Wednesday 25th of March 2026 02:13:25 PM

Breaking News
  • राहुल गाँधी का प्रधानमंत्री मोदी पर बड़ा अटैक -ट्रम्प के कंट्रोल में हैं संसद में बहस नहीं कर सकते |
  • ट्रम्प की डेडलाइन खत्म नाटो सहित 22 देश इरान पर हमला करने के लिए निकले |
  •  TMC के मुस्लिम वोट में सेंध लगाने के लिए साथ आये ओवैसी और कबीर |
Facebook Comments
By : Nishpaksh Pratinidhi | Published Date : 6 Feb 2026 6:31 PM |   126 views

हिन्दू मंदिर भारतीयों की सृजनशीलता एवं अद्भुत मेधा शक्ति का परिचायक है-प्रो0 राजवन्त राव

गोरखपुर -प्राचीन भारतीय अभिलेख एवं मुद्राएं-अभिरूचि कार्यशाला’’ राष्ट्रीय व्याख्यान श्रृंखला के अन्तर्गत आज प्रो0 राजवन्त राव, प्राचीन इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग, दी0द0उ0गो0 वि0वि0, गोरखपुर द्वारा ’’मुद्राओं पर प्रतिबिम्बित धार्मिक वास्तु’’ विषय पर विस्तृत सूचना प्रतिभागियों को उपलब्ध करायी गयी।
 
प्रो0 राजवन्त राव ने अपने उद्बोधन में बताया कि भारत में प्रारम्भ में देवालयों के लिए मंदिर शब्द का उपयोग नहीं हुआ। मंदिर शब्द का प्रयोग परवर्ती काल में कलचुरी शासक युवराज द्वितीय के समय सर्वप्रथम देखने को मिलता है। प्रारम्भ में देवालयों के लिए प्रासाद, देवसदन, देवगृह आदि शब्दों का प्रयोग मिलता है।
 
भारतीय मुद्राओं से ज्ञात होता है कि लगभग द्वितीय शताब्दी ई0पूर्व0 में किसी न किसी रूप में मंदिर का अस्तित्व अवश्य था। मंन्दिर वास्तु का प्रारम्भिक स्वरूप आगाथाक्लिज की मुद्राओं पर देखने को मिलता है। सहगोरा ताम्रपत्र में वेदिका में वृक्ष, अर्धचन्द्र युक्त त्रिमेरू, दो मंजिला वास्तु आदि आकृतियॉं देखने को मिलती है। दो मंजिला वास्तु को विद्वानों ने अन्नागार के स्वरूप से समीकृत किया है अन्नागार को कौटिल्य के अर्थशास्त्र में लोक देवी की संज्ञा दी गयी है। शक शासक षोडास के मथुरा लेख में पंच वीरों की प्रतिमा का उल्लेख मिलता है। मेरू, मन्दर एवं कैलाश मंदिर के ही प्रकार हैं। सारनाथ एवं श्रावस्ती से प्राप्त कनिष्क के अभिलेखों में बोधिसत्व की मूर्तियों के उपर छत्रयष्टि लगाने का उल्लेख प्राप्त होता है। अन्नागार को ’’श्री’’ का प्रतीक माना गया है। अयोध्या के शासक धनदेव के अभिलेख में मन्दिर निर्माण का उल्लेख मिलता है। पांचाल नरेशों की ताम्र मुद्राओं पर भी मन्दिर वास्तु के प्रारूप देखने को मिलते हैं। यौधेयों , औदुम्बर आदि गण राज्यों की मुद्राओं में भी प्राचीन मन्दिर स्वरूप देखे जा सकते हैं। 
 
कार्यशाला संयोजक के रूप में डॉ0 यशवन्त सिंह राठौर द्वारा अवगत कराया गया है कि भारत में धार्मिक प्रतिष्ठानों के स्वरूप को मुद्राओं एवं अभिलेखों में अभिव्यक्त किया गया। दक्षिण भारत में मदुुरा के समीप बोदिनायकुरू नाम स्थान से प्राप्त आहत मुद्राओं में अंकित वास्तु को शिव मन्दिर के संकेत के रूप में पहचाना जाता है। इन मुद्राओं का समय द्वितीय शताब्दी ई0पूर्व0 निर्धारित किया गया है। इस प्रकार मुद्राओं पर अंकित वास्तुस्वरूपों का विस्तृत अध्ययन करने पर हमें प्रारम्भिक रूप में शिव एवं कार्तिकेय से सम्बन्धित धार्मिक प्रतिष्ठिानों के साक्ष्य मुद्राओं से ही ज्ञात होते हैं। 
 
अंत में प्रो0 रामप्यारे मिश्र द्वारा पुरातत्व एवं अभिलेखों पर प्रकाश डालते हुए सभी को धन्यवाद ज्ञापित किया गया।   
 
कार्यशाला के चतुर्थ व्याख्यान दिवस में लगभग 70 प्रतिभागियों सहित कार्यालय के कार्मिक भी उपस्थित रहें।  
Facebook Comments