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By : Nishpaksh Pratinidhi | Published Date : 20 Oct 2026 6:31 PM |   11 views

विजयादशमी अंततः मनुष्य की संभावनाओं पर विश्वास का पर्व

विजयादशमी केवल एक पर्व नहीं, मनुष्य के अपने भीतर लौटने का एक अवसर भी है। जीवन की भाग-दौड़ में हम संसार को जीतने की इतनी योजनाएँ बनाते हैं कि कभी-कभी अपने ही मन का हाल पूछना भूल जाते हैं। दूसरों की कमियाँ हमें दूर से दिखाई देती हैं, अपनी कमियाँ देखने के लिए भीतर उतरना पड़ता है। बाहर के रावण को पहचान लेना सरल है, भीतर बैठे रावण से परिचय करना थोड़ा कठिन। शायद इसीलिए हर वर्ष रावण जलता है और हर वर्ष हमें उसके जलने की प्रतीक्षा करनी पड़ती है।
 
राम और रावण की कथा में केवल दो व्यक्तियों का संघर्ष नहीं है। यह मनुष्य के भीतर उपस्थित दो संभावनाओं का आख्यान भी है। एक संभावना हमें मर्यादा, विवेक, करुणा और आत्मसंयम की ओर ले जाती है; दूसरी हमें अहंकार, अधिकार-लिप्सा और दूसरों को अपने अधीन रखने की आकांक्षा से भर देती है। मनुष्य की सुंदरता इसी में है कि वह इन दोनों संभावनाओं के बीच अपना रास्ता चुन सकता है। उसके पास विवेक है, स्मृति है, कल्पना है और अपने किए पर पुनर्विचार करने की क्षमता है। वह केवल परिस्थितियों का बंदी नहीं है; वह अपने निर्णयों से परिस्थितियों का अर्थ भी बदल सकता है।
 
विजयादशमी इस अर्थ में विजय का उत्सव होने के साथ-साथ चुनाव का उत्सव भी है। हम किसके पक्ष में खड़े होना चाहते हैं? उस शक्ति के पक्ष में जो अपने सामर्थ्य से दूसरों को भयभीत करती है, या उस शक्ति के पक्ष में जो निर्बल को निर्भय बनाती है? उस बुद्धि के पक्ष में जो अपनी चतुराई से दूसरों को परास्त करती है, या उस बुद्धि के पक्ष में जो सबके जीवन को थोड़ा अधिक सुंदर और न्यायपूर्ण बनाने का उपाय खोजती है? इन प्रश्नों का उत्तर किसी मैदान में खड़े पुतले से नहीं मिलता। उसके लिए अपने जीवन की छोटी-छोटी घटनाओं में उतरना पड़ता है।
 
रावण का व्यक्तित्व इसीलिए इतना अर्थवान है कि वह केवल अज्ञान का प्रतीक नहीं है। वह ज्ञान, सामर्थ्य, वैभव और प्रतिभा से संपन्न है। उसकी विडंबना यह है कि इन सबके रहते हुए भी वह अपने अहंकार को पराजित नहीं कर पाता। मनुष्य के जीवन में संकट केवल ज्ञान का अभाव नहीं है; कभी-कभी ज्ञान का अहंकार भी संकट बन जाता है। हम बहुत कुछ जान सकते हैं, बहुत कुछ प्राप्त कर सकते हैं, बहुतों से प्रशंसा पा सकते हैं, लेकिन यदि अपने भीतर दूसरे मनुष्य के लिए सम्मान बचाकर नहीं रख सके, तो हमारी उपलब्धियाँ हमारे व्यक्तित्व को संपूर्ण नहीं बना पातीं।
 
विजयादशमी का एक सुंदर संदेश यह भी है कि किसी मनुष्य की श्रेष्ठता केवल उसकी विजय से नहीं आँकी जानी चाहिए। यह भी देखना चाहिए कि उसने विजय पाने के लिए कौन-सा रास्ता चुना, अपनी शक्ति का उपयोग किसके हित में किया और अपने विरोधी के साथ कैसा व्यवहार किया। जीतने की इच्छा स्वाभाविक है, लेकिन हर कीमत पर जीतने की इच्छा मनुष्य को उसकी ही दृष्टि में छोटा कर सकती है। जीवन में कुछ पराजय ऐसी होती हैं जो हमारे भीतर मनुष्यता को बचा लेती हैं, और कुछ विजय ऐसी होती हैं जिनके बाद हमें अपने ही आचरण के सामने आँखें झुकानी पड़ती हैं।
 
