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By : Nishpaksh Pratinidhi | Published Date : 10 Mar 2023 6:27 PM |   362 views

बख्तियार खिलजी  ने महाविहार को नष्ट कर ,पुस्तकालय रत्नोदधि,  रत्नसागर  व रत्नरंजक में आग लगा दी- प्रो वैद्यनाथ

नालंदा -नव नालन्दा महाविहार , नालन्दा में दीक्षान्त समारोह आज आयोजित किया गया।
नव नालन्दा महाविहार के कुलाधिपति तथा भारत के  संस्कृति, पर्यटन एवं उत्तर पूर्व मामलों के मंत्री जी. किशन रेड्डी ने इस अवसर पर दीक्षान्त भाषण देते हुए कहा कि नालंदा विश्व का प्रथम ऐसा विश्वविद्यालय है जो सामान्य जन के लिए उपलब्ध था। यहाँ ज्ञान- विज्ञान की गहन परम्परा रही है।  तिब्बती  विद्वान धर्मस्वामी के विवरणों से  पता चलता है कि यह संस्था चलती रही थी जो बाद में राजाश्रय  के अभाव तथा तुर्क- अफगान काल  तक आते-आते नष्ट कर दी गई।
 

प्राचीन  नालंदा महाविहार  के निकटवर्ती ओदंतपुरी, तिलाढक ( वर्तमान में तिलहाड़ा) तथा एकंगर सराय के निकट यशोवर्मनपुर , वर्तमान में घोसरामा  आदि का भी यही हाल हुआ। बिहार की ज्ञान भूमि धीरे-धीरे नष्ट हो गई।  750 वर्षों के पश्चात स्वतंत्र भारत में महामनीषी एवं भारत के प्रथम  राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने प्राचीन नालंदा महाविहार की गौरवशाली परंपरा को पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से 20 नवंबर , 1951 को नव नालंदा महाविहार की स्थापना की।

 
इस स्थापना में उनके साथ थे,  प्रख्यात विद्वान भिक्षु जगदीश कश्यप । आज इस डीम्ड  यूनिवर्सिटी ने इतने वर्षों की यात्रा करते हुए अपनी प्रगति को व्याख्यायित किया। परम्परा से लेकर आधुनिकता तक  इस संस्था ने ग्रहण किया है। आज यहां कई नये विषयों के विभाग भी हैं, जहाँ नई दृष्टि के साथ अध्ययन- अध्यापन होता है।
 
नालन्दा बौद्ध , जैन व सनातन : तीनों परंपराओं को मूर्त करने वाला स्थल है। आज नव नालन्दा महाविहार प्राचीन ज्ञान परम्परा को सँजोते हुए समकालीन ज्ञान- क्षेत्रों की विविधता की ओर बढ़ चुका है। यहाँ  पढ़ाये जाने वाले विषयों में मानविकी व भाषा के नए बिन्दुओं ने अपनी विशेष भारतीय  उपस्थिति दर्ज़ की है। एक ओर हिन्दी , अंग्रेज़ी जैसी भाषाओं की साहित्यिकता , आधुनिकता , सर्जनात्मकता व नई दृष्टि  का  सम्प्रसार हो रहा है तो दूसरी ओर पालि, संस्कृत, तिब्बती अध्ययन, बौद्ध अध्ययन , दर्शनशास्त्र, प्राचीन इतिहास एवं पुरातत्त्व, चीनी , जापानी का भी अध्ययन- अध्यापन हो रहा है।
 
‘विपस्सना व योग’ तथा ‘बौद्ध पर्यटन प्रबंधन’ नए जैसे विषय भी शामिल किए गए हैं। नव नालन्दा महाविहार के कई परिसर हैं जिनमें से एक परिसर में ह्वेनसांग की मूर्ति लगी है जो वैश्विक आकर्षण का केंद्र है। वहीं एक नया संग्रहालय भी बन रहा है जिसमें ह्वेनसांग का अस्थि- कलश रखा जाएगा । यहाँ प्राचीन दुर्लभ पाण्डुलिपियाँ हैं जिनमें प्राचीन ज्ञान छुपा है। यहाँ विविध कलाओं का स्पेस बढ़ा है।
 
