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By : Nishpaksh Pratinidhi | Published Date : 24 Jan 2022 5:28 PM |   1213 views

सुभाष चंद्र बोस की जयंती का आयोजन किया गया

नव नालंदा महाविहार में सुभाष चंद्र बोस की 125 वीं जयंती मनाई गई। हिंदी विभाग द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में मुख्य वक्ता थे- प्रसिद्ध पत्रकार एवं  टाइम्स ऑफ इंडिया ( अहमदाबाद एवं हैदराबाद )   के पूर्व स्थानीय संपादक तथा ‘ नेता जी: लिविंग डेंजरेसली’  पुस्तक के लेखक  किंशुक नाग। कार्यक्रम की अध्यक्षता  कुलपति प्रोफेसर वैद्यनाथ लाभ ने की ।
 
अपने स्वागत वक्तव्य में हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रोफ़ेसर रवींद्र नाथ श्रीवास्तव ‘परिचय दास’ ने कहा कि सुभाष चंद्र बोस का व्यक्तित्व युवाओं के लिए  सदा प्रेरणाकारी तथा देश को नई ऊर्जा देने वाला रहा है। सुभाष चंद्र बोस द्वारा आई.सी.एस. उत्तीर्ण करने के बावजूद नौकरी को ज्वाइन न करके देश की गुलामी से संघर्ष करने का निश्चय किया गया । वे गहरे चिंतक थे तथा सामाजिक परिवर्तनकारी भी। उन्होंने हिंदी भाषा की गरिमा को बढ़ाने का कार्य किया । उन्होंने ‘जय हिंद’ तथा ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुझे आज़ादी दूँगा’ का नारा दिया तथा हिंदी को भारतीय जनों  को एक सूत्र में बाँधने की भाषा बताया। 
 
अपने मुख्य व्याख्यान में किंशुक नाग ने कहा कि सुभाष चंद्र बोस की उपेक्षा का कारण सत्ता के मन में बैठी हुई हीन भावना थी । सुभाष चंद्र बोस ने विश्व स्तर पर भ्रमण करके भारत के लिए सैन्य शक्ति तथा कूटनीतिक समर्थन प्राप्त किया। उनकी वजह से ही भारत में स्वतंत्रता को गति मिली तथा अंग्रेजों में डर पैदा हुआ। सुभाष चंद्र बोस के नाम पर संस्थानों, सड़कों और भवनों का बेहद अभाव है। उन्हें श्रद्धांजलि देने का अर्थ है – ‘स्वतंत्रता को ठीक से समझना और प्राप्त करना’।
 
स्वतंत्रता के संघर्ष को भारत की जनता की संप्रभुता के परिप्रेक्ष्य में ही सुभाष बोस ने देखने की आवश्यकता बताई थी। सुभाष चंद्र बोस ने कांग्रेस अध्यक्ष होने के बाद सभी विचारधाराओं के बीच तालमेल का प्रयास किया किंतु जब उन्हें लगा कि उन्हें अलग रास्ता अख्तियार करना चाहिए तो अलग रास्ता चुन लिया।
 
प्रो. राणा पुरुषोत्तम कुमार के पूछे गए प्रश्न के उत्तर में नाग ने सुभाष चंद्र बोस के जीवित रहने की अनेक किंवदंतियों  पर प्रकाश डाला , जिनमें फैज़ाबाद के गुमनामी बाबा आदि शामिल थे। नाग ने कहा कि गुमनामी बाबा आदि बांग्ला नहीं जानते थे। इसलिए इसको तथ्यपूर्ण  मानने में संकोच होता है।
 
अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रोफ़ेसर वैद्यनाथ लाभ ने कहा कि सुभाष चंद्र बोस राष्ट्र को प्रथम मानते थे। भारत की परतंत्रता को दूर करने के लिए उन्होंने जीवन लगा दिया । राष्ट्र की अस्मिता उनके लिए मूल्यवान थी , इसीलिए उन्होंने अपने लिए भौतिक सुखों की कामना नहीं की। उन्होंने आज़ाद हिंद फौज का  गठन किया और अंग्रेज़ी राज से संघर्ष किया। अंग्रेजों से अधिक उनका संघर्ष अंग्रेजियत से था। आज कृतज्ञ राष्ट्र उनके किए गए संघर्षों को याद कर  रहा है।
 
संचालन करते हुए  डॉ. हरे कृष्ण तिवारी ने कहा कि  सुभाष चंद्र  बोस ने ही महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता कहा था। यह दोनों के बीच विचारों के सम्मान को दर्शाता है। 
 
इस आभासी कार्यक्रम में डॉ. निहारिका लाभ के अलावा विश्वविद्यालय के आचार्य, शोध छात्र, अन्य छात्र तथा सुभाष प्रेमी मौजूद थे।
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