Saturday 13th of June 2026 09:41:55 AM

Breaking News
  • धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे पर अल्टीमेटम, अभिजीत दिपके की चेतावनी -अब युवा पीछे नही हटेंगे |
  • दिल्ली एनसीआर सहित उत्तर भारत को आंधी और बारिश से मिली बड़ी राहत|
  • अफगानिस्तान में पाकिस्तान के हवाई हमलों में कम से कम 13 लोगो की मौत | 
Facebook Comments
By : Nishpaksh Pratinidhi | Published Date : 21 Jun 2021 11:02 AM |   1592 views

भोजपुरी चित्रकला को शासन सम्मानजनक जगह दे , इसमें रोज़गार की हैं अपार संभावनाएँ – वंदना

नई दिल्ली -जानी-मानी वरिष्ठ भोजपुरी चित्रकार वंदना श्रीवास्तव ने भोजपुरी चित्रकला एवं संस्कृति को शासन द्वारा उचित एवं सम्मानजनक महत्त्व देने की माँग की है। उन्होंने कहा है कि भोजपुरी चित्रकला की जड़ें बहुत पुरानी हैं। उन्हें पारम्परिक प्रयोग के साथ-साथ शासन द्वारा सार्वजनिक स्थलों पर प्रदर्शन की व्यवस्था भी सुनिश्चित हो, जैसे रेलवे स्टेशन, बस स्टेशन, एअरपोर्ट, प्रमुख चौराहे, प्रमुख भवन, विश्वविद्यालय, विद्यालय आदि ताकि नई पीढ़ी अपनी विरासत को समझ कर गर्व कर सके तथा उस कला का सहज विकास हो सके ।
 
भोजपुरी कला में रोज़गार की भारी सम्भावनाएँ हैं। इसे साड़ी, कुर्ता,  विभिन्न कपड़ों, बर्तनों, पेंटिंग्स, फिल्मों में प्रयोग, रंगमंच में प्रयोग , लकड़ी के कार्यों आदि के माध्यम से रोज़गार का आधार बना सकते हैं।
 
इसको विश्वविद्यालयों एवं  प्राथमिक – माध्यमिक अध्ययन  के पाठ्यक्रमों में सम्मानजनक जगह मिलनी चाहिए ताकि इसका अध्ययन एवं इस पर शोध हो सके ।
 
भोजपुरी चित्रकला में बिन्दु , रेखा, त्रिभुज आदि ज्यामितीय पक्षों पर प्रकाश डालती हुई वंदना श्रीवास्तव ने कहा कि बिन्दु सृजन का अधार है। त्रिभुज में तम, रज,सत , चतुर्भुज में चारों दिशाओं की आन्तरिक अनुभूति कर पाते हैं। इस कला की स्थानिक परंपराएँ  हैं जो अन्य कलाओं से कई मामलों में समता तो कई मामलों में विविधता रखती हैं। 
 
भोजपुरी चित्रकला की  परम्परा को अक्षुण्ण रखते हुए उन्होंने उसमें नई प्रयोगधर्मिता की बात की। नई समझ एवं समकालीन दृष्टि बोध के साथ अपनी परम्परा को देखने व रचने को आज की अवश्यकता बताई । वे भोजपुरी चित्रकला को स्थानीयता से वैश्विकता से जोड़ने के लिए यत्नशील हैं। 
 
वरिष्ठ भोजपुरी चित्रकार वंदना श्रीवास्तव का जन्म एवं अधिकतर शिक्षा- दीक्षा राजस्थान में हुई। उनकी पैतृक भूमि आज़मगढ़ है तथा ससुराल मऊ। वे भोजपुरी, राजस्थानी एवं हिन्दी  एक जैसी बोलती हैं। वे दिल्ली सरकार की साहित्य कला परिषद की सदस्य रह चुकी हैं। 
Facebook Comments