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By : Ram Naresh | Published Date : 23 Dec 12:43 PM

पेरियार के ईश्वर से सवाल

समता मूलक और शोषण मुक्त समाज बनाने, शिक्षा का अधिकार दिलाने,  और महिलाओं को  शिक्षित  करके उनमें स्वाभिमान जगाने  के लिए  जिस तरह से   दलित संत और समाज सुधारकों  में महात्मा   ज्योतिबा  फुले, सावित्री बाई फुले, बाबा साहब डॉ.भीमराव अंबेडकर,नारायण गुरु और महात्मा अय्यंकलि  का नाम है, उन्हीं में से 17 सितंबर 1879 में चरवाहा धनगर(गड़ेरिया)  परिवार में जन्मे पंद्रह वर्ष की उम्र में पिता से अन बन होने पर घर बार छोड़ने वाले  ई बी रामासामी पेरियार का नाम भी शीर्षस्थ क्रम में आता है।
 प्रश्न बड़ा है या प्रश्न कर्ता यह दोनों शब्द एक दूसरे के पूरक हैं,  अनुपूरक  या समानार्थक हैं, यह निर्णय लेना थोड़ा कठिन अवश्य है,परन्तु समीक्षात्मक व तार्किक दृष्टि से दोनों महत्व पूर्ण शब्दावली से बंधे हुए हैं,बशर्ते प्रश्न कर्ता या उत्तर दाता  में  उच्चस्थ  कौन   है। कभी – कभी तो यह भी देखने में आया है कि प्रश्न अपने आप में स्वयं  बड़ा हो जाता है।  पेरियार द्वारा ईश्वर से किया  गया प्रश्न भी एक ऐतिहासिक विंदु बनकर वैश्विक  चिंतक ,मनुवादियों, हिंदूवादी संगठनों और वैदिक कर्मकांडियों के धर्म शास्त्रों में भूचाल  ला दिया ।
गांधी जी का साथ क्यों छोड़े-
समाज को  बदलाव, संत  को सद्भाव और इंसानियत में समभाव होगा तभी आत्मीयता, विश्वसनीयता तथा मानवीयता संतुलित रहती है।  जब आपसी विचारों में मतभेद,जातिगत  विद्वेष ,शोषण  व आमजन की  उपेक्षाओं से संवेदनाएं   मरने के कगार पर आ जाती हैं  तो शोषक वर्ग ताकतवर होने लगता है।सामंती शोषकों से मुक्ति,मनुवादी और ब्राह्मण वादी व्यस्थाओं से दलित वर्गों के  असंतोष  और जातीय अपमान को कम करने के लिए दक्षिण के तमिलनाडु से निकला दहकता हुआ सूरज  ई बी रामासामी से बना पेरियार ,भारतीय  वर्णव्यस्था पर आधारित सामाजिक संरचना करके गरीबों व शोषितों पर पाखंड के बलबूते राज करने  वाले  पंडा  – पुजारियों  के स्वार्थ और सेवा  सिद्धांत के मूल ढोंगी परिदृश्य को वास्तविक पटल पर लाने का साहस किया।
अनुकूल परस्थिति होते हुए भी जब त्रिकोणीय विचार धारायें एक स्थान पर मिल जाती हैं तो स्वाभाविक रूप से साथ चलने से कोई परहेज नहीं होता,लेकिन जहां आस्था-अनास्था ,ईश्वर वाद,नास्तिकता ,अंध विश्वास  और मनुवाद में से कोई एक बीच  में आकर खड़ा हो जाय  तो, परस्पर दूरी स्वतः बढ़ जाती है। गांधी जी के शराब विरोधी,खादी व छूआ छूत तक तो पेरियार जी के साथ रहे ,लेकिन  उनके हे राम,राम नाम गुणगान तथा पूजा – प्रार्थना से आपसी संबंधों  खटास आ गया।

अंधविश्वास और ईश्वरवादी आस्था विमुक्त समाज की स्थापना के लिए अब पेरियार ने तमिल राष्ट्र भक्ति,कम्युनिस्ट और दलित आंदोलन की विचार धारा,तर्कवादी समूह, नारीवाद शक्ति, और वंचितों की पीड़ा सभी को साथ लेकर   सन् 1919 में गांधी जी का साथ  छोड़कर  अपनी नई पार्टी का गठन किया।

