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By : Nishpaksh Pratinidhi | Published Date : 18 Mar 1:02 PM |   161 views

गुलाल की गंध

होली हमारे समय को आल्हाद से भर देती है। यह पर्व नए तरह के वातावरण का सृजन करता है- स्नेहिल, गंधभरा, पुनर्नवा सा। होली कहती है कि अभी और पुनर्नवीकरण होना चाहिए हमारे संबधों में, मुरझाते फूलों में, प्रेम के लड़खड़ाते प्रसंगों में, सामाजिकता में, सामूहिकता में-सबमें गति आनी चाहिए। सबका गतिशास्त्र बदलना चाहिए। सभी फूलें, फलें। सबका विकास हो। किसी एक का दूसरे पर आधिपत्य न हो। होली यही कहती है। वह सबसे निचले आदमी को भी वाणी देती है। यही उसकी उत्सवधर्मिता है। वह भविष्य के रंगों का नया सौंदर्यशास्त्र गढ़ती है। यह सृजनशील मन के संवेदन को झकझोरने की कला है। विचारधाराएं कई बार रूढ़ हो जाती हैं। तर्क कई बार शुष्क हो जाते हैं।

बौद्धिकताएं अनेक बार दूसरों से अलगीकृत हो जाती हैं, परंतु हमारा मन दूसरों के लिए उत्सुक, खुला और जुड़े रहने के लिए अभीप्सित रहता है, उसमें राग और रंग होता है, उसमें संगीत होता है। यही संगीत होली में मादकता लाता है। यही नृत्य होली को लयबद्ध और रसमय बनाता है। साल भर की थकान जोगीरा गाते उतरती है। होली अपना मुहावरा स्वयं बनाती है। इसीलिए होली सामंजस्य का हेतु है।

मनुष्य से मनुष्य की निकटता बढ़ाती है होली-

जब तक संसार में सामंजस्य और लोकतांत्रिक संवाद है, होली हमें रंगों की आभा से दीप्त करती रहेगी। होली का अर्थ खास आदमी और आम आदमी, बड़े और छोटे, गर्मी और सर्दी, गाढ़े और तरल रंग का भेद मिटाना है। वर्ण, जाति, संप्रदाय, क्षेत्र, भाषा, कुल, पद आदि के अंतर को यह या तो समाप्त करती है या न्यूनीकृत अंतर पर ला देती है। जिस उपक्रम से मनुष्य से मनुष्य की निकटता बढ़े और उसके अंतर कम होते जाएं वही वास्तविक उत्सव है। होली का उत्सव यह काम बड़ी ही खूबसूरती से करता है।

होली आती है बिगड़े संबंध सुधारने के लिए-

भावात्मकता और सकारात्मकता ही दुनिया को उत्सवधर्मी बना सकती है। हमारे बीच पारदर्शी संवाद बने रहना रंगों की झिलमिल आत्मा है। शायद इसीलिए लोग कहते हैं कि वर्ष भर में यह पर्व आया है।  आओ,  इस अवसर पर बिगड़े संबंध भी सुधार लें। आज की दुनिया इतनी जटिल हो गई है कि मानव मन की अंतरंगता को समझ पाना दुर्लभ हो गया है। फिर भी ध्यान दें तो तमाम जटिलता के बावजूद कोई कोना ऐसा जरूर होता है जहां आपके लिए कोमल जगह मिल ही जाती है। यह बुद्धि के यथार्थ में भावना का मिश्रण है। जैसे कोई आधुनिकता परंपरा के प्रवाह से आती है, जैसे हमारा समकाल पूर्व के क्षणों का अगला चरण है, वैसे ही हमारे भीतर-बाहर के रंगों का उत्साह उत्सव रूप में होली है। रंगों का अर्थ केवल दिखने वाले विविध रंगों से ही नहीं है। वे हमारे चित्त और मन के आयाम हैं, बहुविध दिशाओं में पतंग की तरह उड़ने वाले। आकाश असीम है तो मन की पतंग भी उसी असीम का हिस्सा है। होली उसी असीमता के अछोर संसार को दर्शाती है। रंगों का सत्य अनंत है। वास्तव में सत्य अनंत है। उसकी अनंत छटाएं हैं। रंग आप पर चढ़ता ही इसलिए है, क्योंकि आपमें यथार्थ की सृजनात्मक अनुभूति की गहन क्षमता है।
 
साधारण-सा दिखने वाला रंग प्रेम-प्रीति की कितनी गहरी छाप छोड़ जाता है, कहा नहीं जा सकता। उसे चाहने वाले न पाने पर कितनी टीस का अनुभव करते हैं, यह भी वर्णनीय नहीं।
 
