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By : Nishpaksh Pratinidhi | Published Date : 4 Dec 2024 5:37 PM |   637 views

” मेरे प्रभु “

प्रभु , तेरी ये कैसी रीति है 
कैसा तेरा है न्याय ,
कि सीधे सच्चे लोग को ही
 सहना पड़े अन्याय ।
 
 झूठे की आंख में शर्म नहीं
 पर ,सच की आंख लजाय
  झूठ का चोला पहन के इंसा
  सच को रहा भरमाय ।
 
 झूठे शान से बोलता 
 नभ में झंडा लहराय
 पर ,सच की ही गर्दन देखो
 शर्म से नीचे झुक जाय ।
 
प्रभु, ये कैसी तेरी लीला है
कैसा तेरा है न्याय 
कि, झूठों के जैसा ही तुम भी
 सच को ही गिराते खाय (खाई) ।
 
मैंने सीखा सच बोलना
और सीखा करना न्याय
इसीलिए दुःख भोगती
 और सहती सदा अन्याय ।
 
प्रभु, तेरी बताई राह पे ही
सदा धरुं मैं पांव 
फिर भी मैं ही दुःखी रहूं
और कांटे चुभे मेरे पांव ।
 
तुमने ही तो सिखलाया
हरदम दूं सच का साथ
फिर तुम क्यों मझधार में
 ना पकड़ा मेरा हाथ ।
 
संजुला सिंह  ” संजू “
जमशेदपुर (झारखंड )
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