समाज को  बदलाव, संत  को सद्भाव और इंसानियत में समभाव होगा तभी आत्मीयता, विश्वसनीयता तथा मानवीयता संतुलित रहती है।  जब आपसी विचारों में मतभेद,जातिगत  विद्वेष ,शोषण  व आमजन की  उपेक्षाओं से संवेदनाएं   मरने के कगार पर आ जाती हैं  तो शोषक वर्ग ताकतवर होने लगता है।सामंती शोषकों से मुक्ति,मनुवादी और ब्राह्मण वादी व्यस्थाओं से दलित वर्गों के  असंतोष  और जातीय अपमान को कम करने के लिए दक्षिण के तमिलनाडु से निकला दहकता हुआ सूरज  ई बी रामासामी से बना पेरियार ,  भारतीय  वर्णव्यस्था पर आधारित सामाजिक संरचना करके गरीबों व शोषितों पर पाखंड के बलबूते राज करने  वाले  पंडा  – पुजारियों  के स्वार्थ और सेवा  सिद्धांत के मूल ढोंगी परिदृश्य को वास्तविक पटल पर लाने का साहस किया।
अनुकूल परस्थिति होते हुए भी जब त्रिकोणीय विचार धारायें एक स्थान पर मिल जाती हैं तो स्वाभाविक रूप से साथ चलने से कोई परहेज नहीं होता,लेकिन जहां आस्था-अनास्था ,ईश्वर वाद,नास्तिकता ,अंध विश्वास  और मनुवाद में से कोई एक बीच  में आकर खड़ा हो जाय  तो, परस्पर दूरी स्वतः बढ़ जाती है।
गांधी जी के शराब विरोधी,खादी व छूआ छूत तक तो पेरियार जी के साथ रहे ,लेकिन  उनके हे राम,राम नाम गुणगान तथा पूजा – प्रार्थना से आपसी संबंधों  खटास आ गया।

अंधविश्वास और ईश्वरवादी आस्था विमुक्त समाज की स्थापना के लिए अब पेरियार ने तमिल राष्ट्र भक्ति,कम्युनिस्ट और दलित आंदोलन की विचार धारा,तर्कवादी समूह, नारीवाद शक्ति, और वंचितों की पीड़ा सभी को साथ लेकर   सन् 1919 में गांधी जी का साथ  छोड़कर  अपनी नई पार्टी का गठन किया।

समाज को  बदलाव, संत  को सद्भाव और इंसानियत में समभाव होगा तभी आत्मीयता, विश्वसनीयता तथा मानवीयता संतुलित रहती है।  जब आपसी विचारों में मतभेद,जातिगत  विद्वेष ,शोषण  व आमजन की  उपेक्षाओं से संवेदनाएं   मरने के कगार पर आ जाती हैं  तो शोषक वर्ग ताकतवर होने लगता है।सामंती शोषकों से मुक्ति,मनुवादी और ब्राह्मण वादी व्यस्थाओं से दलित वर्गों के  असंतोष  और जातीय अपमान को कम करने के लिए दक्षिण के तमिलनाडु से निकला दहकता हुआ सूरज ई बी रामासामी से बना पेरियार ,भारतीय  वर्णव्यस्था पर आधारित सामाजिक संरचना करके गरीबों व शोषितों पर पाखंड के बलबूते राज करने  वाले  पंडा  – पुजारियों  के स्वार्थ और सेवा  सिद्धांत के मूल ढोंगी परिदृश्य को वास्तविक पटल पर लाने का साहस किया।
अनुकूल परस्थिति होते हुए भी जब त्रिकोणीय विचार धारायें एक स्थान पर मिल जाती हैं तो स्वाभाविक रूप से साथ चलने से कोई परहेज नहीं होता,लेकिन जहां आस्था-अनास्था ,ईश्वर वाद,नास्तिकता ,अंध विश्वास  और मनुवाद में से कोई एक बीच  में आकर खड़ा हो जाय  तो, परस्पर दूरी स्वतः बढ़ जाती है।
