसे सामाजिक उन्नयन का सेतु बनाए।
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