Friday 9th of January 2026 04:53:50 AM

Breaking News
  • नेपाल में खुद की बनाई सरकार से नाखुश है GEN -Z ,अपेक्षाओ पर खरा नहीं उतर पाई सुशीला कार्की |
  • छापेमारी में दखल को लेकर ED पहुंची हाईकोर्ट ,मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर सबूत मिटाने का आरोप |
  • उत्तर प्रदेश में गलन और ठिठुरन जारी |
Facebook Comments
By : Nishpaksh Pratinidhi | Published Date : 5 Jan 2026 7:49 PM |   422 views

कैसे बचें, हवाई वादों की लखपति बनाती खेती से

खेती केवल फसल उगाने का काम नहीं है, यह किसान की पूरी ज़िंदगी, उसकी पूँजी, उसका समय और उसका भरोसा होती है। एक किसान जब कोई नया प्रयोग करता है, तो वह सिर्फ बीज नहीं बोता, बल्कि अपनी मेहनत की कमाई, परिवार की उम्मीदें और भविष्य दांव पर लगाता है। ऐसे में आज सबसे बड़ा खतरा मौसम या कीट नहीं, बल्कि बिना ज़मीनी सच्चाई के फैलाए जा रहे लुभावने वादे बन चुके हैं।
 
आज हर दिन कहीं न कहीं से कोई नई “क्रांतिकारी खेती”, “सुनहरा मौका”, “कम लागत में लाखों की कमाई” जैसी बातें सामने आती हैं। वीडियो, पोस्ट, मैसेज और कॉल के ज़रिए किसान को यह विश्वास दिलाने की कोशिश होती है कि अब पारंपरिक खेती पुरानी हो चुकी है और बस एक नया तरीका अपनाते ही किस्मत बदल जाएगी। लेकिन ज़मीन पर काम करने वाला किसान जानता है कि खेती में कोई जादू नहीं होता।
 
सोशल मीडिया और यूट्यूब की खेती: दिखावा ज़्यादा, सच्चाई कम-
आजकल यूट्यूब और अन्य प्लेटफॉर्म पर खेती से जुड़े वीडियो की भरमार है। कैमरे के सामने हरी-भरी फसल, मोटे फल, मुस्कुराता चेहरा और पीछे से चलती कहानी –
“मैंने यह लगाया और पहली फसल में ही लाखों कमा लिए।”
 
लेकिन इन वीडियो में अक्सर यह नहीं बताया जाता कि:
* क्या लेबर कुशलता चाहिए|
* कुल लागत कितनी आई जिसमे क्या रेट से अवयव जोड़े गये हैँ|
* कितनी फसल बिकी और कितनी खराब हुई|
* बाजार कहाँ मिला और कितने दिन में भुगतान हुआ|
* अगली फसल में वही नतीजे आए या नहीं|
* आपके नजदीक बिकेगी या नही|
 
कई बार ये वीडियो प्रायोजित होते हैं या अधूरी सच्चाई दिखाते हैं। किसान को चाहिए कि वीडियो देखकर प्रेरित जरूर हो, लेकिन निर्णय केवल वीडियो के आधार पर न लें।
 
किसी भी नई फसल या तकनीक से पहले छोटा ट्रायल अनिवार्य-
अगर कोई नई फसल, किस्म, औषधीय पौधा या तरीका आकर्षक लग रहा है, तो सीधे पूरे खेत में उसे न अपनाएँ।
सही तरीका है: –
* पहले बहुत छोटे हिस्से में प्रयोग करें।
* अपनी मिट्टी, पानी और मौसम में उसका व्यवहार देखें।
* एक नहीं, दो–तीन मौसम तक उसका परिणाम समझें।
 
खेती में जो चीज एक जगह सफल है, ज़रूरी नहीं दूसरी जगह भी वैसी ही चले। जब खुद के अनुभव से संतोष हो जाए, तभी बड़े स्तर पर आगे बढ़ें।
 
कुछेक नई “फैशनेबल” फसलों के कड़वे अनुभव- 
कई किसानों ने थाई अमरूद लगाया क्योंकि पौधे अच्छे थे और प्रचार में मिठास बताई गई। साइज देख फल देख हुए वीडियो में 10-35 लाख प्रति एकड़ तक आउ सुन लोगों ने कई जगह बगीचा लगा डाला, लेकिन जब फल आया, तो स्वाद भारतीय उपभोक्ता के अनुसार नहीं निकला। नतीजा – लोकल और ग्रामीण बाजार में मांग नहीं। दुबारा कस्टमर नही आया। बाद में बढ़ती भीड़ ने भाव भी खत्म कर दिये।
 