गांधी जी के शराब विरोधी,खादी व छूआ छूत तक तो पेरियार जी के साथ रहे ,लेकिन  उनके  हे राम,राम नाम गुणगान तथा पूजा – प्रार्थना से आपसी संबंधों  खटास आ गया।अंधविश्वास और ईश्वरवादी आस्था विमुक्त समाज की स्थापना के लिए अब पेरियार ने तमिल राष्ट्र भक्ति,कम्युनिस्ट और दलित आंदोलन की विचार धारा,तर्कवादी समूह, नारीवाद शक्ति, और वंचितों की पीड़ा सभी को साथ लेकर   सन् 1919 में गांधी जी का साथ  छोड़कर  अपनी नई पार्टी का गठन किया।
द्रविड़ कजगम  पार्टी का गठन-
पेरियार सामी स्वयं न तो ईश्वर को मानते थे न तो उनको मानने की प्रेरणा देते, वह तो ब्राह्मणवादी व्यवस्थाओं के घोर विरोधी थे।  शोषितों, गरीबों और वंचितों को वैदिक हिंदू धर्म के अंधविश्वास और पूजा पाठ वाले आडंबरों से दूर  रहकर केवल कर्म प्रधान को बढ़ावा के प्रति चिंतन रत रहते थे, साथ ही साथ वैदिक धर्म के आदेश और ब्राह्मण वर्चस्व को तोड़ने के लिए दृढ़ संकल्प थे। इसके बाद तो अल्प काल में ही वे कट्टर नास्तिक और भगवान के अस्तित्व की धारणा पर विरोध के लिए अपनी पहचान बना लिए। इतना ही नहीं  वे  दक्षिण भारतीय राज्यों के स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के खिलाफ  थे तथा दक्षिण भारतीय राज्यों की एक अलग द्रविड़ नाडु(द्रविड़ देश) की मांग की थी। हला की दक्षिण के अन्य राज्य  उनके विचारों से सहमत नहीं हुए ,इसलिए वे 1937 में तमिल भाषी लोगों पर हिंदी थोपने का विरोध करते हुए शोषितों और वंचितों के आरक्षण की अगुआई करने में लग गए। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस छोड़ जस्टिस पार्टी बनाई उसके बाद 1944 में  अपने आत्म – सम्मान आंदोलन और जस्टिस पार्टी को मिलाकर द्रविड़ कजगम  पार्टी का गठन किया।
पेरियार की उपाधि
पेरियार एक सम्मान जनक शब्द  और पवित्र आत्मा  के रूप में माना गया है।  इन्हें एशिया के सुकरात की भी संज्ञा दी गई है।  पूरे तमिनाडु का भ्रमण करने के बाद कई भाषाओं में और कई जन सभाओं में उन्होंने कहा कि मेरे विचार सीधे स्वीकार मत करो  बल्कि ” कुछ भी सिर्फ इसलिए स्वीकार नहीं करो कि मैंने कहा,इस पर विचार करो।अगर तुम समझते हो कि इसे स्वीकार कर सकते हो तभी स्वीकार करो अन्यथा छोड़ दो ।
महिलाओं को स्वतंत्रता और संबलता को लेकर उनके विचार इतने प्रखर थे कि उन्हें आज के  मानदंडों में  बहुत बड़ा कट्टर पंथी माना जाएगा ।
 बाल विवाह उन्मूलन और विधवा विवाह के लिए सतत संघर्षरत रहे। वे औरतों को बच्चा पैदा करने के लिए केवल शादी हो,के सख्त विरुद्ध थे और नारी शिक्षा को सर्वोपरि स्थान देते थे।शादी में निशानी के रूप में मंगल सूत्र पहनने के विरोध स्वरूप कई रैलियां  भी निकाली।
तमिलनाडु में  नारी शक्ति संबर्धन एवं नारी शसक्ति करण  के लिए  किए गए महान त्याग और कार्यों के लिए ख्यातिलब्ध ई बी रामसामी  को कई महिला  उत्थान समितियों द्वारा  महिला सम्मेलन में भाषण देने के दौरान  पेरियार की उपाधि दी गई।
जो कहते उस पर विश्वास करते –
