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By : Nishpaksh Pratinidhi | Published Date : 14 Sep 2025 12:02 PM |   661 views

हमारी हिन्दी

हिन्दी भाषा भारतीय उपमहाद्वीप की आत्मा का प्रतीक है। यह न केवल हमारी सांस्कृतिक विरासत की गाथा बयाँ करती है बल्कि हमारे सामाजिक, ऐतिहासिक, राजनीतिक और बौद्धिक अस्तित्व का भी महत्त्वपूर्ण अंग है। हर वर्ष 14 सितम्बर को पूरे भारतवर्ष में हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह दिन हिन्दी भाषा को संविधानिक दर्जा मिलने की याद दिलाता है, जिससे हिन्दी भारत की राजभाषा बन गई थी। हिन्दी दिवस का उद्देश्य न केवल भाषा के प्रचार-प्रसार को बढ़ावा देना है बल्कि यह हमारी राष्ट्रीय एकता, सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक पहचान को भी सशक्त बनाता है। यह दिन हमें यह संकल्प दिलाता है कि हम अपनी भाषा के महत्त्व को समझें और उसका आदर करें।
 
हिन्दी भाषा का ऐतिहासिक महत्व अत्यंत प्राचीन है। हिन्दी की उत्पत्ति प्राचीन भारतीय भाषाओं से हुई है। संस्कृत से विकसित होकर यह ब्रज, अवधी, भोजपुरी, मैथिली जैसी अनेक भाषाओं में विस्तृत हुई। समय के साथ-साथ हिन्दी भाषा ने कई साहित्यिक रूप और अभिव्यक्तियों को अपनाया है। यह भाषा केवल एक संवाद का माध्यम नहीं है बल्कि यह हमारे सोचने-समझने, अनुभवों को व्यक्त करने और सामाजिक व सांस्कृतिक ज्ञान को पीढ़ी दर पीढ़ी संप्रेषित करने का पुल बन चुकी है। हमारी लोक कथाएँ, गीत, नाट्यकला, रीति-रिवाज आदि हिन्दी भाषा में सजीव होकर हमारे समाज का हिस्सा बन चुके हैं।
 
हिन्दी साहित्य का गौरव अविस्मरणीय रहा है। यह साहित्य मानवता के विविध पक्षों पर आधारित होकर हमारे मन-मस्तिष्क को जाग्रत करता है। जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, हरिवंश राय बच्चन, प्रेमचंद, रामधारी सिंह दिनकर , विजयदेव नारायण साही आदि साहित्यकारों ने हिन्दी साहित्य को नए आयाम दिए। उनकी रचनाएँ आज भी आधुनिक समाज को संवेदना, न्याय, प्रेम, स्वतंत्रता और समानता के संदेश से अभिभूत करती हैं।
 
प्रेमचंद की कहानियाँ समाज के दबे-कुचले लोगों की पीड़ा को उजागर करती हैं। जयशंकर प्रसाद और निराला की कविताओं में आध्यात्मिकता और प्रकृति का सुन्दर समावेश देखने को मिलता है। इसी प्रकार महादेवी वर्मा की कविताएँ मानवीय संवेदनाओं को अभिव्यक्त करती हैं, जिनमें वे मानव मन की गहराईयों को समझने की कोशिश करती हैं।
 
समाज में हिन्दी भाषा की भूमिका भी अतुलनीय है। एक ऐसा समय था जब भारतवर्ष के विभिन्‍न भागों में भिन्न-भिन्न बोलियाँ प्रचलित थीं। परन्तु हिन्दी भाषा ने अपनी सरलता, सौम्यता और सहजता के बल पर लोगों को एकत्रित किया। भारत की आज़ादी संग्राम में हिन्दी का बड़ा योगदान रहा है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी भी हिन्दी भाषा के प्रचार के पक्षधर रहे हैं। उन्होंने सादगीपूर्ण हिन्दी भाषा को देशवासियों के बीच अपनाने के लिए विशेष रूप से प्रेरित किया। उनके अनुसार हिन्दी भाषा वह माध्यम है जिससे आम जनता तक विचारों का संप्रेषण आसानी से हो सकता है। इसी विचारधारा से प्रेरित होकर हिन्दी को स्वतंत्र भारत का राजभाषा बनाया गया।
 
