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By : Nishpaksh Pratinidhi | Published Date : 24 Dec 2025 7:10 PM |   418 views

साहित्य और कला पर्यावरणीय चेतना के सबसे जीवंत दस्तावेज-परिचय दास

ई. एफ. एस. एल. ई. संस्था के तत्त्वावधान में लखनऊ स्थित नेशनल पीजी कॉलेज में एक अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया जिसमें पर्यावरण, पारिस्थितिकी और जलवायु परिवर्तन जैसे समकालीन वैश्विक प्रश्नों पर गहन मंथन हुआ।
 
इस संगोष्ठी की विशेषता यह रही कि विमर्श केवल वैज्ञानिक या तकनीकी स्तर तक सीमित नहीं रहा बल्कि संस्कृति, समाज और लोकजीवन पर इन संकटों के प्रभावों को भी गंभीरता से रेखांकित किया गया जिसमें देश के विभिन्न हिस्सों से विद्वानों, अध्येताओं और साहित्यकारों की सहभागिता रही।
 
हिंदी सत्र की अध्यक्षता जाने-माने साहित्यकार एवं नव नालंदा महाविहार सम विश्वविद्यालय, नालंदा के आचार्य प्रो. रवींद्र नाथ श्रीवास्तव ‘परिचय दास’ ने की। अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में उन्होंने कहा कि पर्यावरण संकट केवल प्राकृतिक संसाधनों का संकट नहीं है, बल्कि यह मनुष्य की संवेदना, भाषा और स्मृति का भी संकट है।
 
उन्होंने यह रेखांकित किया कि लोक और संस्कृति में निहित प्रकृति-बोध आज के विकास मॉडल से लगातार विस्थापित हो रहा है। प्रो. परिचय दास ने कहा कि साहित्य और कला पर्यावरणीय चेतना के सबसे जीवंत दस्तावेज हैं, क्योंकि वे मनुष्य और प्रकृति के रिश्ते को अनुभूति के स्तर पर दर्ज करते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि जलवायु परिवर्तन का प्रभाव केवल भौगोलिक नहीं, सांस्कृतिक भी है, जो लोकगीतों, कहावतों और जीवन-रीतियों में साफ दिखाई देता है।
 
उन्होंने आधुनिकता के नाम पर प्रकृति से किए गए एकांगी व्यवहार पर प्रश्न उठाया और संतुलन आधारित दृष्टि की आवश्यकता पर बल दिया। उनके अनुसार पर्यावरणीय विमर्श तब तक अधूरा है, जब तक उसमें लोकज्ञान और सांस्कृतिक अनुभवों को शामिल नहीं किया जाता। उन्होंने विश्वविद्यालयों और अकादमिक संस्थानों से आग्रह किया कि वे पर्यावरण को केवल अध्ययन का विषय नहीं, बल्कि जीवन-चिंतन का आधार बनाएं।
 
डॉ. राम बहादुर मिश्र ने अपने वक्तव्य में कहा कि पर्यावरणीय संकट की जड़ में उपभोग की वह मानसिकता है, जिसने प्रकृति को केवल संसाधन के रूप में देखा है। उन्होंने यह भी कहा कि पारिस्थितिकी की रक्षा के लिए स्थानीय समुदायों की भूमिका को केंद्रीय महत्व देना होगा। उनके अनुसार लोकपरंपराओं में निहित संरक्षण की समझ आज भी प्रासंगिक है।
 
डॉ. रमाशंकर सिंह ने कहा कि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव सबसे पहले समाज के कमजोर वर्गों पर पड़ते हैं, जिन्हें विकास की भाषा में अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है। उन्होंने यह रेखांकित किया कि सामाजिक न्याय और पर्यावरणीय न्याय को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता। उनका मानना था कि साहित्य और समाजशास्त्र मिलकर इस असंतुलन को उजागर कर सकते हैं।
 
डॉ. श्रुति ने कार्यक्रम का सशक्त मॉडरेशन किया और विषय-प्रवर्तन करते हुए कहा कि पर्यावरणीय विमर्श को बहुविषयक दृष्टि से देखना समय की मांग है। उन्होंने संस्कृति और पारिस्थितिकी के अंतर्संबंध को स्पष्ट करते हुए कहा कि जलवायु संकट हमारी जीवन-शैली के प्रश्न से सीधे जुड़ा है। उनके अनुसार संवाद और विमर्श ही इस संकट से जूझने का पहला कदम है।
 
संगोष्ठी के दौरान प्रख्यात भोजपुरी चित्रकार वंदना श्रीवास्तव के भोजपुरी चित्रों पर आधारित वीडियो का ससंदर्भ प्रदर्शन भी किया गया। इन चित्रों के माध्यम से प्रकृति, लोकजीवन और पर्यावरणीय संवेदना का दृश्यात्मक रूप सामने आया। प्रतिभागियों ने इसे संगोष्ठी का एक अत्यंत प्रभावशाली और स्मरणीय पक्ष बताया।
 
इस आयोजन में ई एफ एस एल ई संस्था की ओर से प्रो. सिद्धार्थ सिंह ( संयोजक) एवं डॉ. ऋषिकेश सिंह (राष्ट्रीय प्रमुख) की सक्रिय भूमिका रही।
 
नेशनल पीजी कॉलेज, लखनऊ के सहयोग से आयोजित इस अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी ने पर्यावरण और संस्कृति के संवाद को एक व्यापक और सार्थक दिशा प्रदान की।
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