उनके मूर्ति के नीचे लिखे  गए ईश्वर के विरुद्ध  शब्दों को  न मिटाने  के लिए हाई कोर्ट ने इसलिए खारिज  कर दिया  कि  ईरोड वेंकट रामासामी पेरियार जो कहते थे,उस पर वे विश्वास रखते थे ।  इसलिए उनके शब्दों को उनकी मूर्तियों के पैडस्टर पर लिखवाना गलत नहीं है।पेरियार के मूर्तियों के नीचे लिखा था –  कि “ईश्वर नहीं है और ईश्वर बिल्कुल नहीं है। जिसने भी ईश्वर को रचा वह बेवकूफ है,जो ईश्वर का प्रचार करता है वह दुष्ट है और जो ईश्वर की पूजा करता है वह बर्बर है।
ग्रेट पेरियार नायकर के ईश्वर से सवाल –
अपने सामाजिक व राजनीतिक जीवन में कई उतार चढ़ाव देखने के बाद पेरियार अपने तार्किक शक्ति का वैचारिक प्रयोग सभी राजनीतिक दिग्गजों के साथ  किया परन्तु उन्हें असंतुष्ट ही होना पड़ा।
जीवन में कभी भी कोई समस्याएं  यदि आ जाएं तो उसके जड़ में जाना चाहिए जैसे सामने बैल आ जाय तो उसका सिंग पकड़ना चाहिए न की पूंछ।इन्हीं अभिधारणाओं से प्रेरित पेरियार ने ईश्वर से ही सीधे प्रश्न करके हिंदू पाखंडियों  को  कटघरे में  लाकर खड़ा  कर दिया।यदि ग्रेट पेरियार द्वारा ईश्वर से पूछे गए प्रश्नों पर गंभीरता से एक नजर डालें तो, निश्चित ही सम्पूर्ण  विश्व  की मानवीय श्रृंखला वैदिक हिंदूवादी या मनुवादी व्यवस्था और ईश्वरीय आस्था से पूर्णतः मुंह मोड़ लेगी।
प्रश्न –
1-क्या तुम कायर हो जो हमेशा छिपे रहते हो,किसी के सामने कभी क्यों नहीं आते?
2-क्या तुम खुशामद परस्त हो जो लोगों से दिन रात पूजा अर्चना  करवाते हो ?
3- क्या तुम हमेशा भूखे रहते हो जो लोगों से मिठाई,दूध घी आदि लेते रहते हो ?
4- क्या तुम मांसा हारी हो जो लोगों से निर्बल पशुओं को बलि मांगते हो ?
5-  क्या तुम व्यापारी हो जो मंदिरों में लाखों टन सोना दबाए बैठे हो ?
6- क्या तुम व्यभिचारी हो जो मंदिरों में देवदासियां रखते हो ?
7- क्या तुम कमजोर हो जो हर रोज  होने वाले बलात्कार को रोक नहीं पाते ?
8- क्या तुम मूर्ख हो जो विश्व के देशों में गरीबी – भुखमरी होते हुए भी अरबों रूपए का अन्न ,दूध ,घी,तेल बिना खाए ही नदी नालों में बहा देते हो ?
9-  क्या तुम बहरे हो  जो बेवजह मरते हुए  आदमी ,बलात्कार होती हुई मासूमों की आवाज नहीं सुन पाते ?
10- क्या तुम अंधे हो जो रोज अपराध होते हुए भी नहीं देख पाते ?
11- क्या तुम आतंकवादियों से मिले हुए हो जी रोज धर्म के नाम पर लाखों लोगों को मरवाते रहते हो ?
12- क्या तुम आतंकवादी हो जो ये चाहते हो कि लोग तुमसे डर कर रहें ?
13- क्या तुम गूंगे हो जो एक शब्द नहीं बोल पाते लेकिन करोड़ों लोग तुमसे लाखों सवाल पूछते हैं ?
14- क्या तुम भ्रष्टाचारी हो जो गरीबों को कभी कुछ नहीं देते जब कि गरीब पशुवत काम करके कमाए गए पैसे का कतरा – कतरा तुम्हारे ऊपर न्यौछावर कर देते हैं ?
15- क्या तुम मूर्ख हो कि हम जैसे नास्तिकों को पैदा किया  जो तुम्हें खरी खोटी सुनाते रहते हैं और तुम्हारे अस्तित्व को ही नकारते हैं ?
