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By : Nishpaksh Pratinidhi | Published Date : 11 Sep 2019 4:55 PM |   1947 views

के सिवन

तमिलनाडु के मिट्टी मे उपजा एक ऐसा कच्चा हीरा , जिसे विपरीत परिस्थितियो और प्रकृति ने इतना तराशा की पूरा विश्व या यूँ कहें कि धरती से लेकर आसमान तक उनकी चमक से आभामय हो रहा है |

के सिवन ‘ तमिलनाडु के कन्याकुमारी जिले के ,सराक्कलविलाई गाँव मे एक किसान के घर जन्म लिये |इनके परिवार के जीवन यापन का जरिया खेती ही थी |प्रारंभिक शिक्षा गाँव के सरकारी स्कूल मे प्राप्त किये |पढ़ाई मे हमेशा अब्बल ही रहे |इंजीनियरिंग का सपना पाले ” के सिवन ‘आर्थिक मजबूरी के चलते बी . ए स.सी . मे दाखिला ले लिए |पढ़ाई के साथ -साथ पिता के कार्यों मे भी हाथ बटाने का भी कार्य करते थे , बल्कि इन्होने घर के सबसे करीब के कॉलेज मे इसलिए दाखिला लिया कि ,घर जल्दी आकर पिता की भी मदद कर सकें |यह अत्यनंत ही गर्व करने वाली बात है कि उन्हें अपने आर्थिक रूप से कमजोर परिवेश से कोई शिकायत नही थी |उल्टा उन्हें अपने पिता पर गर्व होता था कि ,वे अपने परिवार को तीन समय के  भोजन व्यवस्था खेती से कर लेते हैं |बचपन के दिनों मे उनके पास कोई ऐसी सुख -सुविधा नही थी जो कि ,एक साधारण जीवन के लिए भी आवश्यक होती है |उनके पास जुते और चप्पल भी नही होते थे ,उन्होंने बी .एस .सी. तक की पढाई धोती मे ही की |जब बी .एस .सी मे गणित मे 100 नंबर आये तो उनके इंजीनियरिंग करने का जज्बा फिर से जाग  उठा और इस बार वे अपने सपने के प्रति गंभीर हो गये |उन्होंने अपने इस इच्छा को पिता से जाहिर किया तो पिता ने इज्जत दे दी ,पिता ने भावुक होकर कहा कि “बे टा  एक बार मैंने तुम्हे रोक दिया था परन्तु अब नही रोकूंगा चाहे मुझे अपनी जमीन ही क्यों न बेचनी पड़े” सादगी के प्रतिमूर्ति ” के सिवन “के पास स्नातक करने तक पैंट -शर्ट की एक जोड़ी भी नही थी |इंजीनियरिंग क्लास मे पहली बार वे पैन्ट – शर्ट पहनके जाना शुरू किये |आप सोच सकते है कि वो दिन उनके किये कितना बड़ा रहा होगा , सच मे वो दिन  उन्हें किसी त्यौहार से कम न लगा होगा जब वो पहली बार इंजीनियरिंग के क्लास मे प्रवेश किये होंगे वो भी एक अलग सुब्य्वस्थित वेश- भूषा मे |धरती से लेकर आसमान तक ,भारत का नाम गर्व से ऊँचा कर देने वाले ,”के सिवन ” ने शिक्षा ग्रहण करते समय कभी भी कोचिंग का सहारा नही लिये |

राकेटमैन के नाम से विख्यात ” के सिवन “ने पीएस एल वी ,जी एस एल वी ,रियुजेबल लांच व्हीकल जैसे प्रोजेक्ट मे अहम भागीदारी की थी |जिसके चलते ही उन्हें राकेट मैन कहा जाता है |फ़रवरी 2017 मे एक साथ 104 सेटेलाइट प्रक्षेपण कर भारत ने एक नया इतिहास रचा ,जिसमे के सिवन  ने अहम् योगदान दिया |दोस्तों – छोटी – छोटी विफलताओं से हताश हो जाने वाली हमारी युवा पीढ़ी को उनकी एक बात से अवश्य ही सीख लेनी चाहिए कि , “के सिवन ” जैसे होनहार और मेधावी छात्र को कभी भी उनके पसंद का कार्य क्षेत्र नही मिला ,फिर भी उन्होंने बड़ी तन्मयता और लगन से अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन किया |न सिर्फ जिम्मेदारी निभाई बल्कि उन्होंने अपने कार्य क्षेत्र ए बड़े -बड़े महारथ भी हासिल किये |वो कहते हैं कि “मैंने जो क्षेत्र चाहां ,वो मुझे कभी भी नही मिला |इंजीनियरिंग के बाद वो सेटेलाइट सेंटर मे जाना चाहते थे ,लेकिन उन्हें “विक्रम साराभाई सेंटर मे काम मिला |वह ऐरोडायनेमिक ग्रुप ज्वाइन करना चाहते थे ,लेकिन पी एस एल वी प्रोजेक्ट पर काम करना पडा |बावजूद इसके उनके काम के प्रति लगन और निष्ठा मे कोई कमी नही आई बल्कि इन्होने इसे एक चुनौती मानकर और अधिक मेहनत  की एवं सफलता हासिल की |इन्हें इनकी उपलब्धियों के लिए पुरस्कार भी मिले |1999 मे विक्रम साराभाई रिसर्च अवार्ड,2007 मे चेन्नई सत्यभामा विश्वविद्यालय से ” डॉ ऑफ साइंस “की उपाधि |   

( प्रियंका दूबे , प्रबोधिनी  गोरखपुर ) 

 

          

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