हमारे उत्सवों की सुंदरता यह है कि वे गंभीर विचारों को भी जीवन के सहज उल्लास में बदल देते हैं। विजयादशमी के दिन मेले लगते हैं, बच्चे खिलौने देखते हैं, मिठाइयों की सुगंध हवा में घुलती है, रामलीला के पात्र अपने-अपने रूप में सामने आते हैं और रावण के विशाल पुतले के चारों ओर भीड़ इकट्ठी हो जाती है। कुछ देर के लिए पूरा समाज एक साझा दृश्य का हिस्सा बन जाता है। जिन लोगों के विचार अलग हैं, जिनके जीवन की कठिनाइयाँ अलग हैं, वे भी एक ही मैदान में खड़े होकर एक ही घटना की प्रतीक्षा करते हैं। यह सामूहिकता अपने आप में कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। मनुष्य को केवल निजी उपलब्धियों की नहीं, साझा प्रसन्नताओं की भी आवश्यकता होती है।
 
लेकिन उत्सव की असली उपलब्धि तभी है जब वह हमारे भीतर भी कोई हलचल पैदा करे। पुतले का दहन एक सार्वजनिक दृश्य है; अपने व्यवहार में परिवर्तन एक निजी और कठिन साधना। हम रावण के दस सिर गिन सकते हैं, पर अपने भीतर पलते हुए क्रोध, लोभ, ईर्ष्या, दंभ, असहिष्णुता और दूसरों को छोटा समझने की प्रवृत्ति को गिनना इतना आसान नहीं। इन प्रवृत्तियों का कोई एक चेहरा नहीं होता। वे कभी अधिकार के रूप में सामने आती हैं, कभी धार्मिकता के दंभ में, कभी ज्ञान की अकड़ में और कभी अपने ही लोगों से अनुचित अपेक्षाएँ रखने में। मनुष्य का अहंकार बहुत चतुर होता है। वह अपनी कमियों को भी गुण का नाम देकर बच निकलना चाहता है।
 
इसीलिए आत्मालोचन किसी उत्सव की उदासी नहीं, उसकी गहराई है। अपने दोषों को पहचानना अपने प्रति घृणा करना नहीं है। इसका अर्थ है स्वयं को बदल सकने की संभावना पर विश्वास करना। जो व्यक्ति अपनी भूल स्वीकार कर सकता है, वह अपनी प्रतिष्ठा खोकर भी अपने व्यक्तित्व को बचा लेता है। जो समाज अपनी त्रुटियों पर विचार कर सकता है, वह अपनी परंपराओं को बोझ नहीं बनने देता; उनमें नई अर्थवत्ता भरता है। परंपरा तभी जीवित रहती है जब वह वर्तमान के प्रश्नों से संवाद करती है और मनुष्य को बेहतर बनने की प्रेरणा देती है।
 
विजयादशमी को केवल बुराई पर अच्छाई की विजय कहकर छोड़ देना इसके अर्थ को छोटा कर देना होगा। अच्छाई कोई ऐसा स्थायी तमगा नहीं है जिसे एक बार प्राप्त कर लिया जाए और फिर निश्चिंत होकर जीवन बिताया जाए। वह रोज के आचरण में अर्जित होती है। किसी अपमान का उत्तर अपमान से न देना, किसी निर्बल की विवशता का लाभ न उठाना, अपने अधिकारों के साथ दूसरों के अधिकारों का सम्मान करना, परिवार में प्रेम के नाम पर किसी की स्वतंत्रता न छीनना और सार्वजनिक जीवन में अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर सोचना, ये सब छोटी-छोटी विजयें हैं। इनके लिए न मैदान चाहिए, न आतिशबाजी, न किसी विशाल पुतले की आवश्यकता। इनका उत्सव हमारे व्यवहार में दिखाई देता है।
 
आज जब मनुष्य के पास साधनों की प्रचुरता है, सूचना की गति है और अपनी बात दूर-दूर तक पहुँचाने की सुविधा है, तब उसके सामने एक नई जिम्मेदारी भी है। वह अपनी आवाज को कितना ऊँचा कर सकता है, यह प्रश्न उतना महत्त्वपूर्ण नहीं जितना यह कि वह अपनी आवाज का उपयोग किसके लिए करता है। वह कितने लोगों को प्रभावित कर सकता है, इससे अधिक महत्त्वपूर्ण यह है कि उसके प्रभाव से कितने लोगों का जीवन सहज होता है। शक्ति का मूल्य उसके प्रदर्शन में नहीं, उसके विवेकपूर्ण उपयोग में है। विजयादशमी हमें इसी अंतर को समझने का अवसर देती है।
 
