गेहूँ की बुआई का सही समय नवम्बर माह
पूर्वी उत्तर प्रदेश में धान की कटाई के बाद खेत की तैयारी कर गेहूँ की बुवाई किसान करते है। पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करें और बाद में डिस्क हैरो या कल्टीवेटर से 2-3 जुताई करके खेत को समतल और भुरभुरा बना लें।
फसल अवशेषों को मिट्टी में मिलाने के लिए रोटावेटर का उपयोग करें।बुवाई से पहले खेत में पर्याप्त नमी सुनिश्चित करें।
प्रोफेसर रवि प्रकाश मौर्य निदेशक प्रसार्ड ट्रस्ट मल्हनी देवरिया के अनुसार गेहूं की बुआई का सही समय माह नवंबर है। इस बीच उचित तापक्रम होने से जमाव, पौधों की बड़वार सही होता है।
पछेती बुवाई 1 दिसंबर के बाद का होता है,पछेती बुवाई के लिए देरी से पकने वाली किस्में चुनें और बीज की मात्रा लगभग 20 प्रतिशत बढ़ा दें। देर से बुआई पर पैदावार में कमी होती है।
पूर्वी उत्तर प्रदेश के लिए गेहूं की कुछ उन्नतशील किस्में:– जलवायु , मृदा, पानी के आधार पर प्रजातियों का चयन करना आवश्यक होता है। पूर्वी उ.प्र. के लिए संस्तुत प्रमुख प्रजातियाँ है।
डी.बी.डब्लू-187 (करण वंदना): यह एक नई और नवीनतम किस्म है जो समय पर बुवाई के लिए उपयुक्त है। यह उच्च उपज देती है और मध्यम जलवायु में अच्छी पैदावार देती है।
डी.बी.डब्लू- 222 (करण नरेंद्र): यह किस्म चपाती और ब्रेड दोनों के लिए अच्छी है और नमी और तापमान में उतार-चढ़ाव वाले क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है। यह भूरा रतुआ के प्रति प्रतिरोधी है।
- डी.बी.डब्लू- 303 (करण वैष्णवी): यह उच्च उपज देने वाली किस्म है जो गर्म मौसम और सूखे को सहन कर सकती है। यह पीला और भूरा रतुआ के प्रति प्रतिरोधी है और इसके लिए अच्छी सिंचाई की आवश्यकता होती है।
डी.बी.डब्लू- 826: यह नमी और गर्मी झेलने की क्षमता वाली एक अच्छी किस्म है जो इस क्षेत्र के लिए उपयुक्त है।
एच.डी.-3411: यह भी एक उपयुक्त किस्म है जो इस क्षेत्र में अच्छी पैदावार दे सकती है।
एच.डी.-3086: यह एक और उन्नतशील किस्म है जिसे इस क्षेत्र के लिए अनुशंसित किया गया है।
एच.यू.डब्ल्यू- 234: यह एक पुरानी और लोकप्रिय किस्म है जो अपने चपाती बनाने के गुणों के कारण बुजुर्ग किसानों के बीच लोकप्रिय है।
किस्मों का चयन करते समय ध्यान रखने योग्य बातें:-
- क्षेत्र की जलवायु और मिट्टी के अनुसार किस्म का चयन करें।
- कम सिंचाई वाली किस्मों को पानी की कमी वाले क्षेत्रों में प्राथमिकता दें।
- रोग प्रतिरोधक क्षमता वाली किस्मों का चयन करें।
बीज और बीज दर-
समय पर बुवाई हेतु 40 किग्रा बीज प्रति एकड़ देरी से बुवाई हेतु 50-55 किग्रा प्रति एकड बीज की आवश्यकता होती है। बुवाई से पहले बीजों को उपचारित करें.।
बुवाई की विधि-
कतारों में बुवाई के लिए सीड ड्रिल का उपयोग करना लाभदायक होता है।समय पर बुवाई हेतु पंक्ति से पंक्ति की दूरी 18-20 सेमी.,देरी से बुवाई हेतु 15 सेमी (दिसंबर के अंत या जनवरी के शुरुआत में)।
पौधे से पौधे की दूरी 3-5 सेमी, बुवाई 3-5 सेमी से अधिक गहराई पर न करें।
उर्वरक प्रबंधन- मृदा परीक्षण के आधार पर उर्वरकों का प्रयोग करें।
बेसल डोज (बुवाई के समय) में संतुलित मात्रा में उर्वरक डालें।
डी.ए.पी 60 किग्रा .
पोटाश 30-35 किग्रा.एवं
यूरिया 20 किग्रा .
सल्फर (जैसे बेंटोनाइट सल्फर) 10 किग्रा प्रति एकड़ की दर से प्रयोग करें।
सिंचाई-
बुवाई के बाद पर्याप्त नमी होना जरूरी है। यदि सूखे खेत में बुवाई की है तो सिंचाई करें।
फुव्वारा;सिंचाई विधि का उपयोग करने पर कम पानी की आवश्यकता होती है। पहली सिंचाई बुआई के 20-25 दिन बाद ताजमूल अवस्था, दूसरी सिंचाई बुआई के 40-50 दिन पर कल्ले निकलते समय, तीसरी बुआई के 60-65 दिन बाद गांठे बनते समय, चौथी सिंचाई बुआई के 80-85 दिन बाद पुष्पावस्था में, पांचवीं सिंचाई बुआई के 100 दिन पर दुग्धावस्था, छठी सिंचाई बुआई के 115-120 दिन पर दाना भरते समय करनी चाहिए।
कटाई एवं मड़ाई- औसतन प्रजातियों, जलवायु, बोआई के समय , तापमान,वातावरण के अनुसार 120-140 दिन में गेहूँ की फसल तैयार हो जाती है। उपज भी उक्त पर निर्भर करता है। औसतन उपज 20-25 कुन्टल प्रति एकड़ प्राप्त हो जाती है।
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