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By : Nishpaksh Pratinidhi | Published Date : 10 Oct 2026 8:12 PM |   20 views

बिहार पालि और बौद्ध अध्ययन की स्वाभाविक भूमि है

पालि भाषा के उत्कृष्टता केंद्र के संस्थागत चयन पर पुनर्विचार कर इसकी स्थापना एवं संचालन का दायित्व नव नालंदा महाविहार, नालंदा को सौंपने की मांग उठी है। वैकल्पिक रूप से महाविहार में पालि का एक अतिरिक्त उत्कृष्टता केंद्र स्थापित करने का प्रस्ताव भी रखा गया है। इस संबंध में नव नालंदा महाविहार में पालि एवं अन्य भाषा संकाय की ओर से बैठक आयोजित हुई। बैठक में उपस्थित शिक्षकों और शोधार्थियों ने पालि भाषा के अध्ययन, शोध, संरक्षण और प्रसार में महाविहार की ऐतिहासिक भूमिका का उल्लेख करते हुए संस्थागत चयन पर पुनर्विचार की आवश्यकता बताई।
 
पालि को शास्त्रीय भाषा का दर्जा मिलना भारतीय ज्ञान-परंपरा के लिए महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। पालि में भगवान बुद्ध के उपदेशों और बौद्ध साहित्य की विपुल परंपरा सुरक्षित है। त्रिपिटक सहित अनेक महत्त्वपूर्ण बौद्ध ग्रंथों के अध्ययन और अनुवाद के लिए पालि का ज्ञान अनिवार्य है। इस भाषा का संबंध केवल साहित्यिक अध्ययन से नहीं, बल्कि भारत की बौद्धिक, दार्शनिक और सांस्कृतिक विरासत से भी है। इसलिए इसके अध्ययन और शोध के लिए उत्कृष्टता केंद्र की स्थापना का प्रश्न अकादमिक महत्त्व के साथ-साथ सांस्कृतिक महत्त्व भी रखता है।
 
बैठक में कहा गया कि बिहार पालि और बौद्ध अध्ययन की स्वाभाविक भूमि है। बोधगया, राजगीर, वैशाली और नालंदा जैसे स्थान बौद्ध परंपरा के महत्त्वपूर्ण केंद्र रहे हैं। इस ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परिवेश में पालि के अध्ययन तथा शोध को संस्थागत रूप से विकसित करने की व्यापक संभावनाएं हैं। ऐसे में बिहार स्थित नव नालंदा महाविहार की दीर्घकालीन अकादमिक परंपरा को पालि उत्कृष्टता केंद्र के चयन में उचित महत्त्व दिया जाना चाहिए।
 
नव नालंदा महाविहार की स्थापना वर्ष 1951 में हुई थी। वर्ष 2026 में यह अपने स्थापना के 75 वर्ष पूरे कर रहा है। इन वर्षों में संस्थान ने पालि भाषा, बौद्ध दर्शन, बौद्ध साहित्य और प्राचीन भारतीय ज्ञान-परंपरा के अध्ययन, शोध, अनुवाद तथा प्रकाशन के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किया है। संस्थान की शैक्षणिक परंपरा और उपलब्धियां पालि अध्ययन के लिए इसे एक महत्त्वपूर्ण केंद्र बनाती हैं।
 
पालि एवं अन्य भाषा संकाय के संकायाध्यक्ष (डीन) प्रो. रवींद्र नाथ श्रीवास्तव ‘परिचय दास’ ने कहा, “नव नालंदा महाविहार पालि और बौद्ध अध्ययन के क्षेत्र में 75 वर्षों की अकादमिक परंपरा रखता है। पालि उत्कृष्टता केंद्र के चयन में इस दीर्घकालीन योगदान और संस्थान के अनुभव को ध्यान में रखा जाना चाहिए। हमारी मांग है कि केंद्र की जिम्मेदारी महाविहार को सौंपी जाए। वैकल्पिक रूप से यहां पालि का एक अतिरिक्त उत्कृष्टता केंद्र स्थापित किया जाए।”
 
