स्त्रियाँ
सहेजती हैं ,सजाती हैं
संभालती हैं ,
सिलती हैं फटे कपड़े, जोड़ती हैं
टूटे गमले, ढाँकती है मायूसी को अपनी मुस्कुराहट में ।
छिपाती है थकान
कमर पर कसी पल्ले की ठसक से
ऊर्जा से अपनी
घर भरती हैं ।
स्त्रियाँ कुछ भी ज़ाया नहीं करती हैं ।
हर कोने को नया रूप देती
बिखरे साज़-ओ-समान को
क़रीने से लगाती
अपने ख्वाबों को कपड़ो की
तह में लपेटती
उधड़े रिश्तों को अपने प्यार के
ताने बाने में पिरोतीं हैं ।
वो अपने ऊपर कुछ बकाया
नहीं रखती ।
स्त्रियाँ कुछ भी ज़ाया नहीं करतीं ,
स्त्रियाँ कुछ भी ज़ाया नहीं करतीं ।।
रश्मि राज, नई दिल्ली
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