Saturday 19th of September 2026 11:49:04 PM

Breaking News
  • मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की जमीन फर्जीवाड़ा और मनी लोंद्रिंग मामले में 21 सितम्बर को पीएमएलए कोर्ट में पेशी |
  • भारत और अमेरिकी सेनाओ का साझा युद्धाभ्यास जारी , ड्रोन और एआई पर फोकस |
  • ODOP से काशी की मशहूर लौंगलता मिठाई को मिल रही नई पहचान |
Facebook Comments
By : Nishpaksh Pratinidhi | Published Date : 22 Feb 2026 7:58 PM |   464 views

भारतीय सिनेमा में कविता और संगीत की परंपरा ने दर्शकों की संवेदना को विशिष्ट आकार दिया- परिचय दास

खजुराहो-नव नालंदा महाविहार विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के प्रो. रवींद्र नाथ श्रीवास्तव “परिचय दास” ने खजुराहो महोत्सव में आयोजित विशेष व्याख्यान में कहा कि फिल्म और अन्य माध्यमों में शब्द केवल ध्वनि नहीं रहते, वे संगीत के सहचर बनकर अपना अर्थ स्वयं रचते हैं। उनका विषय था—“शब्द और संगीत: फिल्म व अन्य माध्यमों में अर्थ-निर्माण की प्रक्रिया”।
 
उन्होंने कहा कि जब कोई शब्द संगीत में प्रवेश करता है तो वह अपनी शब्दकोशीय सीमा से बाहर निकल जाता है। राग, लय, विराम और ध्वनि-संयोजन उसके भीतर नए अर्थों की गत्यात्मकता भर देते हैं। फिल्म में दृश्य, प्रकाश और कैमरा-भाषा के साथ जुड़कर वही शब्द एक बहुस्तरीय अनुभव में बदल जाता है। इस प्रकार अर्थ केवल लिखा या बोला नहीं जाता, बल्कि रचा जाता है—क्षण-क्षण में, संदर्भ-दर-संदर्भ।
 
प्रो. परिचय दास ने उदाहरण देते हुए कहा कि सिनेमा में गीत कथानक का विस्तार भर नहीं करते, वे चरित्र की आंतरिक स्थिति को उद्घाटित करते हैं। कभी शब्द मौन के भीतर अर्थ ग्रहण करते हैं, तो कभी संगीत शब्दों के अंतराल को भर देता है। उन्होंने रेखांकित किया कि भारतीय सिनेमा में कविता और संगीत की परंपरा ने दर्शकों की संवेदना को विशिष्ट रूप से आकार दिया है, जहाँ शब्द ध्वनि के साथ मिलकर सामूहिक स्मृति का हिस्सा बन जाते हैं।
 
व्याख्यान में उन्होंने यह भी कहा कि डिजिटल युग में अर्थ-निर्माण की प्रक्रिया और जटिल हुई है।
 
 वेब-सीरीज़, लघु फिल्में और सोशल मीडिया के दृश्य-श्रव्य माध्यमों में शब्दों का प्रयोग अधिक संक्षिप्त, पर अधिक तीक्ष्ण हो गया है। अब एक पंक्ति, एक धुन या एक ठहराव भी व्यापक अर्थ-संकेत उत्पन्न कर सकता है। यह समय शब्द और संगीत के नए संयोजन का समय है।
 
कार्यक्रम में उपस्थित श्रोताओं—कला समीक्षकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों—ने व्याख्यान को गंभीर और विचारोत्तेजक बताया। प्रश्नोत्तर सत्र में प्रो. परिचय दास ने स्पष्ट किया कि शब्द और संगीत का संबंध प्रतिस्पर्धा का नहीं, सह-रचना का है। जब दोनों का संतुलन साधा जाता है, तभी कला अपनी पूर्ण रचनात्मकता में प्रकट होती है।
 
व्याख्यान के अंत में आयोजकों ने उनका आभार व्यक्त किया और कहा कि इस प्रकार के विमर्श कला और अकादमिक जगत के बीच सेतु का कार्य करते हैं। खजुराहो की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में हुआ यह संवाद शब्द, संगीत और दृश्य कला की अंतःक्रिया पर एक महत्त्वपूर्ण हस्तक्षेप के रूप में देखा गया।
Facebook Comments