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By : Nishpaksh Pratinidhi | Published Date : 16 Mar 2026 7:21 PM |   280 views

जैन साहित्य दर्शन की संवेदनात्मक अभिव्यक्ति है -प्रो. परिचय दास

लखनऊ । बाबा साहब भीमराव अंबेडकर केंद्रीय विश्वविद्यालय, लखनऊ में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी “जैन धर्म एवं साहित्य : समकालीन संदर्भ ” के समापन सत्र में विशिष्ट अतिथि के रूप में प्रो. रवींद्र नाथ श्रीवास्तव ‘परिचय दास’, प्रो. हिंदी विभाग, नव नालंदा महाविहार (सम विश्वविद्यालय), नालंदा ने आरंभिक व्याख्यान दिया। कार्यक्रम की अध्यक्षता बाबा साहब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय, लखनऊ के कुलपति प्रो. राजकुमार मित्तल ने की।
 
अपने व्याख्यान में प्रो. परिचय दास ने कहा कि मनुष्य की सभ्यता में ऐसे क्षण आते हैं जब विचार, आस्था और साहित्य एक-दूसरे के सामने बैठकर संवाद करते हैं। किसी भी संगोष्ठी का वास्तविक महत्व इसी संवाद में निहित होता है। उन्होंने कहा कि जैन दर्शन भारतीय बौद्धिक परंपरा की ऐसी धारा है जिसने भाषा, साहित्य, सौंदर्यबोध और चिंतन की गहरी परंपरा विकसित की है। उन्होंने अपभ्रंश भाषा एवं साहित्य में एम. ए. पाठ्यक्रम आरम्भ करने की माँग की।
 
परिचय दास ने कहा कि आज के समय में जब समाज निरंतर ध्रुवीकरण और असहिष्णुता की चुनौतियों से जूझ रहा है तब जैन दर्शन का ‘अनेकांत’ सिद्धांत विशेष रूप से प्रासंगिक हो उठता है। अनेकांत हमें यह स्मरण कराता है कि सत्य एकरेखीय नहीं बल्कि बहुआयामी/ बहुवचनीय होता है और उसे समझने के लिए धैर्य, विनम्रता तथा संवाद की आवश्यकता होती है।
 
प्रो. परिचय दास ने यह भी कहा कि जैन साहित्य दर्शन की संवेदनात्मक अभिव्यक्ति है। प्राकृत, अपभ्रंश और संस्कृत की समृद्ध परंपराओं में विकसित जैन साहित्य ने भारतीय काव्य और कथा साहित्य को गहराई से प्रभावित किया है। उन्होंने कहा कि आज के हिंसा, उपभोग और असंतुलन से भरे समय में जैन दर्शन के अहिंसा, अपरिग्रह और संयम जैसे सिद्धांत मानव सभ्यता के लिए नैतिक विकल्प प्रस्तुत करते हैं। 
 
संगोष्ठी के दौरान अन्य वक्ताओं ने जैन दर्शन और साहित्य के विविध आयामों पर अपने विचार व्यक्त किए। मंच पर प्रो. अभय जैन, उपाध्यक्ष, उत्तर प्रदेश जैन विद्या शोध संस्थान, लखनऊ; जैन विद्या मर्मज्ञ प्रो. नलिन के शास्त्री; प्रो. पवन अग्रवाल, हिंदी विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय तथा संगोष्ठी के सूत्रधार~ संयोजक डॉ. बलजीत श्रीवास्तव, हिंदी विभाग, अंबेडकर विश्वविद्यालय, लखनऊ उपस्थित रहे।
 
कार्यक्रम का संचालन डॉ. रमेश नैलवाल, संस्कृत विभाग ने किया। प्रो. राजकुमार मित्तल , कुलपति ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि उपभोक्तावाद , लालच व वैश्वीकरण ने मनुष्य को प्रकृति विरोधी बना दिया है, उसकी सहजता समाप्त होती जा रही है।
 
 
विश्वविद्यालयों से आए विद्वानों, शोधार्थियों और प्रतिभागियों ने सक्रिय भागीदारी की। आयोजन के अंत में सभी प्रतिभागियों और वक्ताओं के प्रति आभार व्यक्त किया गया।
मानवता शायद धीरे-धीरे ही सही पर संयम और सह-अस्तित्व की भाषा फिर से सीखने की कोशिश कर रही है। ऐसी संगोष्ठियाँ कम से कम यह याद दिलाती रहती हैं कि सभ्यता केवल तकनीक से नहीं, विचार से भी चलती है।
 
समापन सत्र में वक्ताओं ने कहा कि जैन दर्शन केवल अतीत की बौद्धिक धरोहर ही नहीं है बल्कि वह समकालीन बौद्धिकता को भी नई दृष्टि से संबोधित करता है। आज के चिंतन व रहन~ सहन ने मनुष्य को किंचित प्रकृति~विरोधी बना दिया है, उसकी सहजता समाप्त होती जा रही है।
 
संगोष्ठी में देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों से आए विद्वानों, शोधार्थियों और प्रतिभागियों ने सक्रिय भागीदारी की। आयोजन के अंत में सभी प्रतिभागियों और वक्ताओं के प्रति आभार व्यक्त किया गया।
 
मानवता शायद धीरे-धीरे ही सही पर संयम और सह-अस्तित्व की भाषा फिर से सीखने की कोशिश कर रही है। ऐसी संगोष्ठियाँ कम से कम यह याद दिलाती रहती हैं कि सभ्यता केवल तकनीक से नहीं, विचार से भी चलती है।
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