बैठक में इस बात पर भी विचार किया गया कि पालि उत्कृष्टता केंद्र के लिए ओडिशा स्थित केंद्रीय विश्वविद्यालय का चयन किए जाने के संदर्भ में अकादमिक अनुभव, शोध-परंपरा और संबंधित विषय में संस्थागत योगदान की तुलनात्मक समीक्षा होनी चाहिए। सदस्यों ने कहा कि मांग का उद्देश्य किसी अन्य संस्थान के महत्त्व को कम करना नहीं, बल्कि पालि भाषा के विकास के लिए उपलब्ध विशेषज्ञता और दीर्घकालीन अनुभव का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित करना है।
 
बैठक में उपस्थित सदस्यों ने सर्वसम्मति से संकल्प पारित कर केंद्र के संस्थागत चयन पर पुनर्विचार करने तथा नव नालंदा महाविहार, नालंदा को इसकी स्थापना एवं संचालन का दायित्व सौंपने की मांग की। वैकल्पिक रूप से महाविहार में पालि का एक अतिरिक्त उत्कृष्टता केंद्र स्थापित करने का प्रस्ताव भी रखा गया। सदस्यों ने इस मांग को भारत सरकार के संबंधित मंत्रालयों और सक्षम प्राधिकारियों तक पहुंचाने पर बल दिया।
 
बैठक में प्रो. विश्वजीत कुमार ने नव नालंदा महाविहार में उत्कृष्टता केंद्र स्थापित करने की आवश्यकता पर जोर दिया। प्रो. श्रीकांत सिंह ने कहा कि संस्थागत चयन में अकादमिक परंपरा और विषयगत योगदान को आधार बनाया जाना चाहिए। प्रो. राणा पुरुषोत्तम कुमार ने मांग को उच्च स्तर तक पहुंचाने की आवश्यकता बताई।
 
डॉ. ललन कुमार झा ने नव नालंदा महाविहार को केंद्रीय पालि एवं बौद्ध अध्ययन विश्वविद्यालय के रूप में विकसित करने का सुझाव दिया। प्रो. सुशिम दुबे ने पालि के विकास में महाविहार की भूमिका को महत्त्वपूर्ण बताया। डॉ. प्रदीप कुमार दास ने केंद्र की जिम्मेदारी महाविहार को सौंपने का समर्थन किया।
 
डॉ. बुद्धदेव भट्टाचार्य ने यहां एक अतिरिक्त उत्कृष्टता केंद्र स्थापित करने का प्रस्ताव रखा। डॉ. धम्म ज्योति ने संस्थागत चयन पर पुनर्विचार अथवा महाविहार में अतिरिक्त केंद्र की स्थापना का समर्थन किया। डॉ. नरेंद्र दत्त तिवारी ने भी नव नालंदा महाविहार में पालि उत्कृष्टता केंद्र स्थापित किए जाने की मांग का समर्थन किया।
 
बैठक में लगभग 40 शिक्षक और शोधार्थी उपस्थित थे। शोधार्थियों में अंकित द्विवेदी, ठाकुर रवि प्रताप, मांडवी सिंह सहित अन्य प्रतिभागियों ने भी नव नालंदा महाविहार में पालि उत्कृष्टता केंद्र स्थापित करने की मांग का समर्थन किया।
 
बैठक का निष्कर्ष था कि पालि भाषा के संरक्षण, अध्ययन और वैश्विक प्रसार के लिए संस्थागत निर्णय लेते समय ऐतिहासिक योगदान, अकादमिक अनुभव और शोध-संसाधनों को महत्त्व दिया जाना चाहिए। सदस्यों ने आशा व्यक्त की कि संबंधित प्राधिकारी नव नालंदा महाविहार की मांग पर गंभीरता से विचार करेंगे और पालि भाषा के विकास के व्यापक हित में उचित निर्णय लेंगे।
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