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By : Nishpaksh Pratinidhi | Published Date : 22 Aug 2026 8:23 PM |   15 views

क्या पौधे का हरा होना ही सफल उत्पादन की गारंटी है

खेत में खड़ी फसल का गहरा हरा रंग किसान के लिए सामान्यतः अच्छे स्वास्थ्य और अच्छी उपज का संकेत माना जाता है। लेकिन केवल पत्तियों का हरा होना सफल उत्पादन की गारंटी नहीं है। पौधे का वास्तविक स्वास्थ्य इस बात से तय होता है कि उसे उपलब्ध पोषक तत्व किस संतुलन में मिल रहे हैं और वह अपने बनाए हुए भोजन का उपयोग पत्तियों की वृद्धि के साथ-साथ फूल, फल, बीज, कंद, बल्ब या अन्य उत्पादन अंगों के विकास में कितना कर पा रहा है। इसलिए खेती में केवल यह देखना पर्याप्त नहीं कि पौधा कितना हरा है, बल्कि यह देखना अधिक महत्वपूर्ण है कि उसकी हरियाली उत्पादन में कितनी बदल रही है।
 
पौधे को नाइट्रोजन की आवश्यकता अवश्य होती है। नाइट्रोजन पत्तियों के विकास, हरितलवक के निर्माण और पौधे की सामान्य वृद्धि के लिए आवश्यक प्रमुख पोषक तत्व है। समस्या तब शुरू होती है जब आवश्यकता से अधिक नाइट्रोजन, विशेषकर यूरिया, बार-बार और बिना फसल की वास्तविक जरूरत समझे दिया जाता है। इससे पौधे में पत्तियों और तनों की वृद्धि तेजी से बढ़ सकती है और खेत बहुत गहरा हरा दिखाई देने लगता है। किसान को लगता है कि फसल बहुत अच्छी चल रही है, जबकि कई बार पौधे की शक्ति उत्पादन अंगों के बजाय केवल हरित वृद्धि में खर्च हो रही होती है।
 
बहुत ज्यादा नाइट्रोजन से आई हरियाली भी नुकसानदायक हो सकती है-
अधिक यूरिया देने से पौधा असामान्य रूप से कोमल और अत्यधिक हरा हो सकता है। ऐसी स्थिति में तनों और पत्तियों की वृद्धि बढ़ने के साथ फूल आने में देरी, फूलों का झड़ना, फल बनने की क्षमता में कमी और बने हुए फलों के विकास में असंतुलन जैसी समस्याएं दिखाई दे सकती हैं। कई सब्जी और फल वाली फसलों में अत्यधिक नाइट्रोजन के कारण पौधा पत्तियों और शाखाओं में अधिक ऊर्जा लगाता है, जबकि किसान की वास्तविक जरूरत बाजार योग्य फल, फूल या अन्य उत्पादन होती है। अत्यधिक कोमल वृद्धि होने पर रोग और कुछ कीटों का प्रकोप भी बढ़ सकता है। इसलिए गहरा हरा रंग देखकर यूरिया की अगली मात्रा बढ़ा देना हमेशा सही निर्णय नहीं है।
 
नाइट्रोजन की अधिकता का एक दूसरा पहलू यह है कि खेत में इसकी उपलब्धता केवल किसान द्वारा डाली गई खाद से ही निर्धारित नहीं होती। विशेषकर वर्षा के मौसम में वातावरण, मिट्टी की नमी और जैविक प्रक्रियाओं के कारण पौधे के आसपास नाइट्रोजन की उपलब्धता और उसके उपयोग की स्थिति तेजी से बदल सकती है। ऐसे समय में बिना आवश्यकता समझे अतिरिक्त यूरिया देना पौधे में पहले से मौजूद नाइट्रोजन असंतुलन को और बढ़ा सकता है। इसलिए बारिश के समय नाइट्रोजन प्रबंधन में मात्रा से अधिक आवश्यकता, समय और पौधे की अवस्था को देखना जरूरी है।
 
