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By : Nishpaksh Pratinidhi | Published Date : 7 Oct 1:02 PM

न्याय, अस्तित्व और अस्मिता के लिए लड़ती नारी

‘हाथरस की निर्भया ने दम तोड़ दिया’. इस खबर ने मुझे न तो चौंकाया और न ही शांत रहने दिया क्योंकि हर रोज़ न जाने कितनी निर्भया इस पुरुष प्रधान समाज की विद्रूपता का शिकार होती हैं और अपने वजूद को बनाए रखने के लिए छटपटाती रहती है।
 
विचारणीय तो यह है कि क्या पुरुष का अहं स्त्री को वस्तु मानकर, उसे भोगकर या उसे समाप्त करने की इच्छा को पूरा करके ही शांत होता है ?… क्या उसका पुरुषत्व स्त्री के भोग्या रूप को ही स्वीकार करता है और उसके कमज़ोर या दुर्बल पक्ष पर वार करके उसको जड़ बना देने पर ही पुष्ट होता है ?? यह विचार या सोच किसी भी सभ्य समाज के लिए निंदनीय है जिसमें स्त्री को एक वस्तु माना जाता है और पुरुष उसे अपने उपभोग का साधन मानकर उसके अस्तित्व को चुनौती देता रहता है।
 
स्त्री कब तक अपने आप को मनुष्य साबित करने का प्रयास करती रहेगी ? कब तक सदियों से थोपे गए उन कुतर्को का खंडन करती रहेगी जिसने उसे जीवनधारा में दोयम दर्जे पर रख दिया गया है। नारी को देवी कह देना या पूजनीय बताकर उसका महिमा मंडन कर देना, इस पुरुष सत्तात्मक सोच की एक कुचाल है जिसमें स्त्री को बाहर से यह समझाने का प्रयास है कि हमने तुम्हें देवी बनाकर शीर्ष पर स्थापित किया है  | किन्तु वह इस कुविचार से कभी विलग ही नहीं हुआ कि स्त्री सिर्फ़ एक वस्तु है, जिसका उपभोग किया जा सकता है। इतना ही नहीं आज भी वह अपने अवैज्ञानिक कुतर्को, तथा छल- प्रपंचों से स्त्री को वस्तु बनाए रखने में अनवरत लगा हुआ है। 
    
आज इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में देश के भीतर नारी पर हो रहे अत्याचारों का घिनाैना रूप देखा जा सकता है। हाथरस की उस बच्ची पर क्या लिखा जाए, लिखते हुए भी मन में रोष उत्पन्न हो रहा है। चौदह दिन की असह्य वेदना और पीड़ा को न तो किसी मीडिया चैनल ने गंभीरता से दिखाया और न ही हमारी सरकार ने कोई संज्ञान लिया। इस तरह हाथरस की निर्भया को न्याय कैसे मिल पाएगा ?
 
अगर हमारा सभ्य समाज निष्पक्ष रूप से सोचना बंद कर देगा या हमारा प्रशासन सत्ता के प्रभाव में आकर अपनी विचारशीलता एवं न्याय प्रक्रिया को भूलने लगेगा तो निश्चय ही समाज मे अपराध और अपराधियों को बल मिलता रहेगा।
 
मेरे विचार से नारी अस्मिता से जुड़ी ऐसी घटनाओं के प्रति यदि समाज जागेगा नहीं तो हम धीरे -धीरे एक ऐसा समाज गढ़ लेंगे जिसमें नारी को पुन: दासता की ओर धकेल दिया जाएगा। शिक्षित नारी वर्ग को एक पल के लिए अलग करके सोचा जाए तो सचमुच हमारी अशिक्षित एवं कमजोर महिलाओं का जीवन फिर से त्रासदी भरा हो जाएगा, जो हमारी शिक्षित महिलाओं के जीवन को भी असुरक्षित बना देगा।
 
आज पुरुष सत्तात्मक या पितृ सत्तात्मक समाज को नारी हिंसा एवं शोषण पर संवेदनशील होकर सोचने की आवश्यकता है। यदि समाज ने गंभीरता नहीं दिखाई तो हम सबके परिवारों की नारियाँ जो इस समाज का हिस्सा है, को भी कुत्सित विचारों वाले भेड़िए प्रभावित करने लगेंगे। इस बात पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
 
हर घटना या दुर्घटना में राजनीति को न लाकर हमारे प्रशासन को निष्पक्ष होकर जाँच करनी चाहिए जिससे अपराध और अपराधियों को सज़ा मिले और नारी अस्मिता के साथ- साथ उसके सम्मान को भी बचाया जा सके।
 
( डॉ0 नीता कुशवाह, शिक्षिका आगरा ) 
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