इसी तरह थाई नींबू बीजरहित होने के बावजूद आकार में बहुत बड़ा निकला। घरेलू उपयोग में यह स्वीकार्य नहीं हुआ और किसान को दोबारा खरीदार नहीं मिले।
 
ऐसे ही एक बड़ा फर्जीवाड़ा करता उदाहरण हाल ही कुछेक वर्ष पहले हौपशूट नामकी एक सब्जी उगना बताई गई जिसे दुनिया की सबसे महंगी सब्जी और भारतीय सब्जी अनुसंधान केन्द्र क किसी वैज्ञानिक से बीज मिलना बताया गया लेकिन जांच में न तो उस नाम के कोई वैज्ञानिक मिले, न कहीं फसल और उसके खेत, जिन्हे महीनो तक सोशल मीडिया के चैनल पर बढ़ा चढ़ा के बताते व्यूज और लाईक के जाल में फंसाये रखा गया, बिना जमीनी सच्चाई जाने।
 
“खेती में यह हमेशा याद रखें कि बाजार किसान की मेहनत नहीं, बल्कि ग्राहक की पसंद से चलता है।
 
औषधीय फसलों में सबसे ज़्यादा भ्रम और नुकसान-
आजकल औषधीय फसलों के नाम पर सबसे ज़्यादा हवाई वादे किए जा रहे हैं।
जैसे –
* एलोवेरा
* अश्वगंधा
* स्टीविया
* सफेद मूसली
* सर्पगंधा 
* सहजन 
इनके अलावा बांस, लेमनग्रास, पामारोजा आदि|
 
कई मामलों में कंपनियाँ ऊँचे दाम पर पूरी फसल खरीदने का भरोसा देती हैं। लेकिन ज़मीनी हकीकत में :- 
* गुणवत्ता के नाम पर फसल रिजेक्ट
* नमी या ग्रेड का बहाना
* भुगतान में महीनों की देरी
* या कंपनी का अचानक संपर्क खत्म।।
ऐसी घटनाएँ पहले से रिपोर्ट हो चुकी हैं। इसलिए बिना लिखित, जाँच-परख वाले अनुबंध के ऐसे प्रयोग बहुत जोखिम भरे होते हैं।
 
कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग: काग़ज़ से ज़्यादा ज़रूरी ज़मीनी पड़ताल-
अगर कोई कंपनी कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग का प्रस्ताव दे, तो:- 
* पहले से जुड़े किसानों के खेत पर स्वयं जाएँ
* उनसे खुलकर बात करें, फोन पर नहीं, आमने-सामने
* जानें कि पैसा समय पर मिला या नहीं
* कंपनी मुश्किल समय में साथ खड़ी रही या नहीं
 
सिर्फ ब्रोशर, वीडियो और मीटिंग देखकर निर्णय लेना अक्सर भारी पड़ता है।
 
खुद नुकसान हुआ हो तो चुप न रहें, जागरूक करें-
अगर आप किसी गलत निर्णय में फँस चुके हैं, तो उसे छिपाएँ नहीं। अपने अनुभव दूसरे किसानों से साझा करें। इससे किसी और की पूँजी, मेहनत और भरोसा बच सकता है। खेती में सबसे भरोसेमंद जानकारी वही होती है, जो किसान से किसान तक जाती है।
 
निष्कर्ष: खेती में धैर्य ही सबसे बड़ा निवेश है-
खेती कोई तात्कालिक मुनाफ़े का खेल नहीं है।यह अनुभव, परंपरा, विज्ञान और समझ का संतुलन है। जल्द अमीर बनने के सपने अक्सर किसान को नुकसान की ओर ले जाते हैं। अपनी मिट्टी, अपने मौसम और अपने बाजार को समझकर, छोटे-छोटे कदमों में आगे बढ़ना ही सुरक्षित रास्ता है।यही सोच खेती को मजबूत बनाती है और किसान को आत्मनिर्भर।
 
डॉ. शुभम कुमार कुलश्रेष्ठ,विभागाध्यक्ष एवं सहायक प्राध्यापक – उद्यान विभाग
(कृषि संकाय),रविन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय, रायसेन, मध्य प्रदेश|
Facebook Comments