बारिश और अधिक नमी में हरे पौधे का भ्रम-
वर्षा ऋतु में लगातार नमी होने पर पौधे की वृद्धि कई बार तेज दिखाई देती है। मिट्टी में पर्याप्त नमी और उपलब्ध नाइट्रोजन के कारण पत्तियां बड़ी और हरी हो सकती हैं, लेकिन अधिक नमी का अर्थ यह नहीं कि पौधा पोषण का संतुलित उपयोग कर रहा है। खेत में लगातार नमी या पानी रुकने की स्थिति में जड़ों के आसपास हवा की कमी हो सकती है। इससे जड़ों की सक्रियता और पोषक तत्वों के अवशोषण पर असर पड़ता है। दूसरी ओर, बादल और कम धूप की स्थिति में पौधे द्वारा बनाया जाने वाला भोजन भी प्रभावित हो सकता है। ऐसे वातावरण में अत्यधिक नाइट्रोजन पौधे को हराभरा तो बना सकता है, लेकिन फूल और फल बनने की प्रक्रिया उतनी मजबूत नहीं रहती। परिणामस्वरूप फूल अधिक झड़ सकते हैं, फल कम लग सकते हैं और उपज की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।
 
विशेषकर फल और सब्जी वाली फसलों में यह संतुलन बहुत महत्वपूर्ण है। किसान यदि केवल पत्तियों का रंग देखकर पोषण तय करेगा तो वह कई बार उस समय भी नाइट्रोजन देता रहेगा जब पौधे को उसकी आवश्यकता कम और अन्य पोषक तत्वों के संतुलन की आवश्यकता अधिक हो सकती है। पौधे की अवस्था के अनुसार नाइट्रोजन के साथ फास्फोरस, पोटाश, कैल्शियम, मैग्नीशियम, गंधक और सूक्ष्म पोषक तत्वों की वास्तविक आवश्यकता को समझना जरूरी है। कोई भी पोषक तत्व दूसरे की कमी की भरपाई नहीं कर सकता और केवल एक तत्व बढ़ाते जाने से संतुलित पोषण नहीं बनता।
 
फूल झड़ना और फल कम लगना केवल रोग का संकेत नहीं-
बारिश या अधिक नमी वाले मौसम में जब फूल झड़ते हैं या फल कम लगते हैं तो किसान अक्सर इसे सीधे रोग या कीट से जोड़ देता है। कई परिस्थितियों में इसका संबंध पौधे के पोषण और वृद्धि के असंतुलन से भी हो सकता है। अत्यधिक नाइट्रोजन से पौधे की वनस्पतिक वृद्धि बढ़ने पर फूल और फल बनने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। लगातार बादल, अधिक नमी, जड़ों की कमजोर सक्रियता और पोषक तत्वों के असंतुलन के साथ यह समस्या और स्पष्ट दिखाई दे सकती है। इसलिए फूल झड़ने की स्थिति में केवल दवा या यूरिया की मात्रा बढ़ाने के बजाय पूरे पौधे की पोषण अवस्था को समझना चाहिए।
 
हर पीली पत्ती का इलाज नाइट्रोजन या जिंक नहीं है-
खेती में एक दूसरी गंभीर समस्या गलत पहचान की है। खेत में पत्तियां पीली दिखाई दीं और तुरंत नाइट्रोजन डाल दी गई, दूसरी स्थिति में जिंक की कमी मानकर जिंक डाल दिया गया। लेकिन पत्तियों का पीला होना कई अलग-अलग कारणों से हो सकता है। जड़ की समस्या, अधिक नमी, पोषक तत्वों का असंतुलन, लौह की कमी, अन्य सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी, रोग या विषाणुजनित समस्या, सभी में पौधे का रंग बदल सकता है। केवल रंग देखकर किसी एक पोषक तत्व का प्रयोग शुरू कर देना वैज्ञानिक प्रबंधन नहीं है।
 