पेरियार के दर्शन व तर्क संगत संदेश –
पेरियार को राजनेता,सामाजिक कार्य कर्ता और सुधारवादी होने का गर्व तो प्राप्त है ही इसके साथ स्पष्टवादिता और निर्भयता से अपनी बात कहे जाने के लिए भी  जाने जाते  हैं – जैसे  –
1.इस ब्रह्माण्ड में भगवान नाम की कोई भी शक्ति नहीं है। ईश्वर को धूर्तों ने बनाया,गुंडों ने चलाया और मूर्ख उसे पूजते हैं।
2.जब तक भारतीय समाज में जातियों का  पद क्रम बना रहेगा तब तक यह संभावना भी बनी रहेगी कि इस पद क्रम की हर सीढ़ी पर खड़ी जाति,अपने से नीची सीढ़ी की जाति का दमन करने का प्रयास करेगी।
3.जो धर्म तुम्हें नीच ठहराता है,तुम उस धर्म को लात मार दो।
पेरियार घोर ब्राह्मण विरोधी रहे ,साथ में रावण  को अपना आदर्श मानते थे।
बाल विवाह,देवदासी प्रथा,स्त्रियों और दलित शोषण के खिलाफ खड़े हुए।
सरकारी नौकरियों और शिक्षा के क्षेत्र में आरक्षण का प्रस्ताव रखा।
जहां आज का दलित समाज  विकास की गति , उच्च शिक्षा की होड़ और सामाजिक समानता की बात कर रहा है वहीं परम्पराओं, धर्मों, मान्यताओं,ब्राह्मणवादी व्यस्थाओं और सनातनी विचार धारा में पुन: जुड़ने व अपने को सवर्णों की श्रेणी में  रखने में कहीं न कहीं जरूर ठगा जा रहा है और  मानवीयता  तथा संवेदनशीलता के महान चिंतकों पर से विश्वास उठाकर उनके सपनों पर कुठाराघात कर रहा है।
जहां लोभ मोह पद प्रतिष्ठा के मद में अपना दलित समुदाय आदर्श समाज सुधारकों जिसमें बाबा साहब डॉ भीम राव अंबेडकर,ज्योतिबा फुले ,संत गाडगे  ,छत्रपति शाहूजी महाराज , महात्मा अय्यंकलि ,नारायण गुरु और महान समाज सुधारक ग्रेट पेरियार सामी आदि को भूल जा रहा है वहीं ब्राह्मण वादी व्यवस्थाओं के चंगुल से अलग नहीं हो पा रहा है।
लेकिन अब समय आ गया है अपने दलित, शोषित , पिछड़े व वंचित  समाज को नए धरातल पर एक नई सोच, बौद्धिक विचार धारा और क्रांतिकारी  स्वर  से  अपनी खो रही प्रतिष्ठा को पुन: स्थापित करने का।
 अपने समाज सुधारकों,दलित चिंतकों और शोषण के विरुद्ध लगातार अभियान चला रहे राजनीतिक या गैर राजनीतिक संगठनों  के आदर्शों को अपनाते हुए हम चाहे अनुसूचित जाति,अनुसूचित जनजाति अथवा पिछड़ी जाति हों,सभी एक होकर वह आजादी लेने में लग जाएं , जिसके लिए घोर अंधकार में जीवन- यापन कर रहे करोड़ों शोषितों  के  दीपक बने हमारे महापुरुषों ने अपने त्याग,तर्पण और समर्पण भाव से भारतीय संविधान बनाकर सुधारवादी नीतियों द्वारा सामाजिक समरसतामय शिक्षा और विकास की मुख्य धारा से जोड़कर संगठित करते हुए दुनिया में सिर उठाकर चलते रहने  का हमारा  निष्कंटक मार्ग प्रशस्त   किये।
अब हिंदुस्तान में जब कभी धर्म के ठीकेदारों के विरुद्ध  कहीं से बुलंद आवाज आयेगी तो निश्चित ही  अन्य समाज सुधारकों  के साथ ई बी रामासामी पेरियार जी हमें हमेशा याद आते रहेंगे।
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