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By : Nishpaksh Pratinidhi | Published Date : 31 Mar 2020 2:39 PM |   2466 views

भारतेंदु हरिश्चंद्र

” निज भाषा उन्नति अहै , सब भाषा को मूल 

बिनु निज भाषा ज्ञान के ,मिटत न हिय को सूल 

विविध कला शिक्षा अमित ,ज्ञान अनेक प्रकार 

सब देसन से ले करहूँ ,भाषा माहि प्रचार ”

हिंदी साहित्य के इतिहास में दो हिंदी साहित्यकारों का नाम विशेष रूप में लिया जाता है – भारतेंदु हरिश्चंद्र और पंडित सूर्य कान्त त्रिपाठी ” निराला |एक ने हिंदी को आधुनिकता प्रदान किया तो दुसरे ने हिंदी काव्य रचना को नई दिशा दी | 

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का जन्म 9 सितम्बर 1850  को  काशी के एक प्रतिष्ठित वैश्य परिवार में हुआ था | इनका मूल नाम ‘हरिश्चन्द्र’ था, ‘भारतेन्दु’ उनकी उपाधि थी। उनके पिता गोपालचंद्र एक अच्छे कवि थे और गिरधरदास’उपनाम से कविता लिखा करते थे। हरिश्चंद्र पाँच वर्ष के थे तो माता की मृत्यु और दस वर्ष के थे तो पिता की मृत्यु हो गयी। इस प्रकार बचपन में ही माता-पिता के सुख से वंचित हो गये अत : बचपन का सुख नहीं मिला |13 वर्ष की उम्र में ही इनका विवाह लाला गुलाब राय की पुत्री मन्ना देवी से हो गया |

भारतेंदु बाबू को साहित्य सृजन का संस्कार पिता से विरासत में मिला था | उन्होंने पांच वर्ष की अवस्था में ही निम्नलिखित दोहा बनाकर अपने पिता को सुनाया और सुकवि होने का आशीर्वाद प्राप्त किया | 

लै ब्योढ़ा ठाढ़े भए श्री अनिरुद्ध सुजान 
बाणासुर की सेन को हनन लगे भगवान
अपने पिता से ही घर पर संस्कृत , उर्दू , पंजाबी , ब्रज आदि भाषाओँ का ज्ञान प्राप्त किया |विद्यालयी शिक्षा में इनका मन नही लगा और क्वींस कॉलेज से पढाई छोड़ कर हिंदी साहित्य की सेवा में लग गये |भारतेंदु  बाबु के अन्दर राष्ट्रीयता कूट -कूट कर भरी थी |इसका स्पष्ट प्रमाण उनके साहित्यों में मिलता है |इनकी रचनाओं में गरीबी , शोषण और गुलामी के खिलाफ बुलंद आवाज़ दिखाई देती है |देश गुलाम था , अंग्रेजी का बोलबाला था |अंग्रेजी बोलने वालो की विशेष प्रतिष्ठा थी ऐसे समय में हिंदी को आधुनिकता प्रदान किया | भारतेंदु का युग युग संधि पर खड़ा था |
उन्होंने रीतिकाल की विकृत सामन्ती संस्कृति की पोषक वृत्तियों को छोड़कर स्वस्थ परम्परा की भूमि अपनाई और नवीनता के बीज बोए। हिन्दी साहित्य में आधुनिक काल का प्रारम्भ भारतेन्दु हरिश्चन्द्र से माना जाता है। भारतीय नवजागरण  के अग्रदूत के रूप में प्रसिद्ध भारतेन्दु जी ने देश की गरीबी, पराधीनता, शासकों के अमानवीय शोषण का चित्रण को ही अपने साहित्य का लक्ष्य बनाया। हिन्दी को राष्ट्र-भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने की दिशा में उन्होंने अपनी प्रतिभा का उपयोग किया।
हिंदी पत्रकारिता , नाटक  और काव्य के क्षेत्र में उनका बहुमूल्य योगदान रहा। हिंदी में नाटकों का प्रारम्भ भारतेन्दु हरिश्चंद्र से माना जाता है।उन्होंने ‘हरिश्चंद्र चन्द्रिका’, ‘कविवचन सुधा ‘ और ‘बाला बोधिनी’ पत्रिकाओं का संपादन भी किया।

इनकी लेखनी ने उस समय के साहित्यकारों का दिल जीत लिया |उनकी लोकप्रियता से प्रभावित होकर बनारस के विद्वानों ने 1880 में उनको ‘भारतेंदु’ की उपाधि दी | वे  एक उत्कृष्ट कवि, सशक्त व्यंग्यकार, सफल नाटककार, जागरूक पत्रकार तथा ओजस्वी गद्यकार थे। इसके अलावा वे लेखक, कवि, संपादक, निबंधकार, एवं कुशल वक्ता भी थे | 

भारतेंदु बाबू गद्य और पद्य दोनों विधाओं के रचनाकार थे |गद्य में निबंध , उपन्यास और नाटक लिखे |इनकी शैली व्यंगात्मक और उद्बोधात्म्क थी |इनकी पुस्तकें भारत दुर्दशा ,नील देवी  , अंधेर नगरी , सती  प्रताप , प्रेम जोगिनी ,कालचक्र (जर्नल),हिंदी भाषा,भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है?,प्रेम माधुरी ,प्रेम-प्रलाप,विनय प्रेम पचासा,बन्दर सभा (हास्य व्यंग),कर्पूर मंजरी,मुद्राराक्षस ,भारत जननी,श्री चंद्रावली आदि है |

हिंदी साहित्य के इतिहास का आधुनिक काल 1857 – 1900 तक को भारतेंदु युग के नाम से जाना जाता है |हिंदी साहित्य का चमकता हुआ यह सितारा 35 वर्ष की उम्र में सन 1885 में दुनिया को अलविदा कह गया |किन्तु भारतेंदु बाबू की लेखनी सदैव अमर रहेगी | 

          ( नरसिंह )

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