महात्मा गांधी ने प्रह्लाद के सत्याग्रह से प्रेरणा ली थी-
 
होली का मूलाधार सत्य की संस्थापना रही है। असत्य पर आधारित हिरण्यकश्यप को सही मार्ग दिखाने का पर्व। होली ही जल गई। प्रहलाद निखरकर सामने आ गए। प्रहलाद का सत्याग्रह पूरे विश्व में सत्य के संकल्प का सौंदर्यमय आधार है। महात्मा गांधी ने भी इसी से प्रेरणा ली थी। सत्य का कोई एक रूप नहीं। सत्य की कोई एक दिशा भी नहीं। एक समय में आवश्यक नहीं कि एक ही सत्य हो। यह अच्छी बात भी है कि सत्य के अनेक आयाम हों, अनेक कोण हों, अनेक आधार हों। बहुवचनात्मकता पल्लवित ही होनी चाहिए। लोकतांत्रिक समाजों में उन्हें चिह्नित कर लिया जाना चाहिए जो अपने मन की चाहती हैैं।
 
भाषा, भूषा, विचार, खानपान, स्वाधीनता, सबमें बहुआयामिता होनी चाहिए। होली के विविध रंग इसी ओर इशारा करते हैं। कई बार हमारा समकाल हमारे ऊपर बहुत प्रभावी हो जाता है और हम अपनी परंपरा के रस से सूखने लगते हैं। परंपरागत और पुनर्जागरण के विचारों और जीवन-दृष्टिकोणों की अस्वीकृति के कारण विश्वास का संकट उपस्थित हुआ है। हमें अपने और अपने समाजों में अटूट विश्वास पैदा करना है। पर्वों का एक लक्ष्य यह भी है। होली हममें विश्वास पैदा करती है कि हम एक-दूसरे से जुड़े हैं, चाहे जितना अलग या पृथक दिखते हों। हमें यह समझना होगा कि तकनीक ने मनुष्य का जीवन बेहतर बनाया है। मशीन को कोसने से काम नहीं चलेगा। सोचिए यदि आज की तकनीक नहीं होती तो हम कितने पीछे और पिछड़े होते। विज्ञान ने हमारा स्पेस और बढ़ाया है। विज्ञान ने संस्कृति, कला, साहित्य सबके बारे में हमारी तार्किकता और भावनात्मकता को मिश्रित किया है। हमको वस्तुनिष्ठ दृष्टि दी है। महत्वपूर्ण यह है कि मशीन या तकनीक हमारे रंगों, उत्सवों को नियंत्रित न करने लगे। इसे हावी नहीं होने देना है। अन्यथा मनुष्य यंत्रीकृत होता चला जाएगा।
 
मन मधुर करने की रंगमय कला है होली- 
होली में देवर-भाभी, सास-ससुर-बहू, पिता-पुत्र, मां-बेटी, पति-पत्नी सारे संबंधों में विस्तार होता है। इसमें अनपेक्षित छूट भी मिलती है। समाज के व्यवस्थाकारों ने शिथिलता का प्रावधान इसीलिए किया कि हम जीवन को एकरस न रहने दें, उसे पूर्ण रसमय बनाएं। ऐसी शिथिलता व्यवस्थाकारों ने किसी दूसरे उत्सव को नहीं दी। होली के अवसर पर खाने-पकाने और खिलाने का ऐसा स्वरूप बनता है जो वर्षभर स्मृति में रहता है। भूलता नहीं। वह केवल खाने-पीने का निमित्त नहीं। वह सहभाव है इसीलिए विस्मृत नहीं होता। भारतीय समाज ने अनेक पर्व रखे, जिससे उसके जीवन की गतिशीलता और रंग बना रहे। होली प्रकारांतर से समूचे भारत में सर्वाधिक लोकप्रिय और सबका पर्व है। गुलाल मलते हुए अपने हृदय और मन को लोग दूसरों से जोड़ देते हैं। रंग डालते हुए सामने वाले का मुंह और मन मीठा कर देते हैैं। मन मधुर करने की रंगमय कला होली है। होली सृजनात्मकता का ऐसा कक्ष है, जिससे संबंधों का मुक्त संसार और संयुक्त संसार एक साथ दिखाई देता है। सामाजिक प्रक्रिया में जुड़ाव और रंगमय क्रियाकलाप में हमारी निमग्नता ही होली को मीठा बना देती है।
 
परिचय दास 
प्रोफ़ेसर एवं अध्यक्ष, हिन्दी विभाग , नव नालन्दा महाविहार सम विश्वविद्यालय ( संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार)
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