राम की विजय का अर्थ किसी दूसरे समुदाय, किसी दूसरी संस्कृति या किसी भिन्न विचार वाले मनुष्य को अपमानित करना नहीं हो सकता। मर्यादा का मूल्य तभी है जब वह हमारे व्यवहार को उदार बनाए। अन्याय का विरोध आवश्यक है, लेकिन विरोध करते हुए स्वयं अन्यायपूर्ण हो जाना हमारी नैतिक पराजय है। किसी गलत प्रवृत्ति को समाप्त करने का प्रयत्न करते समय हमें यह भी देखना चाहिए कि कहीं हम उसी प्रवृत्ति को किसी नए नाम से अपने भीतर प्रतिष्ठित तो नहीं कर रहे। मनुष्य की परीक्षा केवल उसके घोषित आदर्शों से नहीं, उन आदर्शों के सामने आने वाली कठिन परिस्थितियों में उसके व्यवहार से होती है।
 
हमारे लोकजीवन ने विजयादशमी को केवल धर्मग्रंथों के पन्नों में सुरक्षित नहीं रखा। उसे गीतों, मेलों, रामलीलाओं, पारिवारिक मिलन और सामूहिक उल्लास में जगह दी है। इसीलिए यह पर्व पुस्तक से निकलकर जनजीवन का हिस्सा बनता है। बच्चे जब रामलीला देखते हैं, तो वे केवल पात्रों को नहीं देखते; वे साहस, छल, निष्ठा, प्रेम और संघर्ष के दृश्य देखते हैं। बड़े लोग भी इन दृश्यों के सामने अपने बचपन की स्मृतियों में लौट जाते हैं। हर पीढ़ी इस कथा में अपने समय के प्रश्न खोज सकती है। यही किसी जीवित सांस्कृतिक परंपरा की विशेषता है कि उसका अर्थ समाप्त नहीं होता, बल्कि जीवन के साथ बदलता और विस्तृत होता रहता है।
 
रावण का पुतला जलते समय आकाश में उठती आग कुछ क्षणों के लिए सबका ध्यान अपनी ओर खींच लेती है। फिर धुआँ छँटता है, भीड़ धीरे-धीरे लौटने लगती है, मैदान खाली हो जाता है और जीवन अपनी सामान्य गति में आ जाता है। अगले दिन वही घर, वही दफ्तर, वही बाजार, वही संबंध और वही छोटी-बड़ी उलझनें हमारा इंतजार करती हैं। विजयादशमी की सार्थकता शायद इसी अगले दिन में छिपी है। क्या हम अपने रोजमर्रा के जीवन में कुछ बदल पाए? क्या हमारे भीतर दूसरों के लिए थोड़ा अधिक धैर्य आया? क्या हम किसी पुराने पूर्वाग्रह से मुक्त हुए? क्या हमने किसी ऐसे व्यक्ति की बात सुनी जिसे अब तक सुनना आवश्यक नहीं समझते थे?
 
पर्व का उजास तभी टिकता है जब वह हमारे व्यवहार में उतरता है। अन्यथा अग्नि बाहर जलती है और भीतर का अँधेरा अपनी जगह बना रहता है।
 
विजयादशमी अंततः मनुष्य की संभावनाओं पर विश्वास का पर्व है। यह विश्वास कि क्रोध के बीच करुणा चुनी जा सकती है, प्रतिशोध के बीच क्षमा का विवेक बचाया जा सकता है, अहंकार के बीच विनम्रता संभव है और निराशा के बीच आशा के लिए जगह बनाई जा सकती है। मनुष्य पूर्ण नहीं है, लेकिन उसके भीतर स्वयं को बेहतर बनाने की क्षमता है। शायद इसी कारण हर वर्ष यह पर्व लौटता है। वह हमें किसी अंतिम विजय का प्रमाणपत्र देने नहीं आता, बल्कि एक नई शुरुआत का निमंत्रण देता है।
 
इस बार जब रावण जले, तो उसकी लपटों में केवल एक पुतले का अंत न देखें। उस दृश्य में अपनी किसी ऐसी आदत को भी पहचानें जिसे छोड़ देने से जीवन थोड़ा अधिक सुंदर हो सकता है। विजय का अर्थ किसी दूसरे को छोटा करना नहीं, अपने भीतर की संकीर्णता को छोटा करना है। और यदि इस विजय के बाद हमारे आसपास के लोगों को थोड़ा अधिक सम्मान, थोड़ा अधिक भरोसा और थोड़ा अधिक प्रेम मिल सके, तो समझिए कि विजयादशमी का उत्सव मैदान से निकलकर मनुष्य के जीवन में प्रवेश कर गया है।
 
~ परिचय दास
 
 डीन, पालि एवं अन्य भाषा संकाय, नव नालंदा महाविहार सम विश्वविद्यालय, संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार, नालंदा
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