विशेष रूप से पीला मोजेक जैसे विषाणुजनित रोग में यदि किसान को यह कहकर नाइट्रोजन या जिंक डलवाया जाए कि इससे पौधा फिर से हरा हो जाएगा, तो किसान का खर्च बढ़ सकता है, जबकि मूल समस्या वहीं बनी रहती है। कुछ समय के लिए हरियाली में बदलाव दिखाई दे भी जाए तो इसका अर्थ यह नहीं कि रोग ठीक हो गया या उत्पादन क्षमता वापस आ गई। इस प्रकार पौधे का रंग देखकर किया गया गलत पोषण प्रबंधन किसान को दोहरा नुकसान दे सकता है, पहले अनावश्यक लागत और फिर वास्तविक समस्या के उपचार में होने वाली देरी।
 
दुकानदार की सलाह नहीं, समस्या की सही पहचान जरूरी-
किसान के लिए सबसे कठिन स्थिति तब होती है जब खेत में दिखाई देने वाले लक्षण को तुरंत किसी एक खाद या सूक्ष्म पोषक तत्व से जोड़ दिया जाता है। खाद और कृषि सामग्री बेचने वाले प्रत्येक व्यक्ति की सलाह गलत हो, ऐसा नहीं है, लेकिन किसी भी लक्षण को देखकर बिना कारण की पुष्टि किए कोई पोषक तत्व देना उचित नहीं है। आयरन की कमी हो तो आयरन की जरूरत होगी, जिंक की वास्तविक कमी हो तो जिंक देना उपयोगी होगा और नाइट्रोजन की कमी हो तो नाइट्रोजन की आवश्यकता होगी। लेकिन यदि समस्या इनमें से किसी की कमी है ही नहीं, तो केवल पौधे को हरा करने के लिए इनका प्रयोग किसान की लागत बढ़ाने के अलावा कोई वास्तविक लाभ नहीं देगा।
 
इसलिए किसान को हर बार यह समझना चाहिए कि पोषक तत्व दवा नहीं हैं, वे पौधे की आवश्यकता के अनुसार दिए जाने वाले भोजन हैं।* जिस तत्व की कमी नहीं है, उसे केवल अनुमान के आधार पर देने से पौधे का संतुलन सुधरने के बजाय बिगड़ भी सकता है।
 
असली सफलता पौधे के रंग में नहीं, उत्पादन के संतुलन में है-
अच्छी फसल वह नहीं है जिसमें केवल पत्तियां बड़ी और गहरी हरी हों। अच्छी फसल वह है जिसमें जड़ सक्रिय हो, पौधे की वृद्धि संतुलित हो, फूल स्वस्थ बनें, फल या अन्य उत्पादन अंग अच्छी तरह विकसित हों और उपलब्ध पोषक तत्व का अधिकतम हिस्सा बाजार योग्य उपज में परिवर्तित हो। इसलिए खेत का निरीक्षण करते समय पत्तियों के रंग के साथ पौधे की अवस्था, नई वृद्धि, फूल, फल और जड़ों की स्थिति को भी देखना चाहिए।
 
खेती में “हरा कितना है” से अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न है-उत्पादन के लिए संतुलित कितना है।”* यूरिया हो या कोई सूक्ष्म पोषक तत्व, मात्रा बढ़ाना ही समाधान नहीं है। सही पोषक तत्व, सही मात्रा, सही समय और सही आवश्यकता की पहचान ही बेहतर उत्पादन का आधार है। किसान को ऐसी हरियाली नहीं चाहिए जो केवल आंखों को अच्छी लगे, बल्कि ऐसी संतुलित वृद्धि चाहिए जो अंततः खेत की उपज और किसान की आय में दिखाई दे।
 
इसलिये खेती का सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है:
पौधा कितना हरा है?” से ज्यादा जरूरी है, “पौधा कितना उत्पादक है?”
 
डॉ. शुभम कुमार कुलश्रेष्ठ विभागाध्यक्ष एवं सहायक प्राध्यापक – उद्यान विभाग (कृषि संकाय)
रविन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय, रायसेन, मध्य प्रदेश
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