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By : Nishpaksh Pratinidhi | Published Date : 18 Aug 2026 6:46 PM |   231 views

प्रेम

शेष रहा अपना कोई अनुबंध नहीं है।
जाओ अब तुम पर कोई प्रतिबंध नहीं है।।
 
एक भ्रमर के जैसे था तुममें जो विचलन,
बांध नहीं पाया वह ही तुमसे मेरा मन,
मेरा साथ सदा तुमको था पिंजरे जैसा,
जैसा तुमने चाहा मैं भी कब था वैसा,
 
छोड़ो अब मेरे मन में कुछ द्वंध नहीं है।
प्रीत निभे बेमन से वो संबंध नहीं है।।
 
कल आए थे और हमें कल जाना होगा,
जाने फिर क्या ऊपर ठौर ठिकाना होगा,
फिर क्यों रह कर साथ रहें उद्विग्न यहां हम
उलझी डोर अगर टूटी तो उसमें क्या ग़म,
 
जीवन किस्से जैसा, शोध प्रबंध नहीं है।
क्या होगा वो फूल कि जिसमें गंध नहीं है।।
 
स्वयं बॅंधे राघव मर्यादा के बंधन में, 
संबंधों से हरदम कष्ट सहे जीवन में,
कृष्ण बचे कब भोग विछोह बॅंटे दो कुल में,
राजमहल को छोड़ा और पले गोकुल में,
 
सच है की रिश्ता कोई निर्बंध नहीं है।
लेकिन सच यह भी की मन पर बंध नहीं है।
 
सीमा ‘नयन’
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