नए-नए साहित्यिक विषयों पर चर्चा , आयोजन , कविता- पाठ  आदि के साथ विविध सामयिक संदर्भों  पर भी लगातार राष्ट्रीय चर्चाएं होती रहती हैं। यहाँ शोध-प्रविधि तथा अपने विज़न के कारण पी-एच. डी. रिसर्च का स्तर अन्तरराष्ट्रीय हो चुका है।
 
 ‘ऐक्ट ईस्ट ‘ नीति के परिपालन हेतु भारतीय दृष्टि के महत्त्व को स्थापित करने में नव नालन्दा महाविहार का बड़ा अवदान रहा है। इस नीति के निष्पादन हेतु तकरीबन 20 देशों में प्रदर्शनियाँ लगाई गईं। इससे भारतीयता का  समुचित विचार व दृष्टिबोध उन देशों में पहुँचा। इस संस्थान के विद्यार्थी पूरे विश्व , विशेष रूप से दक्षिण-पूर्व एशिया के सांस्कृतिक दूत हैं। आज भी दुनिया के बड़े बड़े बौद्ध संस्थाओं के  पदाधिकारी नव नालन्दा महाविहार के विद्यार्थी रहे हैं। वास्तव में ये भारत व दक्षिण पूर्व एशियायी देशों में बुद्ध दृष्टि व  भारतीयता के प्रतीक हैं।
 
कार्यक्रम की अध्यक्षता कुलपति प्रो.  वैद्यनाथ लाभ ने कहा कि आज नव नालन्दा महाविहार अपने कार्यों से पूरे देश व दुनिया में जाना जा रहा है। शोध से लेकर कक्षाओं की पढ़ाई तक में गुणवत्ता लाने की कोशिश है। आज उपाधि पाए विद्यार्थियों को  अपने जीवन के नए पाथेय चुनना चाहिए। उन्हें अपने जीवन में संतुलन साधते हुए जन- कल्याण में सन्नद्ध होना चाहिए।
 
जैसा कि  आप जानते ही हैं कि नव नालंदा महाविहार प्राचीन नालन्दा महाविहार का उत्तराधिकारी है। यह विश्व के उस विश्वविद्यालय का उत्तराधिकारी है जहाँ  संस्कृत, पालि, अपभ्रंश ,  ज्योतिष, तंत्र, गणित , व्याकरण , न्याय , भाषा विज्ञान ,धातु विज्ञान , आयुर्वेद, खगोल शास्त्र आदि विषय पढ़ाये जाते थे। यहीं हिन्दी के पहले कवि सरहपा ने अपना कर्मक्षेत्र बनाया तथा सहज यान  व  काव्यशिल्प  के माध्यम से हिन्दी कविता  अर्थात अपभ्रंश कविता का नया पथ रचा। प्राचीन काल से ही यहाँ तिब्बत,चीन, मंगोलिया, श्री लंका, स्वर्ण भूमि, अर्थात म्यांमार, थाईलैंड, कम्बोडिया आदि से छात्र पढ़ने आते थे।
 
1193 से 1197 के बीच  आक्रान्ता  बख्तियार खिलजी  ने महाविहार को नष्ट कर दिया। उसने पुस्तकालय के तीन  मुख्य भवन  – रत्नोदधि,  रत्नसागर  व रत्नरंजक में आग लगा दी जिससे भारत का ज्ञान- भंडार नष्ट हो गया। उसने भिक्षुओं का कत्लेआम  किया। कुछ भिक्षुगण  सूचना पाकर पहले ही उत्तर की तरफ गंगा पार करके उत्तरी बिहार , नेपाल और हिमालय क्षेत्र यानी तिब्बत और चीन आदि  चले गए जिसके कारण ढेर सारी  पुस्तकें एवं पांडुलिपियाँ  बच गईं।  बाद के विवरणों  से पता चलता है कि नालंदा पूरी तरह नष्ट नहीं हुआ। यहाँ  ज्ञान की ज्योति धीरे-धीरे ही सही,  जलती रही। वही ज्योति आज नव नालंदा महाविहार सम विश्वविद्यालय के रूप में पूरे विश्व में नई आभा के साथ विख्यात है।
 