आज के तकनीकी युग में हिन्दी भाषा को नई चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। अंग्रेज़ी का बढ़ता प्रभाव, वैश्वीकरण की प्रक्रिया, और डिजिटल युग की विशेषताएँ हिन्दी भाषा के लिए संकट का कारण बनती जा रही हैं। बड़े-बड़े बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ, अंतरराष्ट्रीय संवाद, और विश्व व्यापी सूचना-प्रसारण का माध्यम अंग्रेज़ी ही बनती जा रही है। ऐसे में हिन्दी भाषा को संरक्षित करने, संवर्धन करने और उसका प्रचार-प्रसार सुनिश्चित करने की आवश्यकता पहले से भी अधिक बढ़ गई है। हिन्दी को केवल पारंपरिक रूप में नहीं देखा जाना चाहिए बल्कि इसे वैज्ञानिक, तकनीकी और व्यावसायिक भाषाई रूप में विकसित करने की आवश्यकता है। आज का युग सूचना का युग है, इसलिए हिन्दी भाषा के डिजिटल रूपांतरण की प्रक्रिया को तेज करने का कार्य आवश्यक हो गया है।
 
सरकारी कार्यालयों में भी हिन्दी का प्रयोग बढ़ाने की आवश्यकता है। कार्यालयीन कागजात, नियम-नियमावली, सरकारी वेबसाइट, सूचनाप्रद दस्तावेज आदि में हिन्दी का उपयोग बढ़ाने से यह भाषा देश के आम नागरिकों के बीच अधिक सुलभ हो जाएगी। भारतीय भाषाओं के बीच हिन्दी का स्थान राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत करने के लिए हिंदी को शिक्षा का प्रमुख विषय बनाना आवश्यक है। विद्यालय स्तर से लेकर विश्वविद्यालय स्तर तक हिन्दी भाषा को प्राथमिकता देने के कार्यक्रम चलाने चाहिए, जिससे छात्र हिन्दी के प्रति रुचि और लगाव विकसित करें। इससे हिन्दी भाषा का महत्व और विस्तार देश-विदेश में होगा।
 
हिन्दी दिवस पर आयोजित कार्यक्रम विद्यार्थियों, समाज के प्रबुद्ध व्यक्तियों, शिक्षकों और साहित्य प्रेमियों के बीच हिन्दी भाषा के प्रति सम्मान की भावना को जागृत करते हैं। व्याख्यान, निबंध लेखन प्रतियोगिता, कविता वाचन, रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम, नुक्कड़ नाटक आदि से हिन्दी के प्रचार-प्रसार को बढ़ावा मिलता है। विद्यार्थियों को उनके भाषिक कौशल के अनुसार अवसर प्रदान किए जाते हैं, जिससे वे अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर सकें। विद्यालय और कॉलेज में हिन्दी दिवस का आयोजन एक महत्त्वपूर्ण सामाजिक कृत्य बनता जा रहा है। यह आयोजन भाषा प्रेम को उजागर करने, नये विचारों को विकसित करने, और राष्ट्रभक्ति की भावना को प्रबल करने का कार्य करता है।
 
लोक कला और लोक साहित्य हिन्दी के समृद्ध अंग हैं। लोक गीत, लोक कथाएं, लोक नाटक, लोक चित्रकला आदि में सामाजिक अनुभव और परंपरा का अक्स देखने को मिलता है। अनेक लोक कलाकारों ने इस क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। उन्होंने हिन्दी भाषा के माध्यम से लोक कला को देश-विदेश में लोकप्रिय बनाया। लोक कला केवल प्राचीन कला रूप नहीं, बल्कि यह आधुनिक समाज में भी अपना स्थान बनाए हुए है। यह समाज के सांस्कृतिक विविधता, परंपरा और लोकजीवन की अभिव्यक्ति है। लोक कलाकार अपने चित्र, गीत, नाट्य आदि के माध्यम से सामाजिक यथार्थ को उजागर करते हैं। लोक कला के संरक्षण हेतु सरकारी योजनाओं का लाभ उठाना चाहिए, ताकि कलाकारों को आर्थिक और बौद्धिक सहारा प्राप्त हो। लोक कला के क्षेत्र में कैरियर बनाने के लिए युवाओं को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
 
आज के समय में हिन्दी को वैश्विक मंच पर भी पहचान दिलाने की आवश्यकता है। भारत में विदेशी भाषाओं की शिक्षा के साथ-साथ हिन्दी को भी विदेशी विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाना चाहिए। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी भाषा के सम्मेलन, शोध कार्य, साहित्यिक मेलों, और अनुवाद परियोजनाओं का आयोजन होना चाहिए। यह भाषा केवल भारतीय नागरिकों का नहीं, बल्कि विश्व नागरिकों का भी सांस्कृतिक सम्पदा बनकर विकसित हो। इसके लिए सरकार, समाज, शिक्षण संस्थान और आम जनता को एकजुट होकर प्रयास करना आवश्यक है।
 
