Saturday 19th of September 2026 11:44:45 PM

Breaking News
  • मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की जमीन फर्जीवाड़ा और मनी लोंद्रिंग मामले में 21 सितम्बर को पीएमएलए कोर्ट में पेशी |
  • भारत और अमेरिकी सेनाओ का साझा युद्धाभ्यास जारी , ड्रोन और एआई पर फोकस |
  • ODOP से काशी की मशहूर लौंगलता मिठाई को मिल रही नई पहचान |
Facebook Comments
By : Nishpaksh Pratinidhi | Published Date : 21 Feb 2026 9:30 PM |   193 views

“पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता की दिशाएं ” विषय पर व्याख्यान आयोजित

कुशीनगर–राष्ट्रीय सेवा योजना, बुद्ध स्नातकोत्तर महाविद्यालय कुशीनगर के विशेष शिविर में चतुर्थ दिवस बौद्धिक सत्र में मुख्य अतिथि कृष्ण कुशवाहा ने “पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता की दिशाएं” विषय पर बोलते हुए कहा कि हम सभी प्रत्येक वर्ष 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस पर लगाए हुए पौधों को सेवित करते हुए अगले वर्ष पर्यावरण दिवस पर उसी पौधे के साथ एक सेल्फी पोस्ट करें तब पर्यावरण के प्रति हमारी वास्तविक संवेदनशीलता का पता चलेगा ।

उन्होंने बताया कि पौधों का रोपण जितना महत्वपूर्ण है उतना ही महत्वपूर्ण उसका संरक्षण है क्योंकि प्रत्येक वर्ष जितने पौधे लगाए जाते हैं उसमें तीन चौथाई एक वर्ष के भीतर ही नष्ट हो जाते हैं। भारत की धरती को हरा भरा बनाने के लिए हमे पौधारोपण के साथ उनके संरक्षण को जनांदोलन बनाना होगा।यही वास्तविक संवेदनशीलता है।हमे विभिन्न पर्वों, विवाह, जन्मदिन, वर्षगांठ आदि अवसरों पर अतिथियों को पौधा भेंट करने की शुरुआत करें।इससे समाज में पर्यावरण को लेकर संवेदनशीलता की भावना का पोषण होगा।विकास हमेशा पर्यावरण का विरोधी नहीं होता है। पर्यावरण के सह – अस्तित्व की भावना के साथ सतत विकास का मार्ग चुन सकते हैं। हमें प्रकृति से जितना लेना है संवेदनशील तरीके से उतना वापस भी करना है।   

मुख्य वक्ता डॉ शंभू दयाल कुशवाहा ने बताया कि प्रकृति में हो रहे क्षरण को मानवीय संवेदना के साथ समझना ही पर्यावरण के प्रति वास्तविक संवेदनशीलता है । नदी अपनी मौलिक अवस्था में कल-कल निनाद करते हुए बहती है लेकिन यही नदी प्रदूषित होकर जब गंदे नाले में बदल जाती है तब न केवल उसकी गति खो जाती है अपितु उसकी कल – कल निनाद की मंगल ध्वनि भी खो जाती है। नदी की पीड़ा को और उसके मौन को समझना ही नदी के प्रति सच्ची संवेदनशीलता है।आपने कहा कि सतत विकास की अवधारणा प्रकृति के संसाधनों का संवेदनशील उपयोग के बिना साकार होना संभव नहीं है।
 
प्रकृति हमारी समस्त आवश्यकताओं को पूरा करने की क्षमता रखती है |आज का समस्त विकास पर्यावरण विनाश की शर्तों पर हो रहा है।इससे पूरी मानवता ही संकट में पड़ गई है। विकसित देशों ने अपनी आर्थिक प्रगति के विकासशील देशों को उत्पादन केंद्र बनाकर उनके पर्यावरण को जमकर नुकसान पहुंचाया है।आपने विकसित देशों द्वारा आर्थिक विकास हेतु विकासशील देशों के प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुन दोहन करते हुए पर्यावरण को अपूरणीय नुकसान पहुंचाया है।
 
बुद्ध स्नातकोत्तर महाविद्यालय कुशीनगर में वनस्पतिशास्त्र के विभागाध्यक्ष डॉ अनुज कुमार ने अध्यक्षीय उद्बोधन में बताया कि पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता ही पर्यावरणीय संवेदनशीलता है। हम भारतीय जल, जंगल और जमीन के साथ जीने वाले लोग है। पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता हमें यह बताती है कि प्रकृति के साथ कैसे जीना है। हमे पर्यावरण को कंट्रोल नहीं करना है अपितु उसके साथ सहचर भाव से जीना है। चीजें अपने दैनिक जीवन कैसे उतारते हैं इसी से वास्तविक फर्क पड़ता है।
 
उन्होंने तीन प की बात करते हुए कहा कि हमें तीन प के प्रति संवेदनशीलता बनना होगा। पहला है – प्लास्टिक , द्वितीय – पानी और तीसरा है – पेड़। आभार ज्ञापन कार्यक्रम अधिकारी डॉ पारस नाथ ने किया जबकि संचालन स्वयंसेविका मुस्कान शर्मा ने किया। इससे पूर्ण बौद्धिक सत्र में आए अतिथियों का परिचय, विषय स्थापना और स्वागत कार्यक्रम अधिकारी डॉ निगम मौर्य ने किया।
Facebook Comments