मुख्य अतिथि  – राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान ,  पटना के मान्य निदेशक प्रो. पी. के. जैन  ने इस अवसर पर कहा कि इस संस्थान के विद्यार्थी पूरे विश्व , विशेष रूप से दक्षिण-पूर्व एशिया के सांस्कृतिक दूत हैं। आज भी दुनिया के बड़े बड़े बौद्ध संस्थाओं के  पदाधिकारी नव नालन्दा महाविहार के विद्यार्थी रहे हैं। वास्तव में ये भारत व दक्षिण पूर्व एशियायी देशों के बीच सेतु हैं। नव नालन्दा महाविहार में सैकड़ों विदेशी विद्यार्थी अध्ययन करते हैं।
 
नव नालन्दा महाविहार के मीडिया प्रभारी व हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो. रवींद्र नाथ श्रीवास्तव ‘परिचय दास’  ने बताया कि तीन विद्वानों / विशिष्ट व्यक्तियों को मानद विद्यावारिधि की उपाधि दी गई- श्री थिक न्हात तू,  प्रो. संघसेन सिंह, प्रो. अंगराज चौधरी। पीएच.डी. उपाधिधारी एवं एम.ए., बी.ए. उत्तीर्ण विद्यार्थियों को डिग्री प्रदान  की गयी ।
 
जो विशिष्ट व्यक्ति पधारे , उनमें प्रमुख हैं – प्रो. अशोक कुमार, प्रो. आर. के. राणा, प्रो. जयश्री मिश्र , प्रो. पी. के. जैन , प्रो. संघसेन सिंह, प्रो. अंगराज चौधरी , भिक्षु धम्मपिय, प्रो. आनंद शंकर सिंह, प्रो. वी कृष्ण राव, स्थानीय सांसद कौशलेंद्र कुमार व संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार की संयुक्त सचिव श्रीमती अमिता सरभाई आदि। धन्यवाद-ज्ञापन रजिस्ट्रार डॉ. एस. पी. सिन्हा ने किया।
 
कार्यक्रम के आरम्भ में शोभा-यात्रा निकाली गई, जिसमें कुलाधिपति महोदय, कुलपति महोदय , रजिस्ट्रार , नव नालन्दा महाविहार के आचार्य ,  सोसायटी , अकादमिक कौंसिल , बोर्ड ऑव मैंनेजमेंट के  मान्य सदस्य आदि शामिल हुए।
 
इस अवसर पर पालि- हिन्दी शब्द कोश ( भाग-7), पालिसद्दबोधो , नागसेन चरितं  , नालंदा डॉयलॉग का लोकार्पण हुआ।  प्रो. संघसेन सिंह, प्रो. अंगराज चौधरी , भिक्षु थिक न्हात तू ने  विद्यावारिधि सम्मान प्राप्त करते हुए अपने विचार प्रकट किए। संघ सेन ने कहा कि उन्होंने अध्यापन करके अपने दायित्व का निर्वहन किया। अंगराज चौधरी ने कहा कि नव नालन्दा महाविहार में पालि सीख कर वे उसी के हो गए , यद्यपि वे अंग्रेजी साहित्य के विद्यार्थी थे।
 
वियतनाम के एक विवि के प्रति कुलपति भिक्षु थिक न्हात तू ने कहा कि नालंदा का बुद्ध दर्शन को विकसित करने में बड़ा अवदान रहा है।
 
कार्यक्रम का संचालन प्रो. राणा पुरुषोत्तम कुमार ने किया। मंगल-पाठ डॉ.धम्म ज्योति एवं डॉ. नरेंद्र दत्त तिवारी ने क्रमशः पालि एवं संस्कृत में सामूहिक रूप से किया।
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