हिन्दी दिवस पर यह भी विचार किया जाना चाहिए कि डिजिटल माध्यमों में हिन्दी का स्थान बढ़ाना अत्यंत आवश्यक हो गया है। वेबसाइट, एप्लिकेशन, ब्लॉग, यूट्यूब चैनल, पॉडकास्ट आदि के माध्यम से हिन्दी भाषा को और भी प्रासंगिक बनाया जा सकता है। विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में हिन्दी सशक्त रूप से अपनाई जाए ताकि डिजिटल साक्षरता हिन्दी माध्यम में भी बढ़े। हिन्दी में मोबाइल एप्लिकेशन, अनुवाद उपकरण, वॉयस रिकॉग्निशन सिस्टम आदि विकसित किए जाएँ, जिससे लोगों का हिन्दी के प्रति जुड़ाव मजबूत हो। इसके अतिरिक्त सरकारी डिजिटल योजनाओं को हिन्दी माध्यम में उपलब्ध कराना आवश्यक है ताकि आम जनता सरकारी सेवाओं का लाभ सहजता से उठा सके।
 
हिन्दी दिवस केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि यह एक सामाजिक दायित्व है। यह दिन हमें यह संकल्प दिलाता है कि हम हिन्दी भाषा के संरक्षण, संवर्धन, और समुचित विकास के लिए सतत प्रयास करेंगे। हमें अपनी मातृभाषा को प्रेम से अपनाना चाहिए, उसका उपयोग दैनिक जीवन में बढ़ाना चाहिए। बच्चों को प्राथमिक शिक्षा से ही हिन्दी भाषा का महत्त्व समझाना चाहिए। यह उनके बौद्धिक विकास का आधार बनेगा।
 
हिन्दी भाषा की सरलता, मधुरता और अभिव्यक्तिशीलता उसकी सबसे बड़ी विशेषता है। शब्दों के माध्यम से भावों को स्पष्ट करने, विचारों को परिपक्व करने, समाज के विभिन्न पहलुओं को उजागर करने में हिन्दी का विशेष स्थान है। यह भाषा मानवता के आदर्शों को संरक्षित रखने का कार्य करती है। साथ ही, हिन्दी केवल भारत की भाषा नहीं, अपितु विश्व मानवता के साथ संवाद स्थापित करने का भी एक सशक्त माध्यम बन सकती है।
 
हिन्दी दिवस पर यह जरूरी है कि हम सभी नागरिक मिलकर यह प्रण लें कि हिन्दी भाषा को हर क्षेत्र में सर्वोच्च स्थान दिलाने के लिए प्रयासरत रहेंगे। सरकारी कार्यालय से लेकर निजी क्षेत्र, विद्यालय से लेकर विश्वविद्यालय तक, डिजिटल माध्यम से लेकर पारंपरिक मीडिया तक हिन्दी का प्रयोग प्रोत्साहित किया जाएगा। साहित्य, कला, संगीत, नाटक, तकनीक, पत्रकारिता और शिक्षण क्षेत्र में हिन्दी की महत्त्वपूर्ण भूमिका को हर स्तर पर मान्यता दी जाएगी। इसके साथ ही हिन्दी के अंतरराष्ट्रीय प्रसार के लिए नए-नए प्रयास किए जाएंगे।
 
हिन्दी दिवस हमारे लिए एक अवसर है , यह याद करने का कि हमारी भाषा हमारी पहचान है। यह भाषा केवल संवाद का साधन नहीं अपितु हमारी संस्कृति, परंपरा, इतिहास, और भविष्य का निर्माण भी करती है। हिन्दी के प्रति जागरूकता, प्रेम, और समर्पण से ही यह भाषा सशक्त और समृद्ध बनकर आने वाली पीढ़ियों तक संरक्षित रहेगी। आइए, इस हिन्दी दिवस पर हम संकल्प लें कि हम हिन्दी को न केवल बोलेंगे बल्कि उसका सम्मान करेंगे ,उसका अध्ययन करेंगे और उसे दुनिया के समक्ष गर्व से प्रस्तुत करेंगे। यही हमारी जिम्मेदारी है, यही हमारा कर्तव्य है।
 
– प्रो. रवीन्द्र नाथ श्रीवास्तव ‘परिचय दास’, हिन्दी ,नव नालंदा महाविहार विश्वविद्यालय , नालंदा  
 
 
 
 
 
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