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By : Nishpaksh Pratinidhi | Published Date : 13 Nov 2019 2:34 PM |   1955 views

ग़ज़ल ( नरेश सागर ,हापुड़ )

भीड़ में हमने खुद को तन्हा पाया है 

कोई नही है दिल को जिसने बहलाया है |

बस मै ही कहता रहा उन्हें अपना 

गले पे मेरे जिसने छुरा चलाया है |

खून के रिश्तो ने ,क्या खूब किया यारो

मेरे सामने , घर को मेरे जलाया है |

अपनों से अब अपना पन  नही मिलता 

किसने नफरत का ये फूल खिलाया है|

भाई ने ही दुश्मन से मिलकर  क़त्ल किया 

रिश्तो पर कैसा बादल मंडराया है |

” सागर ” जीना है तो अपनों से बचना 

वक़्त ने हमको यही सिखलाया है |

  

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